रॉबर्ट्सगंजः बीजेपी का दबदबा वाला क्षेत्र, क्या यह जादू कायम रहेगा

साहित्य जगत में रॉबर्ट्सगंज की अपनी विशिष्ट पहचान है. मशहूर साहित्यकार देवकीनंदन खत्री के सुप्रसिद्ध उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति के कथा की पृष्ठभूमि यहां का विजयगढ़ का किला रहा है. विजयगढ़ का यह मशहूर किला राबर्ट्सगंज के करीब और सोनभद्र जिले में ही स्थित है. यह शहर विन्ध्य और कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित है और यहां की गुफाओं के भित्ति-चित्रों और चट्टानों पर उकेरी गई चित्रकारी से इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि इसका प्रागैतिहासिक काल से रहा है.

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सांकेतिक तस्वीर (फाइल-PTI) सांकेतिक तस्वीर (फाइल-PTI)

सुरेंद्र कुमार वर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 04 फरवरी 2019,
  • अपडेटेड 5:35 PM IST

रॉबर्ट्सगंज उत्तर प्रदेश के उन चंद खूबसूरत संसदीय क्षेत्रों में से एक है जिन्हें प्रकृति ने खूबसूरती दी है, लेकिन यहां राजनीतिक उतार-चढ़ाव बना रहता है. रॉबर्ट्सगंज उत्तर प्रदेश के 80 में से 17 सुरक्षित संसदीय सीटों में से एक है. कांग्रेस 34 साल से यहां पर जीत नहीं सकी है तो बीजेपी 2019 के चुनाव में अपनी सीट बचाने की कोशिश में होगी.

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यह खूबसूरत शहर उत्तर प्रदेश के दक्षिणी पूर्वी कोने पर स्थित है. रॉबर्ट्सगंज शहर का नाम औपनिवेशिक काल के दौरान अंग्रेज फौज के फिल्ड मार्शल फ्रेडरिक रॉबर्ट के नाम पर रखा गया. साल 2011 की भारत की जनगणना के मुताबिक रॉबर्ट्सगंज, सोनभद्र जिले का एक नगरपालिका परिषद है.

साहित्य जगत में इस क्षेत्र की अपनी विशिष्ट पहचान है. मशहूर साहित्यकार देवकीनंदन खत्री के सुप्रसिद्ध उपन्यास चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति के कथा की पृष्ठभूमि यहां का विजयगढ़ का किला रहा है. विजयगढ़ का यह मशहूर किला राबर्ट्सगंज के करीब और सोनभद्र जिले में ही स्थित है. यह शहर विन्ध्य और कैमूर की पहाड़ियों के बीच स्थित है और यहां की गुफाओं के भित्ति-चित्रों और चट्टानों पर उकेरी गई चित्रकारी से इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि इसका प्रागैतिहासिक काल से रहा है.

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रॉबर्ट्सगंज में विजयगढ़ किले के अलावा सोढ़रीगढ़ का किला, वीर लोरिक का पत्थर, सलखन जीवाश्म पार्क, नगवा बांध, लखनिया दरी और रिहंद बांध घूमने की अन्य चर्चित जगह है.

राजनीतिक पृष्ठभूमि

यह संसदीय क्षेत्र 1962 में अस्तित्व में आया और तब से लेकर अब तक 15 बार यहां पर लोकसभा चुनाव हो चुके हैं जिसमें 5-5 बार बीजेपी और कांग्रेस ने कब्जा जमाया है. कांग्रेस को आखिरी बार यहां से 1984 में जीत मिली थी और इसके बाद से उसे यहां पर जीत नसीब नहीं हुई.

यहां की खास बात यह रही है 15 चुनावों में सिर्फ एक बार 1984 में ही यह सीट सामान्य वर्ग में शामिल की गई थी, इससे पहले और इसके बाद यह हमेशा सुरक्षित सीट के रूप में ही रहा. रॉबर्ट्सगंज से 2 लोगों ने चुनावी जीत की हैट्रिक लगाई है. पहले कांग्रेस के राम स्वरुप ने 1962, 1967 और 1971 में चुनावी जीत की हैट्रिक बनाई, इसके बाद 1996 से बीजेपी के रामशकल ने यह कारनामा दोहराया.

1962 में कांग्रेस के राम स्वरुप ने जनसंघ के सरबजीत को हराकर यहां से सबसे पहले सांसद बनने का गौरव हासिल किया. 1967 के चुनाव में भी यही परिणाम रहा. 1984 तक एक तरह से कांग्रेस का यहां दबदबा रहा क्योंकि 1962 से लेकर 1984 तक 6 चुनावों में 5 में जीत हासिल की थी. लेकिन 1989 में बीजेपी ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली. बीजेपी की ओर से सूबेदार प्रसाद ने कांग्रेस के तत्कालीन सांसद राम प्यारे पानिका को हराया था. हालांकि 1991 के चुनाव में सूबेदार जनता दल के उम्मीदवार राम निहोर से हार गए.

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56 साल पुराने यहां के संसदीय इतिहास में 44 साल बाद 1996 में हैट्रिक का कारनामा दोहराया गया जब किसी ने यहां पर चुनावी जीत की हैट्रिक बनाई हो. बीजेपी के रामशकल ने लगातार 3 चुनाव जीतने का रिकॉर्ड बनाया. उन्होंने 1996, 1998 और 1999 में लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की.

