Kojagara Puja Vrat Katha: कोजागरी पूजा के दौरान पढ़ें ये व्रत कथा, जानें इसकी महिमा

Kojagara Puja Vrat Katha: कोजागरी व्रत पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा असम में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है. इस दिन देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा-आराधना की जाती है.

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कोजागरी पूजा व्रत कथा कोजागरी पूजा व्रत कथा

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 अक्टूबर 2024,
  • अपडेटेड 3:45 PM IST

Kojagara Puja Vrat Katha: कोजागरी व्रत पश्चिम बंगाल, ओडिशा तथा असम में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक है. इस दिन देवी लक्ष्मी की विशेष पूजा-आराधना की जाती है. कोजागर व्रत कथा के अनुसार आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में माता लक्ष्मी संसार में भ्रमण हेतु निकलती हैं तथा जो भी भक्त उन्हें जागता हुआ मिलता है देवी माँ उसको धन-धान्य से सम्पन्न कर देती हैं. इस व्रत को कोजागरी पूजा, बंगाली लक्ष्मी पूजा आदि नामों से भी जाना जाता है. 

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कोजागरी पूजा व्रत कथा

कोजागरी व्रत को लेकर भी विभिन्न क्षेत्रों में कई कथाएं प्रचलित हैं. इनमें से जो सबसे प्रचलित कथा हैं, हम आपको उसके बारे में बताते हैं. प्राचीन काल में एक साहूकार था. जिसकी दो बेटियां थी, उनकी माता लक्ष्मी बड़ी आस्था थी और दोनों ही पूर्णिमा का उपवास रखती थी. साहूकार की बड़ी बेटी इस व्रत को पूरा करती थी, और पूरे विधि विधान से संपन्न करती थी. लेकिन, उसकी छोटी बेटी अज्ञानतावश व्रत को अधूरा छोड़ देती थी. व्रत को अधूरा छोड़ने के कारण देवी लक्ष्मी उससे रुष्ट हो गई. जिससे साहूकार की छोटी बेटी के पुत्रों की मृत्यु होने लगी. जब भी वह किसी बच्चे को जन्म देती, उसके कुछ ही देर बाद उसके बेटे की मृत्यु हो जाती थी. साहूकार की छोटी बेटी इससे काफी परेशान हो गई, और उसने एक ऋषि को अपनी इस परेशानी के बारे में बताया. ऋषि साहूकार की छोटी बेटी को देखकर सारा माजरा समझ गए थे. उन्हें साहूकार की छोटी बेटी को उसकी गलती के बारे में बताया कि वह पूर्णिमा के व्रत को अधूरा छोड़ देती है, और पूर्ण विधिविधान से उस व्रत को नहीं करती है. उन्होंने साहूकार की बेटी को कहा कि अगर तुम पूर्णिमा का व्रत विधिपूर्वक पूर्ण करती हो, तो तुम्हारी संतान जीवित रह सकती है.

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ऋषि की सलाह के बारे उसने पूर्णिना का व्रत विधिविधान से पूरा किया. जिसके फलस्वरूप उसे संतान की प्राप्ति हुई, लेकिन कुछ दिनों बाद उसकी भी मौत हो गई. वह परेशान हो गई, तब उसे अपनी बड़ी बहन की याद आई. उसने लड़के को एक छोटी चौकी के आकार का लकड़ी पर लेटा दिया, और उस पर कपड़ा ढंक दिया. उसके बाद वह अपनी बड़ी बहन को बुलाकर लाई, और बहन को उसी पर बैठने का इशारा किया. बड़ी बहन इस बात से अंजान थी कि वहां पर उस बच्चे की लाश पड़ी हुई है. वह जैसे ही उसे पीढ़ा पर बैठने लगी, उसका लहंगा बच्चे को छू गया और बच्चा अचानक से जीवित हो उठा और रोने लगा. यह माजरा देख बड़ी बहन ने फटकार लगाते हुए कहा कि तू मुझे कलंक लगाना चाहती थी, मेरे बैठने से यह मर जाता. बड़ी बहन की बात सुनकर छोटी बहन ने विनम्र भाव से कहा कि यह पहले ही मर चुका था. तेरे तप और पुण्य से ही यह जीवित हुआ है. तुझ पर माता लक्ष्मी की असीम कृपा है. इस घटना के बाद साहूकार ने नगर में पूर्णिमा का पूरा व्रत करने का ढिंढोरा पिटवा दिया. तभी से इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, देवी लक्ष्मी की पूजा की जाने लगी.

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