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मिट्टी क्यों छोड़ रही है अपनी 'मिट्टी', बड़े खतरे की ओर जा रहे हैं हम?

aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 28 अप्रैल 2022,
  • अपडेटेड 9:45 AM IST
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अगले 60 वर्षों में धरती की मिट्टी का विनाश हो जाएगा. संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने अनुमान लगाया है कि अगर अफ्रीका में मरुस्थलीकरण - जमीन के बंजर, रेगिस्तान जैसे इलाकों - का बढ़ना नहीं रोका गया, तो 2030 तक वह अपनी दो तिहाई खेती योग्य जमीन खो देगा. 

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मिट्टी के खराब होने से दुनिया भर में 74 प्रतिशत गरीबों पर सीधा असर पड़ता है. मिट्टी का स्तर गिरने से पूरी दुनिया के 320 करोड़ लोगों पर नकारात्मक असर पड़ता है. इन असरों में फसलों का खराब होना, ऑक्सीजन का स्तर कम होना, जीव-जंतुओं की प्रजातियों का खत्म होना शामिल है. ये सारे एकदूसरे से जुड़े हैं, जो भविष्य में चल कर इंसानों के लिए ही नुकसानदेह साबित होंगे. 

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द इकोलॉजिकल सर्वे ऑफ अमेरिका के अनुसार जोती गई मिट्टी में जलवायु परिवर्तन के कारण मिट्टी में कार्बन की मात्रा 50-70 प्रतिशत तक कम हो गई है. अध्ययनों के अनुसार मिट्टी में संपूर्ण वातावरण, पौधों और प्राणियों की तुलना में अधिक कार्बन होता है. ज्यादा कार्बन का मतलब है जैव विविधता को मजबूती. 

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विश्व आर्थिक मंच के अनुसार अगर अगले 20 वर्षों में मिट्टी को खत्म होने से नहीं रोका गया तो 30 फीसदी तक भोजन की पैदावार गिर सकती है. मृदा एवं जुताई अनुसंधान के अनुसार अगर मिट्टी में कार्बन तत्वों की मात्रा केवल 0.4 फीसदी बढ़ा दी जाए तो भोजन के लिए अन्न की पैदावार 1.3 फीसदी बढ़ सकती है. 

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स्वस्थ मिट्टी के एक ग्राम में, 10 करोड़ से एक अरब तक बैक्टीरिया. एक से दस लाख तक फफूंदी. तमाम दूसरे सूक्ष्म-जीव मिल सकते हैं, जो पौधे के विकास और स्वास्थ्य पर असर डालते हैं. यूरोपियन यूनियन के मुताबिक हमारे पैरों के नीचे एक ब्रह्मांड है. मिट्टी में धरती की जैवविविधता का 25 फीसदी हिस्सा होता है. 

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हर साल 24 करोड़ टन उपजाऊ मिट्टी या 1.2 करोड़ हेक्टेयर जमीन की ऊपरी मिट्टी खत्म हो जाती है. अगर ऐसे ही मिट्टी खत्म होती रही तो फसलें नहीं उगेंगी. नीदरलैंड्स की मिट्टी से पोषक तत्व इतने ज्यादा खत्म हो चुके हैं कि अगले कुछ सालों में सिर्फ 60 प्रकार की फसलें ही उगाई जा सकेंगी. हम जो भोजन खाते हैं उसका 95 प्रतिशत मिट्टी से आता है.

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एक चम्मच स्वस्थ मिट्टी में, धरती की आबादी (7 अरब) से ज्यादा सूक्ष्म-जीव होते हैं. उनकी 10,000 से 50,000 तक किस्में होती हैं. ये धरती को मिट्टी को कमजोर होने से बचाते हैं. उसकी उर्वरकता को बनाए रखते हैं. लेकिन UNCCD के अनुसार धरती की 33 प्रतिशत मिट्टी पहले ही कमजोर हो चुकी है. 2050 तक 90 प्रतिशत से ज्यादा मिट्टी और कमजोर हो जाएगी.  

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Nature जर्नल के मुताबिक मिट्टी में जैविक पदार्थ (Soil Organic Matter), पानी और पोषक तत्वों की बढ़ी हुई मात्रा के जरिए गुणवत्ता लाई जा सकती है. इससे प्राकृतिक वातावरण और कृषि से अधिक उपज मिल सकती है. इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ ऑर्गेनिक एग्रिकल्चर मूवमेंट के कार्यकर्ता, वोल्कर्ट एंजल्समैन ने रोम में FAO के मुख्यालय में फोरम को बताया कि हम हर मिनट 30 फुटबॉल के मैदान के बराबर मिट्टी खो रहे हैं. वह भी तेजी से खेती के कारण. 

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बिना केंचुओं के मिट्टी, पानी को सोखने में क्षमता 90 प्रतिशत तक खो सकती है. जमीन के नीचे जीवन की फैक्ट्री की इसी तरह की एक महत्वपूर्ण भूमिका पानी को जमा और शुद्ध करने की है. जब पानी जमीन में नीचे जाता है, तो बैक्टीरिया और वायरसों को मिट्टी के कण सोख लेते हैं. पानी साफ और पीने के लिए सुरक्षित हो जाता है. 

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