14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है. इस दिन सूर्य को अर्घ्य देकर दान-स्नान करने और पुण्य कमाने की परंपरा तो सब जानते हैं. लेकिन मकर संक्रांति केवल इन्हीं धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है. बल्कि इसका जन्म-मरण के चक्र से भी गहरा नाता है. कहते हैं कि मकर संक्रांति से पहले इंसान की मृत्यु होना अच्छा नहीं माना जाता है. जबकि मकर संक्रांति के बाद एक निश्चित काल तक मृत्यु होना स्वर्ग या मोक्ष प्राप्ति का संकेत समझा जाता है.
मकर संक्रांति के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं. इस राशि में जाते ही सूर्य उत्तरायण के हो जाते हैं. इसका मतलब है कि सूर्य उत्तर दिशा की ओर संचरण कर रहे हैं. उत्तरायण के सूर्य में मृत्यु होना या देह त्यागना बहुत अच्छा माना जाता है. शास्त्रों में उत्तरायण को देवताओं का काल कहा गया है. इस दौरान स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं. इसलिए जिस इंसान की मृत्यु उत्तरायण के सूर्य में होती है, उसे सीधे स्वर्ग मिलता है. मोक्ष प्राप्ति के लिए इन दिनों को अच्छा माना गया है.
वहीं दूसरी ओर, मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणायन के होते हैं. कहते हैं कि जिस व्यक्ति की मृत्यु दक्षिणायन के सूर्य में होती है, उन्हें पुनर्जन्म लेना पड़ता है. ऐसी आत्माएं कभी जन्म-मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाती हैं.
कब से कब तक रहता है उत्तरायण?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो उत्तरायण की शुरुआत होती है. मकर से मिथुन राशि में भ्रमण करने तक उत्तरायण जारी रहता है. इस तरह उत्तरायण का सूर्य करीब छह महीने तक रहता है. इसके विपरीत, सूर्य जब कर्क राशि से धनु राशि में भ्रमण करता है तो दक्षिणायन कहलाता है. दक्षिणायन की अवधि भी तकरीबन छह महीने ही रहती है. उत्तरायण में मृत्यु होना क्यों अच्छा माना जाता है? इसे महाभारत में भीष्म पितामह की कथा से समझा जा सकता है.
भीष्म पितामह ने उत्तरायण में त्यागे थे प्राण
महाभारत की कथा के अनुसार, भीष्म पितामह को अपने पिता शांतनु से इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था. इसलिए वो जब चाहे तब अपनी मृत्यु का दिन चुन सकते थे. कुरुक्षेत्र की रणभूमि में भीष्म पितामह अर्जुन के बाणों से बुरी तरह घायल हो गए और जमीन पर गिर पड़े. असहनीय पीड़ा के बावजूद भीष्म ने तुरंत अपने प्राण नहीं त्यागे. वो शरशय्या पर लेटे रहे और मृत्यु का इंतजार करते रहे.
दरअसल, उस वक्त सूर्य दक्षिणायन में थे. भीष्म पितामह युद्ध कौशल और नीति के साथ-साथ शास्त्रों के भी बड़े जानकार थे. उन्हें यह बात मालूम थी कि दक्षिणायन के सूर्य में देह त्यागना अच्छा नहीं होता है. इसलिए उन्होंने शरशय्या पर सूर्य के उत्तरायण होने का इंतजार किया और अपने प्राणों को रोककर रखा. मकर संक्रांति के दिन जब सूर्य उत्तरायण में प्रवेश कर गए, तब भीष्म पितामह ने योग बल से अपने प्राणों का त्याग कर दिया.
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