AIIMS बोला- बच्चों के सिगरेट पीने जैसा है ये प्रदूषण, दिल्ली छोड़ना बेहतर

प्रदूषण पर एम्स की स्टडी बताती है कि जब भी प्रदूषण बढ़ता है अस्पताल में मरीजों की संख्या भी बढ़ जाती है. एयर क्वॉलिटी इंडेक्स अब खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है, जिसका सीधा असर आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर प्रतीकात्मक तस्वीर

राम किंकर सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 01 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 11:47 PM IST

  • हवा का स्तर इतना खतरनाक, लोगों की सेहत पर खतरा
  • स्कूली बच्चों की फेफड़े की ग्रोथ को करता है प्रभावित

दिल्ली में अब पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी जैसे हलात हो गए हैं, जिसका सीधा मतलब है हवा का स्तर इतना खतरनाक हो चुका है कि अब वह आम लोगों को भी प्रभावित करेगा. जिन लोगों को दमे की शिकायत और हार्ट प्रॉब्लम है तो ये प्रदूषण उनके लिए और खतरनाक है. ऐसी खराब एयर क्वॉलिटी के चलते अस्पताल में लोगों की इमरजेंसी विजिट बढ़ जाती है.

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सामान्य लोगों के सीने में शिकायत होती है कि वो अच्छी तरह से सांस नहीं ले पा रहे हैं. बुजुर्ग और बच्चों में इन्फेक्शन का डर रहता है. ज्यादा बीमार रोगी को वेंटीलेटर तक लगाना पड़ता है.

प्रदूषण पर एम्स की स्टडी बताती है कि जब भी प्रदूषण बढ़ता है अस्पताल में मरीजों की संख्या भी बढ़ जाती है. एयर क्वॉलिटी इंडेक्स अब खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है कि अब इसका सीधा असर आम लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. प्रदूषण एक साइलेंट किलर की तरह है. यह एक मेडिकल इमरजेंसी की तरह है जिसमें मरीज को सांस की तकलीफ है या फिर उसे हार्ट की समस्या है तो वह तकलीफ बढ़ेगी.  

उम्र कम करता है प्रदूषण

अगर साल भर में ज्यादा दिन तक एयर क्वालिटी खराब रहती है तो लॉन्ग टर्म पर इसके नतीजे खतरनाक होंगे. खासकर स्कूली बच्चों के लिए ये हवा बेहद खतरनाक होगी. इससे उनकी फेफड़े की ग्रोथ प्रभावित होती है. डायरेक्टर एम्स प्रोफेसर रणदीप गुलेरिया ने कहा, 'यह बच्चों के सिगरेट पीने जैसा है, दिल और आदमी की आयु पर भी इसका असर पड़ता है.'

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मास्क भी कारगर नहीं

अगर आप मास्क बहुत टाइट नहीं लगाते हैं तो इसे लगाने का कोई फायदा नहीं है. ऐसी स्थिति में यह मास्क सिर्फ खुद को समझाने भर जैसा है. प्रोफेसर रणदीप गुलेरिया ने साफ तौर पर कहा है, 'हर साल की तरह इस बार भी ऐसी स्थिति में एम्स में मरीजों की संख्या करीब 20% बढ़ जाती है. साइड से भी प्रदूषण कण अंदर चले जाते हैं.'

'दिल्ली छोड़ना बेहतर विकल्प'

प्रोफेसर रणदीप गुलेरिया ने कहा, 'गर्भवती महिला और अस्थमा पीड़ित बच्चों पर प्रदूषण के प्रभाव को लेकर एम्स की स्टडी बताती है. प्रदूषण बढ़ने पर ऐसे मरीजों की तकलीफ बढ़ जाती है. कई सांस के मरीज प्रदूषण बढ़ने पर दिल्ली छोड़ कर जा चुके हैं.

यहां उनकी बढ़ी हुई ऑक्सीजन की डिमांड पूरी नहीं हो पाती, नेबुलाइजर नहीं मिल पाता, अगर जा सकते हैं तो दिल्ली छोड़कर चले जाएं. प्रदूषण को रोकने के लिए लॉन्ग टर्म सॉल्यूशन की जरूरत ज्यादा है. सुबह के वक्त मॉर्निंग वॉक पर ना निकलें क्योंकि उस वक्त प्रदूषण का स्तर काफी ज्यादा होता है.

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