भाजपा और कांग्रेस के झगड़े से जेडीएस में जागी उम्मीद

मैसूर यूनिवर्सिटी के विद्वान विश्लेषक एन.एल. प्रकाश का मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की अगुआई में जेडी (एस) की ताकत बढ़ रही है. वे कहते हैं,  "दोनों राष्ट्रीय दलों में से कोई भी क्षेत्रीय पार्टी को नाराज नहीं करना चाहता.''

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मोर्चे पर चामुंडेश्वरी में प्रचार के दौरान कुमारस्वामी (बाएं) मोर्चे पर चामुंडेश्वरी में प्रचार के दौरान कुमारस्वामी (बाएं)

अरविंद गौडा / संध्या द्विवेदी / मंजीत ठाकुर

  • नई दिल्ली,
  • 02 मई 2018,
  • अपडेटेड 2:37 PM IST

कर्नाटक में सत्ताधारी कांग्रेस और भाजपा   के बीच की कड़ी टक्कर में जनता दल (सेकुलर) छुपा रुस्तम साबित हो सकता है. मतदान का दिन जैसे करीब आ रहा है, उसकी संभावनाएं हरी होने लगी हैं. टिकट बंटवारे को लेकर विरोधी कैंप में बागी हुए विधायकों की संख्या देखकर जेडी (एस) नेता कहने लगे हैं कि पार्टी 224 सदस्यीय विधानसभा में करीब 50 सीटें हासिल कर सकती है.

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अगर ऐसा होता है (जैसा 2008 में हुआ था जब जेडी (एस) ने 58 सीटें जीती थीं) तो कांग्रेस और भाजपा चुनाव के बाद जेडी (एस) के साथ गठबंधन करने को मजबूर हो जाएंगी.

मैसूर यूनिवर्सिटी के विद्वान विश्लेषक एन.एल. प्रकाश का मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा की अगुआई में जेडी (एस) की ताकत बढ़ रही है. वे कहते हैं,  "दोनों राष्ट्रीय दलों में से कोई भी क्षेत्रीय पार्टी को नाराज नहीं करना चाहता.''

दरअसल, लोगों का मानना है कि जेडी (एस) अपने पूर्व गढ़, पुराने मैसूर क्षेत्र में फिर से वर्चस्व बनाने लगा है, यही वजह है कि मुख्यमंत्री सिद्धरामैया ने बदामी से दूसरा नामांकन पत्र (मैसूर के चामुंडेश्वरी के अलावा) भरा है. मध्य कर्नाटक का यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्यमंत्री के लिए "सुरक्षित'' माना जा रहा है क्योंकि उनका कुरुबा (ओबीसी) समुदाय यहां भारी संख्या में है.

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लेकिन बेंगलूरू के एक जानकार ए. वीरप्पा के अनुसार सिद्धरामैया का दो जगह से चुनाव लडऩे का फैसला नुक्सानदेह साबित होगा और "किसी और जगह जेडी (एस) के पक्ष में वोट में बढ़ोतरी'' करेगा.

यह दलील प्रसन्ना कुमार, पी. रमेश, एल. रेवन्नासिद्घैया, एच. विश्वनाथ, शशिकुमार और अल्ताफ  खान के कांग्रेस से टिकट न मिलने के बाद जेडी (एस) की ओर रुख करने से और पुख्ता होती है. इसमें सिर्फ  कांग्रेस के ही नहीं, बल्कि इस कतार में प्रकाश खंडरे, पूर्व मंत्री रेवू नाइक बेलमागी, हेमचंद्रसागर और जीएच रामचंद्रप्पा जैसे भाजपा बागियों के नाम भी शामिल हैं जिन्होंने जेडी (एस) को अपनी निष्ठा सौंप दी है. कांग्रेस और भाजपा में बगावत जेडी (एस) के लिए अच्छी खबर है. देवेगौड़ा कहते हैं,  "मैं इन नेताओं के पार्टी के प्रति जताए गए विश्वास से खुश हूं''.

जेडी (एस) 2013 से 6 सीटों पर बना हुआ है. अब प्रतिद्वंद्वियों के बीच चल रहा घमासान मध्य कर्नाटक में इसे चार और सीटें हासिल करने में मदद करेगा. उदाहरण के लिए, शिकारीपुरा में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बी.एस. येदियुरप्पा के सामने जेडी (एस) के एच.टी. बालीगर कांग्रेस के नगरपालिका चुनाव के उम्मीदवार के मुकाबले बड़ी चुनौती हैं.

लेकिन पार्टी के सबसे ज्यादा सीट हासिल करने की संभावना पुराने मैसूर (59 सीट) में बन रही है. पार्टी को पूरा विश्वास है कि 2013 की 25 सीटों की इसकी तालिका में इस बार और नाम जुड़ेंगे.

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पूर्व मुख्यमंत्री और जेडी (एस) के राज्य अध्यक्ष एच.डी. कुमारस्वामी दो नजदीकी निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ रहे हैं—रामानगर और चन्नपत्ना.

लेकिन सिद्धरामैया जहां अपनी जीत को लेकर सशंकित हैं, वहीं जेडी (एस) इस क्षेत्र में अपार सफलता हासिल करने का दावा कर रहा है.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जेडी (एस) ने चुनाव के बाद के विकल्प खुले रखे हैं. अधिकांश जानकारों का मानना है कि अगर भाजपा और कांग्रेस की पराजय हुई तो कुमारस्वामी खुद मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश करते हुए सरकार बनाने के लिए भाजपा का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगे. जेडी (एस) के एक नेता के अनुसार यह स्थिति "भाजपा की कांग्रेस-मुक्त भारत बनाने की महत्वाकांक्षा का भी पोषण करेगी.''

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