उत्तर प्रदेश में भी देश के अन्य हिस्सों की तरह 4 मई की सुबह दस बजे से शराब दुकानों पर भारी भीड़ उमड़ पड़ी. लॉकडाउन में शराब के लिए तरस रहे लोग दुकानों के सामने फिजिकल डिस्टेंसिंग की हिदायतों को दरकिनार कर लाइन में लगे थे. गाजीपुर समेत कई जगहों पर पुलिस ने लोगों को अलग-अलग करने के लिए बल प्रयोग किया. लोग शराब का पूरा कैरेट खरीद रहे थे. दुकानों में स्टॉक कम पड़ने लगा तो राज्य के आबकारी विभाग ने एक बार में शराब खरीदने की लिमिट तय कर दी. आलम यह था कि अकेले लखनऊ में शाम सात बजे तक साढ़े पांच करोड़ रुपए तक की शराब बिक चुकी थी.
इसके अलावा मेरठ, आगरा, समेत करीब दर्जन भर जिले ऐसे थे जहां पर लॉकडाउन लागू होने के बाद शुरू हुई शराब बिक्री के पहले दिन पांच करोड़ रुपए से ज्यादा की शराब बिक चुकी थी. आबकारी विभाग के एक अनुमान के अनुसार, 4 मई को 300 करोड़ रुपए से ज्यादा की शराब बिक गई. प्रदेश में पहले कभी इतनी शराब एक दिन में नहीं बिकी थी, वह भी तब जब बहुतायत खपत वाले होटल, रेस्तरां आदि कोरोना वायरस संक्रमण के चलते लॉकडाउन में बंद हैं.
4 मई को राज्य में शराब की बिक्री से आबकारी विभाग को सवा सौ करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त होने का अनुमान है. लॉकडाउन के बाद यह पहला मौका था, जब किसी मद में राज्य सरकार को एक दिन में इतना राजस्व प्राप्त हुआ. अप्रैल के राजस्व के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि वित्तीय वर्ष के पहले महीने में लॉकडाउन के चलते तय राजस्व का महज 1.2 फीसद सरकार को मिल पाया (देखें बॉक्स). आबकारी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, शराब की बिक्री बंद होने से सौ करोड़ रुपए रोज के राजस्व का नुक्सान हो रहा था. लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मनीष हिंदवी कहते हैं, ''शराब की बिक्री से मिलने वाले राजस्व से सरकारी खजाने को कुछ बल तो मिलेगा पर लॉकडाउन से हो रहे घाटे को भरने के लिए सरकार को जीएसटी और वैट में तेजी लाने की कोशिश करनी चाहिए.'' खजाने की खस्ता हालत को सुधारने के लिए पेट्रोल-डीजल पर वैट और शराब के दाम बढ़ाने के बाद सरकार कुछ और कड़े कदम उठाने की सोच रही है.
उद्योगों पर फोकस
अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार शर्तों और प्रतिबंधों के तहत उद्योगों के संचालन की अनुमति दे रही है. दुग्ध, कांच, एल्युमीनियम, मोबाइल निर्माण समेत डेढ़ दर्जन से अधिक श्रेणी के उद्योगों को यूपी सरकार ने संचालन की अनुमति दी है. इन उद्योगों को केंद्र सरकार की ओर से जारी दिशा निर्देश और लॉकडाउन के लिए बनाए गए 'स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर' (एसओपी) का पूरी तरह से पालन करना होगा. हालांकि उद्योगों को चला कर अर्थव्यवस्था को कुछ राहत देने की सरकारी मंशा पर सवाल भी उठ रहे हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के पूर्व प्रोफेसर रमेश सिंह बताते हैं, ''बेरोजगार मजदूरों के दबाव में यूपी सरकार उद्योगों को तो चला रही लेकिन खपत को बढ़ाने के लिए कोई रोडमैप लेकर सामने नहीं आई है. जब तक खपत नहीं बढ़ेगी तब तक जीएसटी और वैट में बढ़ोतरी नहीं होगी. सरकार को सबसे अधिक राजस्व इन्हीं दोनों मद में मिलता है.''
