2 जून 1995 की रात...
लखनऊ में राजभवन...
उस वक्त उत्तर प्रदेश के राज्यपाल कट्टर कांग्रेसी मोतीलाल वोरा थे. राजभवन के बाहर प्रदर्शनकारियों का जमावड़ा था और वोरा उनके लिए राजभवन के दरवाजे खोलने को तैयार नहीं थे. प्रदर्शनकारियों ने नवाब सआदत अली खान की महलनुमा रिहाइश और भव्य कोठी हयात बख्श के मेन गेट पर डेरा डाल रखा था.
प्रदर्शनकारियों की नारेबाजी का शोर बढ़ता जा रहा था. एक वरिष्ठ पत्रकार ने मेरी ओर रुख किया और कहा, "कोठी हयात बक्श का धरनों और हमलों का इतिहास है, यह कोठी वास्तव में 1857 के विद्रोह के दौरान ब्रिटिश सेना का मुख्यालय थी. 18 मार्च 1857 को स्वतंत्रता सेनानियों ने इस कोठी पर हमला किया था. यूनाइटेड प्रोविंस आगरा और अवध के गवर्नर का आवास रही यह कोठी 1947 में राजभवन बन गई. यूपी की पहली राज्यपाल सरोजिनी नायडू का अप्रैल 1948 को दिल का दौरा पड़ने के बाद निधन हो गया.”
अचानक नारेबाजी का शोर थम गया. चश्मा पहने और सफेद कुर्ता-धोती में आकर्षक मुस्कान वाला एक शख्स प्रदर्शनकारियों के बीच से खड़ा हुआ. मुझे याद है कि राम प्रकाश त्रिपाठी और ओम प्रकाश सिंह जैसे नेता भी वहां मौजूद थे, जिन्होंने बाद में यूपी बीजेपी में वरिष्ठ पद संभाले और राज्य कैबिनेट मंत्री के रूप में काम किया.
चश्मा पहने शख्स की बातों को सभी प्रदर्शनकारियों ने ध्यान से सुना. इस नेता की ओर से समझाया जा रहा था कि उन्होंने राजभवन पर धरना देने का फैसला क्यों किया. इस नेता ने राज्यपाल से मिलने के लिए समय देने की मांग की. साथ ही कहा कि कि 2 जून भारतीय लोकतंत्र के लिए एक काला दिन था क्योंकि कुछ घंटे पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कथित तौर पर अपने दबंगों के जरिए समाजवादी पार्टी की गठबंधन में सहयोगी बीएसपी नेता मायावती के ऊपर हमला कराया था. ये हमला मीरा बाई स्टेट गेस्ट हाउस में कथित तौर पर इसलिए कराया गया था क्योंकि मायावती की ओर से तत्कालीन राज्य सरकार से समर्थन वापस लेने की योजना बनाई जा रही थी.
"मायावती के लिए न्याय" सुनिश्चित करने के लिए तत्कालीन राज्यपाल वोरा से दखल की मांग के लिए राजभवन में बीजेपी के धरने का नेतृत्व करने वाले चश्मा पहने नेता और कोई नहीं पार्टी के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष कलराज मिश्र थे.
संयोग देखिए, आज 25 साल बाद वही कलराज मिश्र खुद राजस्थान के राज्यपाल हैं. जयपुर में राजभवन के बाहर लॉन में पिछले शुक्रवार को राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों के धरने का सामना किया. प्रदर्शनकारी विधायकों की मांग थी कि राज्यपाल भारत के संविधान के मुताबिक न्याय प्रदान करें और राज्य विधानसभा का सत्र बुलाएं.
1995 में लखनऊ में गवर्नर वोरा ने प्रदर्शनकारियों के विरोध को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. इसके विपरीत पिछले शुक्रवार को कलराज मिश्र ने लॉन में धरने पर बैठे कांग्रेसी विधायकों के लिए बिस्कुट भिजवाए. कलराज मिश्र अपने सहायकों के साथ खुद सामने आए और उन्होंने अपनी स्थिति साफ करने की कोशिश की.
गहलोत कैबिनेट की सिफारिश के बावजूद मिश्र विधानसभा का सत्र नहीं बुलाने के लिए दृढ़ता दिखा रहे हैं. वो शायद पहले राज्यपाल होंगे जो विधानसभा सत्र नहीं बुला रहे या सरकार के आंकड़े डांवाडोल होने की वजह से विश्वासमत हासिल करने का आदेश नहीं दे रहे.
राजस्थान: कैबिनेट ने फिर भेजा सत्र बुलाने का प्रस्ताव, मंत्री बोले- राज्यपाल कौन होते हैं?
