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डायनासोर को मारने वाले एस्टेरॉयड से धरती पर छाया था अंधेरा, 9 माह में 75% जीवन खत्मः रिसर्च

aajtak.in
  • वॉशिंगटन,
  • 23 दिसंबर 2021,
  • अपडेटेड 2:00 PM IST
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करोड़ों साल पहले जिस एस्टेरॉयड ने धरती से डायनासोरों की प्रजाति को खत्म किया था, उसने 9 महीने तक धरती के वायुमंडल में अंधेरा कर दिया था. जिसकी वजह से करोड़ों पौधे और जीव-जंतु मारे गए थे. एस्टेरॉयड के टकराने से धरती पर लगी आग की वजह से इतना धुआं फैला कि सूरज की रोशनी आनी बंद हो गई. जिसकी वजह से धरती से जीवन खत्म हो गया. एक नए रिसर्च में इस बात का खुलासा हुआ है. (फोटोः गेटी)

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6.60 करोड़ साल पहले धरती से एक एस्टेरॉयड टकराया था. जिसने पूरी धरती पर प्रलय ला दिया था. इसकी वजह से न उड़ पाने वाले डायनासोरों की पूरी प्रजाति तो खत्म हुई ही, सूरज की रोशनी न मिलने की वजह से करोड़ों पेड़-पौधे और जीव भी खत्म हो गए. यह एक सामूहिक संहार था. एस्टेरॉयड के टकराने से आग लगी. आग इतनी फैली की चारों तरफ धुआं ही धुआं हो गया. इतना गहरा और घना धुआं की 9 महीनों तक सूरज की रोशनी धरती की सतह पर पड़ी ही नहीं. (फोटोः गेटी)

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सिर्फ 9 महीने ही नहीं, इस धुएं की वजह से धरती पर अंधेरा 2 साल तक कायम रहा लेकिन बीच-बीच में रोशनी आती-जाती रही. 9 महीने तक तो पूरा अंधेरा कायम था. यूं समझ लीजिए इतने लंबे समय तक रात हो गई थी. फोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया बंद होने की वजह से इकोसिस्टम बिगड़ता चला गया. यह स्टडी हाल ही में अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन की न्यू ओरलींस में हुई बैठक में पेश की गई. (फोटोः गेटी)

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जिस दौर की यह बात है उसे क्रिटेसियस काल (Cretaceous Period) कहा जाता है. यह 14.5 करोड़ साल से 6.6 करोड़ साल तक था. 6.6 करोड़ साल पहले 12 किलोमीटर व्यास का एक एस्टेरॉयड 43 हजार किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से धरती से टकराया था. इससे मेक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico) में युकाटन प्रायद्वीप (Yucatan Peninsula) के पास चिक्सुलूब क्रेटर (Chicxulub Crater) बन गया. इस क्रेटर यानी गड्ढे का व्यास 150 किलोमीटर है. अब यह पानी के भीतर है. (फोटोः गेटी)

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चिक्सुलूब क्रेटर (Chicxulub Crater) से निकली प्रलय की लहर ने धरती से 75 फीसदी जीवन को 9 महीने के अंदर ही खत्म कर दिया था. सिर्फ उड़ने वाले डायनासोर इससे बच पाए थे, जिनकी वंशावली में आज के पक्षी आते हैं. गर्म पत्थरों से निकले राख और सल्फ्यूरिक एसिड की वजह से बने धुएं से धरती का वायुमंडल पट गया. चारों तरफ अंधेरा हो गया. 9 महीने तक पूरा अंधेरा था. जिसकी वजह से वैश्विक स्तर पर तापमान में तेजी से गिरावट आई. एसिड की बारिश हुई. जिससे जंगलों में आग लग गई. फिर क्या था...चारों तरफ तबाही का मंजर. (फोटोः गेटी)