खजाने को दुरुस्त करने के लिए प्रदेश सरकार कई स्तरों पर कार्य कर रही है. वित्त विभाग में कार्यरत एक अधिकारी बताते हैं, ''चालू वित्तीय वर्ष के बजट में प्रदेश की जीएसडीपी 19,40,527 करोड़ रुपए रहने का अनुमान लगाया गया है. प्रदेश सरकार इसके तीन फीसद के बराबर ऋण ले सकती है. इस तरह वर्ष भर में 58 हजार करोड़ रुपए तक ऋण लिया जा सकता है.'' वैसे सभी तरीकों से राजस्व में पर्याप्त बढ़ोतरी न होता देख प्रदेश सरकार ऋण सीमा जीएसडीपी के तीन फीसद से बढ़ाकर पांच फीसद करने के लिए केंद्र सरकार से आग्रह करने पर विचार कर रही है. ऐसा होने पर राज्य सरकार को 58,000 करोड़ रुपए की जगह 97 हजार करोड़ रुपए ऋण के रूप में मिल जाएंगे. प्रदेश सरकार को चालू वित्तीय वर्ष में नेशनल स्मॉल सेविंग फंड (एनएसएसफ) में 5,000 करोड़ रुपए से कुछ अधिक मूलधन और 4,800 करोड़ रुपए ब्याज के रूप में अदा करना है. प्रदेश सरकार इस रकम की अदायगी को एक वर्ष के लिए स्थगित करने के लिए केंद्र सरकार से निवेदन करने पर भी विचार कर रही है.
कम होंगे खर्चे
वित्त मंत्री सुरेश खन्ना ने सभी विभागों को अपने खर्चे कम करने की योजना बनाने के लिए पत्र लिखा है. सरकार अधिकारियों, कर्मचारियों आदि की विभिन्न यात्राएं और प्रशिक्षण, सामान्य तबादले आदि पर रोक लगाने पर विचार कर रही है. फरवरी में पेश बजट में इसके जरिए करीब 1,000 करोड़ रुपए बचने का अनुमान लगाया गया है. सरकार की आय का सबसे ज्यादा हिस्सा वेतन और पेंशन में जाता है (देखें ग्राफिक्स). राज्य सरकार ने इस वर्ष कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर 1.60 लाख करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान बजट में रखा था.
अब कोरोना संक्रमण बढऩे के बाद सरकारी खजाने को बदहाली से निकालने के एक कदम के रूप में राज्य सरकार ने केंद्र सरकार की तर्ज पर अगले डेढ़ साल के लिए राज्य कर्मचारियों और पेंशनरों का महंगाई भत्ता (डीए) और महंगाई राहत (डीआर) न बढ़ाने का फैसला लिया है. इस फैसले से प्रदेश के 16 लाख कर्मचारियों और करीब 12 लाख पेंशनरों को झटका लगा है. इस फैसले के खिलाफ लॉकडाउन में भी कर्मचारी प्रदर्शन कर रहे हैं, पर सरकार के लिए फौरी राहत यह है कि इसने सरकारी खजाने में 10,000 करोड़ से अधिक बचाए हैं.
महामारी की स्थिति गंभीर होने पर राज्य सरकार 1 जुलाई से होने वाली तीन फीसद की वेतन वृद्धि को भी रोकने का फैसला ले सकती है. इससे सरकारी खजाने में करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपए बचेगा. लॉकडाउन के चलते सरकार को गन्ना किसानों के भुगतान में परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. अब तक सरकार किसानों को उनके गन्ना के मूल्य का केवल साठ फीसद ही भुगतान करा पाई है. प्रमुख सचिव, गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग संजय भूसरेड्डी बताते हैं, ''पश्चिम के गन्ना किसानों की काफी समय से मांग थी कि उन्हें उनके बकाया के एवज में चीनी दी जाए. जो किसान ऐसा चाहते हैं उन्हें हर महीने एक क्विंटल चीनी देने की योजना है. किसान गन्ना देने चीनी मिल जाएंगे और बदले में वहां से एक क्विंटल चीनी की बोरी लेते आएंगे. इसके लिए वह न्यूनतम मूल्य लिया जाएगा जिस पर चीनी मिल ने उस दिन चीनी बेची है. किसानों से इस चीनी का मूल्य उनकी गन्ने की अंतिम पर्ची के भुगतान से ऐडजस्ट किया जाएगा.''
कोरोना का संक्रमण फिलहाल कम होता दिखाई नहीं दे रहा है, और यह स्थिति खजाने की सेहत के लिए भी ठीक नहीं है.
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आशीष मिश्र