गौतम बंबावाले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच हाल ही में चेन्नै में अनौपचारिक शिखर बैठक हुई. पिछले साल चीन के वुहान में हुई पहली शिखर बैठक की ही तरह इसमें भी दोनों शख्सियतों की खूबसूरत तस्वीरों के कई शानदार मौके आए. जमीनी हकीकत में यकीन रखने वाले लोग सवाल कर सकते हैं कि 'चेन्नै कनेक्ट' के ठोस नतीजे क्या थे और उससे क्या हासिल हुआ. इसके लिए पांच बातों की ओर सीधे तौर पर इंगित किया जा सकता है.
पहली, दोनों नेताओं ने अपने-अपने देशों की राष्ट्रीय परिकल्पनाओं और उन लक्ष्यों के बारे में विस्तार से चर्चा की, जिसमें उन्हें हासिल करने के तरीके भी शामिल थे. यह सामरिक संवाद सामने वाले पक्ष की गणना, रणनीति, तौर-तरीके और सोच का आकलन करने के लिए महत्वपूर्ण है. इस तरह के संवाद के जरिए भारत-चीन एक-दूसरे के प्रति समझ और भरोसा विकसित कर सकते हैं. यह ममल्लपुरम बैठक का सबसे अहम हिस्सा था.
दूसरी, मीडिया के सामने भारतीय पक्ष की ब्रीफिंग के आधार पर यह भी साफ हो गया कि दोनों नेता यह सुनिश्चित करने को राजी हो गए हैं कि सीमा के क्षेत्र शांतिपूर्ण बने रहें. पिछली वुहान बैठक के इस निष्कर्ष को आगे बढ़ाया जाएगा, जिससे यह संकेत मिल रहा है कि दोनों पक्ष सीमा के क्षेत्र में शांति सुनिश्चित करने को तत्पर हैं. इसके दोनों पक्षों के लिए सकारात्मक पहलू हैं. सैन्य आदान-प्रदान भी बढ़ाया जाएगा क्योंकि वह शांति की एक पूर्वशर्त सरीखा है.
तीसरी, व्यापार, निवेश और सेवाओं को लेकर एक नई 'उच्च स्तरीय' व्यवस्था स्थापित की गई है जिसका नेतृत्व चीन के उप-प्रधानमंत्री और हमारी वित्त मंत्री के पास होगा. इससे संकेत मिलता है कि चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को कम करने के लिए नेता तत्पर हैं. यह तभी हो सकता है, जब हम चीन को और ज्यादा सेवाएं बेचें या हम वहां से बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश को आकृष्ट करें. इसलिए इसे 'नई व्यवस्था' कहा जा रहा है. संदेहवादी कह सकते हैं कि इससे तो व्यापार घाटे का मसला और पीछे खिसक जाएगा, पर चीन से निवेश को आकर्षित करने के लिए हमें भी तो कुछ कदम उठाने होंगे ताकि पूंजी खाते से हमारा भुगतान संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती रहे. इस लिहाज से हमारे वित्त मंत्रालय की भूमिका अहम रहेगी.
चौथी बात, मोदी और शी ने इस बात को स्वीकार किया है कि हमारे देशों को बेहतर रिश्ता कायम करने और विश्वास बढ़ाने के लिए भारत तथा चीन के आम लोगों को आपस में और भी गर्मजोशी के साथ मेल-मुलाकात करनी होगी. यह भी वुहान में किए गए काम को ही आगे बढ़ाने वाली बात है. भारत ने संकेत दिया है कि वह और ज्यादा चीनी सैलानियों को भारत लाने के लिए कड़ी मेहनत करेगा. यह आसानी से हो भी सकता है अगर हम चीन में 'अतुल्य भारत' को बेचने के लिए एक निरंतर, सुस्पष्ट और लक्षित अभियान छेड़ें.
ऐसे किसी अभियान के नतीजे से हम अपने आप तक को अचंभित कर सकते हैं और अगले कुछ वर्षों में भारत आने वाले चीनी सैलानियों की संख्या को 2.5 लाख के मौजूदा स्तर से काफी बढ़ाकर आसानी से 15 लाख तक ले जा सकते हैं. इसी तरह, चीनी छात्रों को सहज ज्ञान पर आधारित एक मूल्यवर्धित पेशकश करने से हम उन्हें बड़ी संख्या में भारत में पढऩे के लिए आकर्षित कर सकते हैं. भारत-चीन के लोगों के बीच आदान-प्रदान को बढ़ाने के सरकारों के प्रयासों को दोनों देशों के निजी क्षेत्रों से भी थोड़ी मजबूती मिलने की जरूरत है.
आखिरकार यह शिखर बैठक एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक चलन का अहम हिस्सा बन गई है. खास तौर पर, जब देशों के बीच रिश्ते जटिल हों तो इस तरह की मुलाकातें नेतृत्व को लीक से हटकर कुछ सोचने का मौका देती हैं ताकि वे हमेशा पुरानी बातों से बंधकर ही न रह जाएं. हमारे संदर्भ में, यह महत्वपूर्ण है कि दोनों नेताओं ने रिश्ते की जिम्मेदारी अपने सिर ले ली है. यह हमारे रिश्तों के लिए अच्छी बात है.
नकारात्मक सोच रखने वाले लोग यह सवाल पूछने को मजबूर हो जाएंगे कि क्या चेन्नै में भारत-चीन के रिश्तों को परेशान करने वाले अहम मुद्दों में से किसी भी एक का समाधान निकालने में क्या कोई मदद मिली? जवाब है, नहीं. वैसे अगर आप खुद से यह सवाल करें कि क्या ममल्लपुरम से रिश्तों को एक संतुलन का भाव देने में क्या कोई मदद मिली है और उसमें आगे बढऩे का भाव है, तो जवाब स्पष्ट हां में ही होगा.
लेखक भूटान, पाकिस्तान और चीन में भारत के राजदूत रह चुके हैं. इस समय वे पुणे की सिंबायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी में विशिष्ट प्रोफेसर हैं
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