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Mount Qomolangma: दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ के नीचे पनप रहा बड़ा खतरा, नुकसान समुद्रों तक देखने को मिलेगा

aajtak.in
  • बीजिंग,
  • 28 मई 2022,
  • अपडेटेड 7:12 PM IST
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चीन (China) के वैज्ञानिकों ने दुनिया के सबसे ऊंचे पहाड़ माउंट क्वोमोलांगमा (Mount Qomolangma) के ग्लेशियरों का अध्ययन करने के बाद खतरनाक नतीजे बताए हैं. यहां के बड़े ग्लेशियर अब टूटकर पिघलकर छोटे-छोटे ग्लेशियरों में तब्दील हो रहे हैं. साथ ही ये खतरनाक ग्लेशयल लेक्स (Glacial Lakes) यानी बर्फीली झीलें बना रहे हैं. अगर ये लेक्स फट जाएं तो बड़ी तबाही आ सकती है. (फोटोः गेटी)

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माउंट क्वोमोलांगमा (Mount Qomolangma) को ही माउंट एवरेस्ट (Mount Everest) कहा जाता है. यह चीन के तिब्बत आटोनॉमस रीजन में पड़ता है. साथ ही इसे वॉटर टॉवर ऑफ एशिया (Water Tower of Asia) बुलाया जाता है. यहां के ग्लेशियरों की वजह से ही एशिया की दस बड़ी नदियां निकलती हैं. चीन यहां पर 1973 से लगातार स्टडी कर रहा है. 28 अप्रैल 2022 को चीन के वैज्ञानिकों की एक बेहद बड़ी टीम माउंट क्वोमोलांगमा की स्टडी पर निकली थी. कुल मिलाकर 16 हिस्सों में बंटी थी. जिसमें कुल मिलाकर 270 सदस्य थे. (फोटोः पिक्साबे)

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मकसद था जलवायु परिवर्तन की वजह से माउंट क्वोमोलांगमा (Mount Qomolangma) के ग्लेशियरों की क्या हालत है. इनमें से एक टीम पहुंची रोन्गबुक ग्लेशियर (Rongbuk Glacier) की स्टडी करने. यह ग्लेशियर माउंट क्वोमोलांगमा के नीचे 5300 से 6300 मीटर की ऊंचाई तक स्थित है. लेकिन जलवायु परिवर्तन की वजह से ये बेहद तेजी से टूट और पिघल रहा है. (फोटोः पिक्साबे)

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चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के नॉर्थवेस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ इको-एनवायरमेंट एंड रिसोर्सेस (NIEER) के शोधकर्ता कांग शिचांग ने कहा कि हमने रोन्गबुक रिवर बेसिन में इस समय 87 ग्लेशियर मौजूद हैं. वह भी माउंट क्वोमोलांगमा (Mount Qomolangma) के उत्तरी ढलान की तरफ. लेकिन यह संख्या हैरान करती है. 20 साल पहले इस जगह पर सिर्फ 68 छोटे ग्लेशियर थे, जो अब बढ़कर 87 हो चुके हैं. (फोटोः गेटी)

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कांग ने बताया कि ग्लेशियरों की संख्या बढ़ना अच्छी बात नहीं है. क्योंकि एक बड़ा ग्लेशियर टूटकर छोटे-छोटे ग्लेशियरों में बदल रहा है. इसलिए छोटे ग्लेशियरों की संख्या बढ़ रही है. रोन्गबुक रिवर बेसिन में ग्लेशियर का पूरा इलाका करीब 115 वर्ग किलोमीटर बचा है. जो 1970 की तुलना में 20 फीसदी कम हो चुका है. (फोटोः गेटी)
 

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चाइनीज एकेडमी ऑफ मेटरोलॉजिकल साइंसेज के एसोसिएट रिसर्चर डिंग मिंघू और नॉर्थवेस्ट इंस्टीट्यूट ऑफ चाइनीज एकेंडमी ऑफ साइंसेज के वांग फीतेंग भी माउंट क्वोमोलांगमा (Mount Qomolangma) के ग्लेशियरों को लेकर चिंतित हैं. डिंग कहते हैं कि ज्यादा संख्या में ग्लेशियरों का दिखना यानी तेजी से बड़े ग्लेशियर का टूटना और पिघलना. यह बेहद बुरा सिग्नल है. यह ग्लोबल वॉर्मिंग का नतीजा है. क्योंकि छोटे ग्लेशियर जल्दी पिघलते हैं. ये खतरनाक बर्फीली झीले बनाते हैं. (फोटोः जेरेमी बीजैंगर/अन्स्प्लैश)

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अगर इसी तरह के ग्लेशियल लेक्स यानी बर्फीली झीले बनती रहीं. उनपर वजन बढ़ा तो किसी भी समय केदारनाथ या चमोली जैसा हादसा हो सकता है. या फिर एशिया में बहने वाली नदियों में अचानक से बाढ़ (Flash Flood) आने का खतरा पैदा हो सकता है. यहां पर मौजूद ग्लेशियरों में इतना पानी है कि अगर ये पूरी तरह से पिघल जाएं तो समुद्रों में मौजूद कई द्वीपों को डुबा सकती हैं. (फोटोः लुओ लुई/अन्स्प्लैश)

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