पिछले दो दशकों में मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच टकराव की कई घटनाएं हुईं. लेकिन मुझे ऐसे राज्यपाल याद नहीं आते जिनकी पूर्ववर्ती पार्टी राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी की विरोधी हो और विश्वास मत पर जोर नहीं दे रही हो.
एक संकट मंडरा रहा था और कलराज मिश्रा ने डॉटेड लाइन पर हस्ताक्षर नहीं करके टकराव की स्थिति बनने दी. मिश्र चाहते हैं कि गहलोत स्पष्ट करें कि वह सत्र को तत्काल क्यों बुलाना चाहते हैं, क्या वह विश्वास मत के लिए जाना चाहते हैं जबकि सत्र के लिए सोशल डिस्टेंसिग प्रोटोकॉल्स अभी तय नहीं किए गए हैं.
कलराज मिश्र- सर्वोत्कृष्ट पैरोकार
यूपी, मिश्र के गृह राज्य के कई लोग कहते हैं कि ये वो मिश्र नहीं हैं जिन्हें वो जानते हैं. क्योंकि राजनीति में उनका रुख कभी टकराव वाला नहीं रहा है. यहां तक कि गहलोत के साथ भी कहा जाता है कि उन्होंने सौहार्दपूर्ण कामकाजी संबंध बनाए हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि हाल ही में राज्यसभा चुनावों से पहले जब गहलोत और सचिन पायलट कैम्प के बीच खिंचाव बढ़ गया था, उससे पहले तक मुख्यमंत्री मुद्दों पर चर्चा के लिए राजभवन आते थे, कभी-कभी बिना किसी विशेष एजेंडे के भी. नियुक्तियों जैसे प्रशासनिक और विधायी मुद्दों पर दोनों सौहार्दपूर्ण ढंग से बात करते थे और रास्ता निकालते थे.
ऐसा दो बार हो चुका है कि गहलोत जल्दी में थे और सत्र बुलाना चाहते थे लेकिन राज्यपाल ने इनकार कर दिया.
जो लोग मिश्र को बेहतर जानते हैं वे कहते हैं कि वह बदले नहीं हैं और न ही हठी हुए हैं. वह वही हैं जो वह हमेशा से रहे थे- परफेक्ट पार्टी मैन. मुख्यमंत्री और गवर्नर के बीच राजस्थान में जो टकराव उभरा है, वो अकेला उदाहरण है.
2 जून 1995 को एक अखबार के फोटोग्राफर की ओर से खींची गई लखनऊ राज भवन की एक तस्वीर उत्सुकता से कांग्रेसियों की ओर से प्रसारित की जा रही है. इसके साथ ही वो विधायकों के गवर्नर हाउस पर धरने को लेकर मिश्र के आहत होने की बात पर सवाल उठा रहे हैं.
जून 1995 की उस तस्वीर में कमीज और ट्राउजर पहने हुए एक युवक मिश्र के पीछे खड़े नजर आते हैं. वो विजय पाठक हैं, जो अब यूपी बीजेपी इकाई के सचिव हैं. अगर मिश्र ने राज्य की राजनीति से राज्य कैबिनेट और राज्यसभा और फिर पीएम मोदी की कैबिनेट और अब राजस्थान के राजभवन तक यात्रा की, तो पाठक अधिकतर अवधि के लिए उनके भरोसेमंद सहयोगी रहे.
जून 1995 की रात को याद करते हुए पाठक ने कहा, “मीरा बाई स्टेट गेस्ट हाउस में मायावती जी पर हमला किया गया था. हमारी पार्टी के वरिष्ठ ब्रह्मदत्त द्विवेदी ने हमलावरों को चुनौती दी और मायावती को गेस्ट हाउस से बाहर निकाला. लालजी टंडन, जिनका हाल ही में निधन हो गया, ने उनकी हिफाजत की. पार्टी की राज्य इकाई के प्रमुख मिश्र को तब पार्टी ने राज्यपाल वोरा पर दखल देने के लिए दबाव बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंपी.”
राजस्थान में अब सत्ता की लड़ाई सड़क पर लड़ी जाएगी?
इससे कई साल पहले, अक्टूबर 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम यादव ने उन कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जो आडवाणी की राम मंदिर रथ यात्रा के समाप्त होने पर अयोध्या पहुंचे थे. फिर यूपी सांप्रदायिक झड़पों का गवाह बना. 42 जिलों में कर्फ्यू लगा दिया गया. बीजेपी के टॉप नेता एहतियाती हिरासत में थे. उस वक्त पार्टी रणनीति के तहत कलराज मिश्र भूमिगत हो गए नेताओं के बीच समन्वय करते रहे.