सामाजिक ताना-बाना

2011 की जनगणना के आधार पर रॉबर्ट्सगंज जिले की कुल आबादी 9,01,830 है जिसमें पुरुषों की आबादी 4,69,684 और महिलाओं की आबादी 4,32,146 है. जाति आधार पर देखा जाए तो यहां पर 59 फीसदी यानी 5,31,075 लोग सामान्य वर्ग से आते हैं, जबकि 23 फीसदी अनुसूचित जाति और 18 फीसदी अनुसूचित जनजाति की संख्या क्रमशः 2,08,257 और 1,62,498 है. क्षेत्र में हिंदू बहुसंख्यक हैं और इनकी आबादी 8,40,814 है जबकि मुस्लिमों की आबादी 52,976 और ईसाई समाज के 1,191 लोगों की है.

रॉबर्ट्सगंज में 5 विधानसभा क्षेत्र आते हैं जिसमें चकिया, घोरावल, रॉबर्ट्सगंज, ओबरा औहर दुद्धी शामिल है. चकिया विधानसभा क्षेत्र 2008 में अस्तित्व में आया. यह उत्तर प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्र में इसकी संख्या 383 है. फिलहाल इस सुरक्षित सीट पर भारतीय जनता पार्टी के शरद प्रसाद का कब्जा है. उन्होंने 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी जीतेंद्र कुमार को 20,063 मतों के अंतर से हराया था.

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घोरावल विधानसभा क्षेत्र भी 2008 में ही अस्तित्व में आया और इसकी सीट संख्या है 400. इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी के अनिल कुमार मौर्य का कब्जा है. उन्होंने 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी रमेश चंद्र को आसान मुकाबले में 57,649 मतों के अंतर से हराया था. रॉबर्ट्सगंज विधानसभा की बात करें तो 2008 से इसकी सीट संख्या 401 है और यहां पर भी बीजेपी का ही कब्जा है. भूपेश चौबे ने 2017 में सपा के अविनाश कुशवाहा को 40,538 मतों के अंतर से हराया था.

रॉबर्ट्सगंज के 5 विधानसभा क्षेत्रों में से ओबरा भी एक विधानसभा क्षेत्र है, जिसकी सीट संख्या 402 है और यहां से बीजेपी के संजीव कुमार विधायक हैं. 2017 के चुनाव में उन्होंने सपा के रवि गोंड को 44,269 मतों से हराया था. दुद्धी की सीट संख्या 403 है और इस सुरक्षित सीट से अपना दल (सोनेलाल) के हरिराम विधायक हैं और उन्होंने बसपा के विजय सिंह गोंड को नजदीकी मुकाबले में 1,085 मतों से हराया था. अपना दल का बीजेपी के साथ करार था.  

2004 में बीजेपी लगातार चौथी जीत के इरादे से उतरी थी, लेकिन वह शीर्ष 2 में भी नहीं आ सकी. बसपा के लालचंद्र ने सपा के पकौड़ी लाल को हरा दिया. 2007 के उपचुनाव में बसपा के भाईलाल ने सपा के पकौड़ी लाल को हराते हुए अपनी सीट बचाए रखी. 2009 के चुनाव में पकौड़ी लाल ने आखिरकार जीत हासिल करते हुए बसपा के राम चंद्र त्यागी को हरा दिया.

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2014 का जनादेश

रॉबर्ट्सगंज संसदीय क्षेत्र की बात करें तो इस समय यहां से भारतीय जनता पार्टी के छोटेलाल सांसद हैं. 2014 के आम चुनाव में छोटेलाल ने जीत हासिल की थी. छोटेलाल ने बहुजन समाज पार्टी के शारदा प्रसाद को हराया था.

चुनाव में छोटेलाल को 3,78,211 वोट मिले जबकि शारदा को 1,87,725 वोट हासिल हुआ. छोटेलाल ने 1,90,486 मतों के अंतर से यह जीत हासिल की थी. इससे पहले यहां पर सपा का कब्जा था.

सांसद का रिपोर्ट कार्ड

2014 में यहां का चुनावी परिदृश्य बदल गया और आम चुनाव में मोदी लहर का फायदा उठाते हुए यहां से बीजेपी ने 15 साल बाद वापसी करते हुए जीत हासिल कर ली और छोटेलाल सांसद बन गए. छोटेलाल ज्यादा शिक्षित नहीं हैं और वह पांचवीं क्लास तक पढ़े हैं. उन्होंने 1987 में पांचवीं की परीक्षा पास की थी. वह चकिया विधानसभा क्षेत्र से आते हैं. उनका पेशा खेती है.

8 जनवरी, 2019 तक उनकी उपस्थिति 88 फीसदी रही, जबकि इस दौरान उन्होंने महज 21 बहस में हिस्सा लिया. उन्होंने 47 सवाल पूछे. 2013-14 वित्त वर्ष में अपने आईटीआर में 1,99,333 रुपये आय दिखाया था. 2014 में चुनाव के दौरान इन पर किसी तरह का कोई आपराधिक रिकॉर्ड दर्ज नहीं था.

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2019 में सत्ता बचाए रखने के लिए बीजेपी की कोशिश होगी कि वह अपना पिछला प्रदर्शन यहां से दोहराए और जीत हासिल करे. प्रदेश में बदलते राजनीतिक समीकरण के बीच सपा-बसपा के गठबंधन और कांग्रेस में प्रियंका गांधी की एंट्री के बाद अब बीजेपी की राह यहां पर आसान नहीं दिख रही.

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