हम 2015 के कष्टों को नहीं भूलेंगे—नरेंद्र मोदी की काठमांडो की हालिया यात्रा के दौरान कई युवाओं ने इन शब्दों में प्रतिक्रिया व्यक्त की थी. आर्थिक नाकाबंदी ने नेपाल को लाचार कर दिया था और उसके कारण कई मौतें हुईं.
इससे पैदा हुई दरार को पाटने के लिए भारत के प्रधानमंत्री की सिर्फ एक यात्रा से कुछ ज्यादा की आवश्यकता है. दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों में संदेह और अविश्वास बड़ी बाधा बन गए हैं.
अच्छी बात यह है कि हालांकि दोनों पक्षों ने रणनीतिक और राजनैतिक गलतियां की हैं, लेकिन नेपाल महसूस करता है कि भारत ‘अपरिहार्य’ है और भारत जानता है कि वह अब काठमांडो में किसी कमजोर सरकार से बात नहीं कर रहा. प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली फरवरी 2018 में ‘भारत विरोध’ को मुद्दा बनाकर एक प्रभावशाली बहुमत के साथ सत्ता में आए हैं.
भारत ने नेपाल के साथ शांति और एक नई शुरुआत का रास्ता निकालने के लिए ‘ऐतिहासिक’, ‘भौगोलिक’, ‘धार्मिक’ और यहां तक कि ‘पारिवारिक’ संबंधों तक का स्मरण करा डाला. वहीं जहां ओली सरकार भारत के साथ काम करने के विचार के लिए खुले मन की प्रतीत हो रही थी, नेपाल के लोग अभी तक सहमत नहीं हैं.
मोदी का धार्मिक तरीका उनके लिए एक शानदार रणनीति से ज्यादा कुछ नहीं था. जरूरत अब एक बस सेवा और कुछ गेस्ट हाउसों से आगे की है.
भारत ने दोनों देशों के लोगों के बीच धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ‘रामायण सर्किट’ और ‘बौद्ध सर्किट’ के विकास की घोषणा की. प्रश्न यह है कि इस घोषणा के लिए भारत को इतना समय क्यों लगा?
सामरिक मामलों के विश्लेषक डॉ. सी. राजा मोहन कहते हैं कि दक्षिण एशियाई लोग हमेशा धार्मिक कारणों से एक दूसरे के देशों की यात्रा करते रहे हैं, लेकिन भारत ने इसे कभी भी एक महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में नहीं देखा.
वे कहते हैं, ‘‘यह कभी हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं रही, लेकिन ऐसा कहने के लिए पर्याप्त सबूत हैं कि अब हम बदल रहे हैं. एक सड़क या बस सेवा से सर्िण ट नहीं बनता है, आपको उसके चारों ओर एक बुनियादी ढांचा बनाना पड़ता है. हम देखेंगे कि क्या मोदी उस मोर्चे पर कुछ कर दिखाते हैं?’’
जहां नेपाल भारत को ‘लेनदेन’ के चश्मे से देख रहा है, वहीं धार्मिक संबंधों को पुनर्जीवित करने से नई दिल्ली को लोगों से जुड़ने में मदद मिल सकती है.
नेपाल की मौजूदा हुकूमत चीन की करीबी के रूप में देखी जाती है. लेकिन भारत इस आधार पर नेपाल से नाराज नहीं हो सकता. नेपाल का कहना है कि 2015 में भारत ने जो नाकाबंदी की थी उसने काठमांडो को बीजिंग के करीब ला दिया था. भारत को एक बढ़त उपलब्ध है, वह हिमालय है, जो भारत की तरफ पैर जमाने में चीन के लिए एक प्राकृतिक बाधा है.
दूसरा, चीन कभी भी वह पेशकश नहीं करेगा, जो पेशकश भारत को करनी है—खुली सीमा. चीन ने नेपाल में सड़कों, पुलों, बांधों के निर्माण से भारत को नहीं रोका है, लेकिन भारत ने वादा की गई परियोजनाओं को पूरा करके देने की क्षमता में कमी दर्शाई है.
ऐसा थोड़ा तो भारत की प्रक्रियागत देरी से हुआ है और आंशिक रूप से नेपाल सरकार की देरी की वजह से. मोदी की असली परीक्षा भारत के भौगोलिक जुड़ाव और आर्थिक क्षमता का लाभ उठाने में होगी.
भारत ने नेपाल की आंतरिक राजनीति के प्रति संवेदनशील होने से समझौता कर लिया है, जिसके कारण मधेसी नई दिल्ली के हाथों ठगा गया महसूस कर रहे हैं. काठमांडो ने नेपाल में चीनी हस्तक्षेप के संबंध में भारत की संवेदनशीलता को समझ लिया है.
अतीत में, नेपाल भारत के अत्यधिक हस्तक्षेप से परेशान था. नेपाल में राजनैतिक संक्रमण की बात करते हुए, काठमांडो में किए गए नागरिक स्वागत में मोदी ने कहा, ‘‘एक तरह से, हम माउंट एवरेस्ट के आधार शिविर में पहुंच गए हैं.
हमें चोटी पर चढ़ना अभी बाकी है. जिस तरह पर्वतारोहियों को नेपाली शेरपाओं से सुदृढ़ समर्थन मिलता है, उसी प्रकार भारत विकास के लिए नेपाल की राह में शेरपा वाला काम करने के लिए तैयार है.’’ हालांकि, काठमांडो से मिला संदेश बहुत मुखर और स्पष्ट है—नेपाल अब भारत की धुन पर नहीं नाचेगा. नेपाल को भारत में किसी शेरपा नहीं, एक दोस्त की जरूरत है.
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मंजीत ठाकुर / संध्या द्विवेदी