चुंबकीय ताकत से पटरियों के ऊपर उठकर चलने वाली मैग्लेव ट्रेन को चलाने के लिए डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट यानी डीपीआर बनाने का जिम्मा रेलवे पीएसयू राइट्स को सौंपे जाने की तैयारी कर ली गई है. रेल मंत्रालय ने इस बाबत मन बना लिया है और इसके लिए कागजी खाना पूरी की जा रही है. इसके अलावा हवा से बातें करने वाली नेट की स्पीड से चलने वाली मैग्लेव ट्रेन की भारी लागत को देखते हुए रेलवे ने इस प्रोजेक्ट को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए पूरा करने का फैसला किया है.
भारतीय रेलवे के एक आला अफसर से मिली जानकारी के मुताबिक रेलवे के फाइनेंस डिपार्टमेंट को इस बारे में एक औपचारिक प्रस्ताव भेज दिया गया है. इस प्रस्ताव में बताया गया है कि देश में मैग्लेव ट्रेन चलाने के लिए काफी मोटी रकम चाहिए होगी और इसके लिए पूरी तरह से कोई भी निजी कंपनी आगे आने को तैयार नहीं है लिहाजा इस प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने के लिए इसे पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के जरिए बनाया जा सकता है. पीपीपी मोड में मैग्लेव ट्रेन प्रोजेक्ट में जहां एक तरफ निजी कंपनी को बहुत मोटी रकम खर्च करने की जरूरत नहीं होगी तो वहीं दूसरी तरफ रेलवे इस प्रोजेक्ट के लिए जरूरी जमीन और आवश्यक धन राशि में भी हाथ बताएगी. फाइनेंस डिपार्टमेंट से सहमति मिलने के बाद प्रोजेक्ट को रेलवे बोर्ड की अनुशंसा के लिए भेजा जाएगा.
रेलवे के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक मैग्लेव ट्रेन में खुद पीएमओ को काफी रुचि है लिहाजा इस प्रोजेक्ट पर तेजी से काम शुरू करने के लिए रेल मंत्रालय पर जाने अनजाने में दबाव है. ऐसा कहा जा रहा है मैग्लेव ट्रेन के पीपीपी का पूरा रोड मैप राइट्स से बनवाया जाएगा. राइट्स अपनी रिपोर्ट में इस बात का भी अध्ययन करेगा कि किस रूट पर इसे बनाया जाए और इस प्रोजेक्ट में कुल कितनी लागत आएगी. कल संभावित रूट पर मैग्लेव ट्रेन बनाने वाली कंपनी को नुकसान की संभावना बनती है ऐसी सूरत में रेलवे एकमुश्त वायबिलिटी गैप फंडिंग (वीजीएफ)दे सकता है. इसके अलावा इस प्रोजेक्ट में इस बात की भी संभावना है कि रेलवे अपनी तरफ से जमीन का अधिग्रहण करें और फिर उसमें निर्धारित निर्माण कार्य भी करें. इसी के साथ इस बात को भी तय किया जाएगा की मैग्लेव ट्रेन चलाने की तकलीफ देने वाली कंपनी की लाभ में क्या भागीदारी होगी.
मैग्लेव ट्रेन को 400 किलोमीटर से लेकर 500 किलोमीटर प्रति घंटे क रफ्तार पर चलाया जाएगा. दुनियाभऱ में मैग्लेव ट्रेन की तकनीक चुनिंदा देशों के पास ही है. ये देश हैं जर्मनी, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूएसए. चीन में शंघाई शहर से शंघाई एयरपोर्ट के बीच मैग्लेव ट्रेन चलती है और ये ट्रैक महज 38 किलोमीटर का है. मैग्लेव तकनीक से ट्रेन चलाने का सपना जर्मनी, यूके और यूएसए जैसे कई देशों ने देखा लेकिन तकनीकी कुशलता के बावजूद इसकी लागत और बिजली की खपत को देखते हुए ये सफल नहीं रही. दुनिया भर में कामर्शियल तरीके से ये सिर्फ और सिर्फ तीन देशों चीन, दक्षिण कोरिया और जापान मे ही चल रही है.
मोनिका शर्मा / सिद्धार्थ तिवारी