मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को चौका लगाने से रोकने की कोशिश में जुटी हुई है. इसीलिए पार्टी ने चुनावी पिच पर कैंपेन की कमान ऐसे शख्स के हाथों में दी है, जो क्रिकेट के दांव पेंच से वाकिफ है और विरासत में मिले राजघराने के अनुभव से भगवा पार्टी को चौथी बार शासन में आने से रोकने की कोशिश में है.
यह शख्स हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिन्हें कांग्रेस पार्टी ने राज्य में कैंपेन कमेटी का चेयरमैन नियुक्त किया है. राज्य में चुनाव अभियान पर करीब से नजर रखने वाले मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के सदस्य और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के सचिव पद से इस्तीफा दे चुके ज्योतिरादित्य मान रहे हैं कि पार्टी पिछला चुनाव गुटबाजी की वजह से हारी थी, इसलिए राज्य की कांग्रेस में एकजुटता कायम करना उनके लिए बड़ी चुनौती है.
हाल ही में मध्य प्रदेश के टिकट फाइनल करने के लिए दिल्ली में हो रही बैठक में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया राहुल गांधी के सामने ही आपस में ही भिड़ गए थे. दिग्विजय ने इन चुनावों में न उतरने का फैसला किया है, लेकिन वह कुछ उम्मीदवारों की सिफारिश कर रहे थे. इन दोनों के अलावा राज्य में एक धड़ा कमलनाथ का भी माना जाता है. ऐसे में सिंधिया के सामने इस फ्रंट पर चुनौती काफी मुश्किल है.
अस्तित्व का सवाल और वर्चस्व की धारा
देश में 1971 में आधिकारिक तौर पर राज-रजवाड़ों का अस्तित्व खत्म हो गया, लेकिन कुछ राज परिवारों ने दूसरे कार्य क्षेत्रों में पैर जमाने शुरू किए ताकि वे वर्चस्व की धारा में बने रहें. इस सूची में सिंधिया परिवार सबसे पहले पायदान पर है जो संसदीय राजनीति का हिस्सा बन गया.
गुना से सांसद और ग्वालियर राजघराने से ताल्लुक रखने वाले ज्योतिरादित्य का जन्म 1 जनवरी 1971 को हुआ था. उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे हैं जिसकी विरासत को ज्योतिरादित्य आगे लेकर बढ़ रहे हैं. ज्योतिरादित्य की एक बुआ वसुंधरा राजे सिंधिया अभी राजस्थान की मुख्यमंत्री हैं. दूसरी बुआ यशोधरा राजे सिंधिया मध्य प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं.
ज्योतिरादित्य सिंधिया को 2001 में पितृ शोक का सामना करना पड़ा. मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार रहे ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया 30 सितंबर 2001 एक विमान हादसे में अपनी जान गंवा बैठे थे. इस दर्दनाक हादसे के बाद ज्योतिरादित्य ने विरासत में मिले रास्ते पर ही चलने का फैसला किया. स्टेनफोर्ड हार्वर्ड से पढ़कर लौटे ज्योतिरादित्य को पिता के अधूरे सपनों को पूरा करने की चुनौती मिली. महल की विरासत के साथ जूनियर सिंधिया को अपने पिता की राजनैतिक विरासत भी संभालनी पड़ी.
गुना से चौथी बार लोकसभा सदस्य चुने गए ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने कांग्रेस में एकजुटता कायम करने के साथ मध्य प्रदेश जैसे बहुलतावादी राजनीतिक परिदृश्य में समान विचारधारा वाले दूसरे दलों के साथ भी सामजस्य स्थापित करना है. हालांकि राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का साथ नहीं मिला, लेकिन इससे ज्यातिरादित्य निराश नहीं हैं.
राजनीति को अपार संभावनाओं का खेल कहा जाता है और उनका मानना है कि मध्य प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ने के बसपा सुप्रीमो मायावती के फैसले का सम्मान करना चाहिए. उन्हें उम्मीद है कि विधानसभा चुनावों में भले ही बसपा का साथ नहीं मिला, लेकिन 2019 के आम चुनावों में मायावती जरूर कांग्रेस के साथ होंगी. केंद्र की पिछली यूपीए सरकार में दो बार केंद्रीय मंत्री रहे ज्योतिरादित्य की शायद यही दूरदर्शिता उन्हें लंबे रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है.
जीत के लिए टीम भावना जरूरी
नेतृत्व करने वाले की सबसे बड़ी खासियत होती है कि सफलता का श्रेय अपनी टीम को दे और हार की जिम्मेदारी स्वयं वहन करे. बहरहाल, मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणाम ही बता पाएंगे कि टीम को एक साथ लेकर चलने के इस फॉर्मूले पर कितना ईमानदारी से अमल किया गया, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया जिस तरीके से पूरे चुनावी अभियान को एक ‘संयुक्त ईकाई’ का प्रयास मान रहे हैं वह इसका संकेत है कि वे टीम भावना के साथ काम करने में कितना भरोसा रखते हैं.
बीजेपी जीती नहीं, कांग्रेस हारी
एक टीवी चैनल के साथ बातचीच में ज्योतिरादित्य सिंधिया कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि पहले हमने संभवतः एक संयुक्त इकाई के रूप में काम नहीं किया है. हम शायद अपने सर्वोत्तम प्रयासों को एक साथ नहीं रखा सके. मुझे लगता है कि गुटबाजी ने एक बड़ी भूमिका निभाई. मैं किसी एक्स या वाई पर आरोप नहीं लगा रहा हूं बल्कि हम सभी दोषी हैं. हम में वो क्षमता है कि हम मतदाताओं पर असर डाल सकते हैं और हमें अपने एजेंडा पर विश्वाहस है. मुझे लगता है कि यह पिछले 3 चुनावों में बीजेपी की जीत नहीं हुई है, मुझे लगता है कि यह कांग्रेस की हार है.
वरुण शैलेश