अर्जुन ने कहा, रणवीर से न करें मेरी तुलना

अर्जुन कपूर की नई फिल्म पानीपत दर्शकों के सामने है. इसमें उन्होंने सदाशिव राव भाऊ का किरदार निभाया है. उनके अभिनय की तारीफ के साथ उनकी तुलना रणवीर सिंह से भी हो रही है. मुंबई में अर्जुन कपूर ने नवीन कुमार के साथ कई पहलुओं पर खुलकर बात की.

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अभिनेता अर्जुन कपूर अभिनेता अर्जुन कपूर

नवीन कुमार

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  • 06 दिसंबर 2019,
  • अपडेटेड 8:10 PM IST

बिंदास ऐक्टर अर्जुन कपूर अपनी नई फिल्म पानीपत में अपने अभिनय को लेकर चर्चा में हैं. उन्होंने इस फिल्म में सदाशिव राव भाऊ का किरदार निभाया है. अर्जुन की तुलना रणवीर सिंह से की जा रही है. दरअसल रणवीर सिंह फिल्म बाजीराव मस्तानी बाजीराव का ऐतिहासिक कैरेक्टर निभा चुके हैं. रणवीर से अपनी तुलना पर अर्जुन का कहते हैं, 'यह गलत है. रणवीर से मेरी तुलना नहीं होनी चाहिए. इसकी वजह है कि सदाशिव राव और बाजीराव दोनों के व्यक्तित्व में अंतर है. ये दोनों मराठा सेना के योद्धा हैं. लेकिन सदाशिव राव जहां एक स्थिर कैरेक्टर है वहीं बाजीराव उसके विपरीत चरित्र है.'

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क्या ये दोनों कैरेक्टर दो निर्देशकों की सोच और समझ पर आधारित हैं? इस पर अर्जुन सफाई देते हैं, 'आशुतोष गोवारिकर और संजय लीला भंसाली अपनी-अपनी कला के माहिर हैं. भंसाली ने बाजीराव मस्तानी अच्छी फिल्म बनाई थी और बाजीराव का आकर्षक कैरेक्टर पेश किया था. रणवीर ने उस कैरेक्टर को अच्छे से निभाया भी था. लेकिन आशुतोष इतिहास के जानकार हैं और उन्होंने जोधा अकबर जैसी फिल्म बनाई थी. पानीपत के लिए भी उन्होंने काफी रिसर्च किया है. उन्होंने सदाशिव राव के कैरेक्टर पर काफी मेहनत की है. इतिहास के पन्नों में सब कुछ नहीं लिखा हुआ है. इसलिए जब आप सदाशिव राव देखेंगे उसे देखकर आप बाजीराव से तुलना नहीं कर पाएंगे.'

आशुतोष की फिल्म पानीपत में पानीपत के तीसरे युद्ध की कहानी है. बकौल अर्जुन, 'इस फिल्म में जो खास है वो इसकी कहानी है जिसे इतिहास के पन्नों में पूरी तरह से दर्शाया नहीं गया है. किताबों में जो पढ़ा है उसमें अंत के बारे में बताया गया है. लेकिन मेरा मानना है कि यह एक पीरियड फिल्म से ज्यादा देशभक्ति फिल्म है. यह उन लोगों की कहानी है जिन्होंने हिंदुस्तान में पहली बार संयुक्त सेना बनाई थी ताकि बाहरियों से लड़ सकें. क्योंकि इससे पहले तक आक्रमणकारी आते रहते थे, हिंदुस्तान से चीजें ले जाते रहते थे.

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मगर देश के लिए पहली बार लोग एकजुट हुए. यह पहला युद्ध था युनाइटेड इंडिया का. मुझे लगता है कि ये कहानी सुनानी बहुत जरूरी है.' अर्जुन इस फिल्म को लेकर बेहद उत्साहित हैं. वे मानते हैं कि इतिहास के उन अनछुए पहलुओं को आज बताना जरूरी है. क्योंकि इतिहास हमें सब कुछ नहीं बताता है. एक फिल्मकार के तौर पर आशुतोष ने किसी इतिहासकार से ज्यादा काम किया है और उनके इस काम को पसंद ही नहीं करना चाहिए बल्कि उसे इतिहास के पन्नों में भी जोड़ना चाहिए.