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कैलिफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेस में जूलॉजी एंड जियोलॉजी के क्यूरेटर पीटर रूपनारायन ने कहा कि यह एक न्यूक्लियर विंटर सेनारियो था. इतनी ठंड और अंधेरे की वजह से धरती पर बड़े पैमाने पर तबाही आई. आप इसे प्रलय भी कह सकते हैं. पीटर कहते हैं कि पिछले कुछ दशकों में ही वैज्ञानिकों ने इस एस्टेरॉयड के हमले से फैले अंधेरे पर मॉडल्स बनाए और गणनाएं की. जिसमें इस बात की पुष्टि होती है कि अंधेरे की वजह से धरती से जीवन खत्म होता चला गया. (फोटोः गेटी)

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पीटर कहते हैं कि वैश्विक स्तर पर जंगलों में आग लगने की वजह से पूरे वायुमंडल में राख ही राख फैल गई. साथ ही सल्फ्यूरिक एसिड भी. ऊपरी वायुमंडल तो जहर बन गया था. ये राख और धुएं के बादल इतने गहरे और घने थे कि सूरज की रोशनी भी इन्हें चीर नहीं पा रही थी. जिसकी वजह से फोटोसिंथेसिस रुक गया और पेड़-पौधे खत्म हो गए. इसकी वजह से इन्हें खाने वाले जीव मारे गए. इस तरह पूरा इकोसिस्टम खराब हो गया. (फोटोः गेटी)

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वैज्ञानिकों ने स्टडी में पता किया उस दौरान 300 प्रजातियों के जीव-जंतु मारे गए थे. यह उस समय के जीवाश्मों के अध्ययन से पता चला है. ये जीवाश्म अमेरिका के मोंटाना, नॉर्थ डकोटा, साउथ डकोटा और व्योमिंग में फैले हुए हैं. पीटर ने बताया कि हमने इन जीवाश्मों का अध्ययन करके पता लगाया कि उस समय क्या हुआ होगा. इनके जीवाश्म के साथ राख और सल्फ्यूरिक एसिड के कण भी मिले हैं. जिससे पता चलता है कि उस समय किस तरह की प्रलय आई होगी. (फोटोः गेटी)

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कंप्यूटर में उस समय की परिस्थिति के अनुसार एक सिमुलेशन मॉडल बनाया गया. उससे पता चला कि 100 से 700 दिनों तक अंधेरा ही अंधेरा था. जिसकी वजह से धरती पर मौजूद जीवन का 73 से 75 फीसदी हिस्सा खत्म हो गया था. यह अंधेरा कुछ ही हफ्तों में पूरी धरती के चारों तरफ छा गया था. हालांकि जब राख और धुएं के बादल हटे तो उसके 150 दिनों के बाद धरती पर जीवन ने फिर से पनपना शुरु किया था. (फोटोः गेटी)

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तब तक धरती की रूपरेखा बदल चुकी थी. बादल छटने के 200 दिनों के बाद कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी थीं. कई नई प्रजातियां जन्म ले रही थीं. धरती पर वर्चस्व की लड़ाई हो रही थी. कहीं सीधे तौर पर तो कहीं अपरोक्ष रूप से. प्रजातियों के बीच संघर्ष का माहौल था. ताकि जीवन को बचाए रखा जा सके. पीटर कहते हैं कि धरती पर लगातार बदल रहे वायुमंडलीय स्थितियों और तापमान की वजह से अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरह के जीव पैदा हो रहे थे. (फोटोः गेटी)

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स्थितियां सामान्य होने के बाद धरती पर नई तरह की प्रजातियों ने जन्म लिया. नए इलाके बने. इस पूरी प्रक्रिया में करीब 40 साल लग गए. इसके बाद धरती पर जीवन की नई परिभाषा लिखी गई. पेड़-पौधे और जीव-जंतु नए इकोसिस्टम के हिसाब से ढलकर खुद को सर्वाइव कर रहे थे. (फोटोः गेटी)

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आपको बता दें मेक्सिको की खाड़ी (Gulf of Mexico) में युकाटन प्रायद्वीप (Yucatan Peninsula) के पास चिक्सुलूब क्रेटर (Chicxulub Crater) दुनिया का सबसे बड़ा ऐसा क्रेटर है जो धरती पर एस्टेरॉयड की टक्कर से बना था. इसकी वजह से ही धरती की भौगोलिक परिस्थितियों में काफी ज्यादा बदलाव आया था. (फोटोः गेटी)

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