फिल्म समीक्षा: दिलचस्प है 'एंग्री इंडियन गॉडेसेस', रियल मुद्दों का काल्पनिक ट्रीटमेंट

bशॉर्ट और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के स्पेशलिस्ट डायरेक्टर 'पैन नलिन' ने इस बार महिलाओं और उनसे जुड़े भावों के साथ पूरी फिल्म बनाई है, क्या उनका ये प्रयास दर्शकों तक सटीक पहुंच पाएगा?

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ब्रजेश मिश्र

  • मुंबई,
  • 04 दिसंबर 2015,
  • अपडेटेड 12:39 PM IST

फिल्म का नाम: एंग्री इंडियन गॉडेसेस
डायरेक्टर: पैन नलिन
स्टार कास्ट: संध्या मृदुल, सारा जेन डियाज, अनुष्का मनचंदा, अमृत मघेरा, तनिष्ठा चटर्जी, राजश्री देशपांडे, पवलीन गुजराल
अवधि: 2 घंटा
सर्टिफिकेट: A
रेटिंग: 3 स्टार

शॉर्ट और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के स्पेशलिस्ट डायरेक्टर 'पैन नलिन' ने इस बार महिलाओं और उनसे जुड़े भावों के साथ पूरी फिल्म बनाई है, क्या उनका ये प्रयास दर्शकों तक सटीक पहुंच पाएगा? आइए फिल्म की समीक्षा करते हैं-

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कहानी-
यह कहानी 7 अलग-अलग महिलाओं की है जो अपनी जिंदगी में कार्यरत हैं, जिनमें एक कंपनी की सीईओ सुरंजना (संध्या मृदुल), बॉलीवुड में एक्टिंग का सपना देखने वाली जोआना (अमृत मघेरा), अपना सिंगिंग एल्बम निकालने की चाह रखने वाली स्टेज सिंगर मधुरीता (अनुष्का मनचंदा), सामाजिक कार्यकर्ता नरगिस नसरीन (तनिष्ठा चटर्जी), शादी के बाद पारिवारिक कलह में फंसी पामेला जसवाल (पवलीन गुजराल), गोवा में रहने वाली फ्रीडा (सारा जेन डियाज) और फ्रीडा की घरेलू नौकर लक्ष्मी (राजश्री देशपांडे) हैं. फिल्म की शुरुआत इन सभी महिलाओं के अपने स्ट्रगल से होती है और उसी बीच फ्रीडा अपनी सभी दोस्तों को अपनी शादी का सरप्राईज देने के लिए गोवा बुलाती है और फिर कहानी शुरू हो जाती है, कई सारे ट्विस्ट और मोड़ आते हैं और आखिरकार एक रिजल्ट सामने आता है जिसे जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.

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स्क्रिप्ट-
फिल्म की स्क्रिप्ट पूरी तरह से महिला प्रधान है, किस तरह से एक लड़की को किन-किन रास्तों से गुजरना पड़ता है, और उनकी जिंदगी में कैसे कैसे उतार चढ़ाव आते हैं, उसे फिल्म में दर्शाया गया है . एडल्ट कॉन्टेंट होने की वजह से आपको कई सारी एडल्ट बातें और दृश्य सामने नजर आएंगे, जिनके संवाद ज्यादातर 'म्यूट' किये हुए दिखते हैं. फिल्म का इंटरवल से पहले का हिस्सा लड़कियों की निजी जिंदगी और फिर एक दूसरे के साथ मिलन तक पहुंचता है लेकिन सेकंड हाफ में कहानी बहुत सारे करवट लेती है, जिनमें से मुद्दे तो रियल लेकिन उनका ट्रीटमेंट काफी काल्पनिक सा नजर आता है. फिल्म के राइटर पैन नलिन ने हर किरदार को अपना अपना दुःख सुनाने का पूरा वक्त दिया है , साथ ही साथ कुछ अहम मुद्दों पर आँखें खोलने का प्रयास भी किया है. स्क्रिप्ट में एक बच्ची को माँ- बाप का प्यार ना मिल पाना, एक लड़की को कोर्ट से इन्साफ ना मिल पाना, राह चलते लड़की को छेड़ना, लड़कियों को हेय दृष्टि से देखने जैसी घटनाओं को दर्शाया गया है.

अभिनय-
फिल्म की कास्टिंग दुरुस्त है और हरेक एक्टर ने उम्दा काम किया है चाहे वो संध्या मृदुल, सारा जेन डियाज, अनुष्का मनचंदा, अमृत मघेरा, तनिष्ठा चटर्जी, पवलीन गुजराल हो या फिर कामवाली बाई के रूप में राजश्री देशपांडे. सभी एक्ट्रेसेस का काम सराहनीय है. साथ ही पुलिस अफसर के रूप में आदिल हुसैन ने एक बार फिर से अपनी उम्दा एक्टिंग का हुनर दिखाया है.

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संगीत-
फिल्म का संगीत प्लॉट के हिसाब से सही है और गीतों को अच्छे तरीके से पैन नलिन ने कहानी में पिरोया है.

कमजोर कड़ी-
फिल्म की कमजोर कड़ी इसका आखिरी हिस्सा है जब चर्च के भीतर किसी की मौत पर कोई कोंकणी गीत जाता हुआ आए और पुलिस के पूछने पर चर्च के भीतर खड़े लोग अचानक से एक स्वर में खड़े हो जाएं और किसी और के द्वारा किए गए काम को अपने ऊपर ले लें. यह वास्तविकता के परे नजर आता है. कहानी का ये भाग और भी बेहतर लिखा जा सकता था.

क्यों देखें-
अच्छे अभिनय और जरूरी मुद्दे वाली कहानियों से इत्तेफाक रखते हैं, तो यह फिल्म एक बार जरूर देखें.

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