इस फिल्म में सदाशिव राव के कैरेक्टर को सजीव करने के लिए अर्जुन ने अपने सर मुड़वा लिए. वे कहते हैं, 'अगर सर नहीं मुड़वाता तो मैं असली पेशवा नहीं लगता. सदाशिव योद्धा था लेकिन वह एक शांत प्रकृति का इंसान था. किताबों में तो उन्हें अड़ियल योद्धा बताया गया है. मगर वो अड़ियल क्यों था?

वो सबकी सुनता था पर करता अपनी था. उसकी सोच की धारा ऐसी क्यों थी? वो संयुक्त हिंदुस्तान के लिए काम कर रहा था. जिस तरह से उनका अंत हुआ, काश ये अंत नहीं होता. आशुतोष ने अपनी फिल्म में इस कैरेक्टर को क्रिएट किया है.' अर्जुन यह भी कहते हैं कि इस फिल्म के लिए आशुतोष ने अपनी नजरों से इतिहास को देखा है.

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अर्जुन आगे बताते हैं कि आशुतोष जब उनके पास इस फिल्म का प्रस्ताव लेकर आए थे तो वो खुद चकित थे कि उन्हें उनमें ऐसी क्या बात दिख गई. सदाशिव राव का फोटो देखकर अर्जुन द्वारा प्रस्ताव स्वीकार करने के बाद आशुतोष ने उनकी सारी फिल्में दोबारा देखी. आशुतोष उनका लुक टेस्ट लेने को तैयार नहीं थे. बाद में अपनी जिद पर अर्जुन ने लुक टेस्ट दिया और यह माना कि वो सच में सदाशिव राव दिख रहे हैं. अर्जुन का कहना है कि फिल्म में सदाशिव राव को बाजीराव की तरह चिल्लाकर संवाद बोलते हुए नहीं दिखाया गया है.

यह दोनों के चरित्र में फर्क है. क्योंकि सदाशिव अपने लोगों के बीच सामान्य रूप से बातचीत करता है. आशुतोष के साथ एक ऐतिहासिक फिल्म में अर्जुन ने पहली बार काम किया है. उनके बारे में उनका कहना है कि आशुतोष सिनेमा के इंस्टीट्यूशन हैं और एक अच्छे डाइरेक्टर के साथ काम करने का उनका सपना भी पूरा हुआ है. फिल्म में संजय दत्त ने अहमद शाह अब्दाली की भूमिका की है. जब अर्जुन को इस बारे में पता चला तो वो उनके घर उनसे मिलने चले गए. इसके बाद सेट पर अपने सीनियर ऐक्टर संजय दत्त के सामने अर्जुन को नर्वस होने का मौका नहीं मिला.

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अर्जुन के जीवन में काफी उतार-चढ़ाव रहा है. फिल्मी करियर में भी उन्होंने सफलता और असफलता का स्वाद चखा है. अपने खट्टे मीठे अनुभव से उन्होंने जीवन और करियर में संतुलन बनाने की कोशिश की है. वो कहते हैं कि वही ऐक्टर लंबे रेस का घोड़ा होता है जो गिरकर उठे और आगे बढ़े. ऐसे आगे बढ़ने वाले ऐक्टर को सब प्यार करते हैं. अर्जुन अपनी असफल फिल्मों को पीछे छोड़कर आगे बढ़ते हैं. वे कहते हैं, 'अगर असफलता के गम में रहे तो जिंदगी की रफ्तार थम जाएगी. सकारात्मक सोच रखनी चाहिए. मैं नंबर के गेम में नहीं हूं.

मुझे अच्छी फिल्में करनी है और मुझे अच्छी फिल्में मिल रही है. एक साउथ की फिल्म की रीमेक में काम करने वाला हूं जिसके राइट्स मेरे पिता ने ली है. अभी स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है.' बातचीत के दौरान अर्जुन थोड़े भावुक भी हो जाते हैं और बोलते हैं, 'मेरी जिंदगी में सब कुछ है. लेकिन कहीं न कहीं एक अधूरापन भी है, मेरी मदर नहीं हैं, जिनसे मैं सब कुछ कहता था.'

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