मनुष्य जीवन भर धन-दौलत, हीरे-मोती और सोना जुटाने में निकाल देता है लेकिन फिर भी वो सुख को प्राप्त नहीं कर पाता. आचार्य चाणक्य ने अपनी चाणक्य नीति के चौदहवें अध्याय के पहले श्लोक में धरती के सबसे बहुमूल्य रत्नों की बात की है. वो कहते हैं कि हीरा, मोती, पन्ना और स्वर्ण सिर्फ एक पत्थर हैं. आइए जानते हैं चाणक्य ने किन चीजों को रत्न बताया है और क्यों...
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ॥
आचार्य चाणक्य इस श्लोक में कहते हैं कि हीरा, मोती, पन्ना, स्वर्ण एक पत्थर के टुकड़े मात्र हैं. वो कहते हैं कि पृथ्वी के सभी रत्नों में जल, अन्न और मधुर वचन सबसे बहुमूल्य रत्न हैं.
इनके महत्व को बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि जल एवं अन्न से मनुष्य अपने जीवन की रक्षा कर पाता है, इससे उसके प्राणों की रक्षा होती है, शरीर का पोषण होता है और बल-बुद्धि में बढ़ोतरी होती है.
इसके अलावा वो कहते हैं कि मधुर वचनों से मनुष्य चाहे तो शत्रुओं को भी जीतकर अपना बना सकता है. इसलिए यह रत्न अत्यंत बहुमूल्य हैं. चाणक्य कहते हैं कि जो मनुष्य इन रत्नों को छोड़कर पत्थरों के पीछे दौड़ते हैं, उनका पूरा जीवन कष्टों से भर जाता है.
उनके मुताबिक उन पत्थरों के बिना रहा जा सकता है लेकिन इन बहुमूल्य रत्नों के बिना मनुष्य के जीवन की कल्पना असंभव है.
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