मिश्र अक्टूबर 1997 में कल्याण सिंह सरकार में मंत्री थे. असेंबली हॉल के अंदर टकराव भड़क उठा. विधायक ने फाइलों और कुर्सियों को उछालना शुरू कर दिया. फिर उन्होंने माइक्रोफोन उखाड़ कर स्पीकर की ओर फेंकना शुरू कर दिया. उस वक्त इस हंगामे में ऐसी ही एक मिसाइल मिश्र को भी लगी तब वो विधायकों को शांत होने के लिए कह रहे थे.
बीजेपी के पुराने नेताओं का कहना है कि कलराज मिश्र को एक "ब्राह्मण नेता" के रूप में जाना जाता था, जब यूपी एक ही जाति के दो पार्टी दिग्गजों - अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी के लिए घरेलू पिच था. बीजेपी और मंडल-कमंडल की राजनीति में कल्याण सिंह के उदय ने उच्च जाति और कलराज जैसे नेताओं के प्रभुत्व को कम कर दिया. लेकिन उन्होंने मौन रह कर स्वीकार कर लिया कि पार्टी ने उन्हें क्या पेशकश की है.
2014 में कलराज मिश्र ने देवरिया लोक सभा सीट जीती. 2016 में वह 75 वर्ष के हो गए. जब प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक ऑफिस के लिए उम्र की सीमा तय की, तो मिश्र ने मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने की पेशकश की. लेकिन यूपी चुनाव नजदीक थे, इसलिए पार्टी हाईकमान ने ‘राज्य के ब्राह्मण चेहरे’ को इंतजार करने के लिए कहा. 2017 में उन्होंने MSME मंत्रालय छोड़ा. जुलाई 2019 में उन्हें हिमाचल के राज्यपाल के रूप में भेजा गया. दो महीने बाद उन्हें जयपुर राजभवन भेजा गया. मोदी-शाह की जोड़ी की ओर से संचालित बीजेपी में मिश्र के हक में जिस चीज ने काम किया, वो थी अपनी पार्टी और नेताओं को कभी न कहने का गुण.
मिश्र के लिए जयपुर देखीभाली पिच थी. वह वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री रहते वक्त राजस्थान के लिए बीजेपी के केंद्रीय प्रभारी थे. राजे जैसी शक्तिशाली मुख्यमंत्री क्षेत्रीय क्षत्रप की तरह ऑपरेट करने के लिए जानी जाती थीं, फिर भी कलराज मिश्र उनके साथ अच्छे कामकाजी संबंध बनाने में कामयाब रहे.
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “राजनाथ सिंह, लालजी टंडन और कलराज मिश्र में उम्र का अंतर था लेकिन उन्हें सहकर्मी माना जाता था. सिंह और टंडन स्टैंड ले सकते थे. उन्होंने कल्याण सिंह के सीएम रहते अपनी बातें जोर देकर दर्ज कराईं लेकिन गैर-आक्रामक मिश्र ने पार्टी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन नहीं किया.
वयोवृद्ध बीजेपी एक्टिविस्ट अविनाश पांडे एक कहते हैं, “कलराज जी एक प्रोटोकॉल और सर्वसम्मति वाले व्यक्ति थे. वह विवादों को सुलझा सकते थे. पार्टी के एजेंडे को समझाने के लिए घंटों कार्यकर्ताओं से बात करते थे. उन्होंने आरएसएस के रास्ते जनसंघ (बीजेपी का पूर्व अवतार) में एंट्री ली थी. बीजेपी में लोग उन्हें स्कूटर पर यात्रा करते, बैठकें कराने के तौर पर याद करते हैं कि कैसे वह शीर्ष नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच एक कड़ी के रूप में कार्य करते रहे.”
राजस्थान में आज बीजेपी के पास विश्वास मत में गहलोत को हराने के लिए संख्या नहीं है. इसके लिए समय चाहिए. एक सत्र के लिए राज्य सरकार के अनुरोध का अध्ययन करने के लिए राज्यपाल मिश्र अपना वक्त ले रहे हैं. मिश्र के लिए पार्टी में रहते हुए सौंपी गई पिछली जिम्मेदारियां कम जटिल थीं. उन्हें तब सिर्फ उस लक्ष्मण रेखा का पालन करना होता था जो पार्टी या नेतृत्व उनके लिए तय कर देता था. आज उनके हाथ में भारत का संविधान है और दिल में बीजेपी है.
राहुल श्रीवास्तव