हिंदी जाननेवाला हर दूसरा व्यक्ति आज लेखक है: भगवानदास मोरवाल

मजदूर परिवार में जन्मे कथाकार भगवानदास मोरवाल अपने गहरे कथात्मक अन्वेषण, अनुसंधान और अछूते विषयों को केंद्र में रखकर लिखी कृतियों से हिंदी कथा-साहित्य में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. उनके विषय अनूठे और पात्र लोकजीवी हैं.

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लेखक भगवानदास मोरवाल लेखक भगवानदास मोरवाल

जय प्रकाश पाण्डेय

  • नई दिल्ली,
  • 23 जनवरी 2019,
  • अपडेटेड 11:15 AM IST

जनवरी की 23 तारीख को सन् 1960 में हरियाणा के मेवात जिले के छोटे-से कस्बे नगीना के मजदूर परिवार में जन्मे कथाकार भगवानदास मोरवाल अपने गहरे कथात्मक अन्वेषण, अनुसंधान और अछूते विषयों को केंद्र में रखकर लिखी कृतियों से हिंदी कथा-साहित्य में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. उनके विषय अनूठे और पात्र लोकजीवी हैं.

उनके लेखन की रेंज इतनी कमाल की है कि पूछिए मत. इसीलिए पाठकों को उनकी लिखी किताबों के प्रति बहुत उत्सुकता रहती है. चाहे वह मेवात की पृष्ठभूमि पर लिखा उपन्यास काला पहाड़ हो या जरायमपेशा कही जाने वाली एक जाति-समूह को केंद्र में रख कर लिखा गया उपन्यास रेत, पाठकों ने उनकी कृतियों को खूब सराहा.

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एनजीओ संस्कृति की पड़ताल करते उनके उपन्यास ‘नरक मसीहा’ को भी खूब वाहवाही मिली, तो धर्म की आड़ में स्त्री-शोषण को केंद्र में रखकर लिखे गए ‘हलाला’ पर खूब नाटक खेले जा रहे हैं. उनका ताजा उपन्यास यों तो साल भर पहले आया था, पर हाथरस शैली की एक नौटंकी अदाकारा को केंद्र में रख कर लिखे गए ‘सुर बंजारन’ को अब भी पाठक ढूंढते रहते हैं. उनके लेखन पर कई शोध हो चुके हैं. सांस्कृतिक वर्चस्व के खिलाफ अपने लेखन से धमक जमाने वाले भगवानदास मोरवाल के बिना आज समकालीन कथा-साहित्य पर चर्चा अधूरी है. साहित्य आजतक ने उन के जन्मदिन पर उनसे लंबी बातचीत की. खास अंश

आप लेखक कैसे और कब बने?

भगवानदास मोरवाल: लेखक बनना कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है कि आप रातों-रात लेखक बन जाएं. यह एक लंबी प्रक्रिया है जो आपके संचित अनुभवों का निर्माण है. दूसरी बात, आख़िर हम लेखक कहते किसे हैं? उसे जो कुछ भी लिख दे? अगर लेखक बनने के लिए यह ज़रूरी है तब यह बताना मुश्किल है कि मैं लेखक कब और कैसे बना. लेखक होना मेरी नज़र में वह है जब आपके लिखे का पाठक इंतज़ार करते हों. इस रूप में देखा जाए तो मैं एक हद तक लेखक तब बना जब मैंने अपने आरंभिक अनुभवों को कहानियों और कविताओं के रूप में ढालना शुरू कर दिया था और ऐसा 1980 के अंत में शुरू हो चुका था. लेकिन हम लेखक किसी को तब मानते हैं जब उसकी कोई पुस्तक न आ जाए. मेरी पहली पुस्तक, जो इन्हीं कच्चे-पक्के अनुभवों का सार था, 1986 में सिला हुआ आदमी कहानी संग्रह के नाम से प्रकाशित हुआ था.      

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पहली किताब छपने में कितना वक्त लगा, क्या-क्या दिक्कतें झेलनी पड़ीं?

भगवानदास मोरवाल:  मुझे इस संग्रह को प्रकाशित कराने में किसी भी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा. अक्सर हम देखते हैं कि अपनी पहली पुस्तक के लिए कुछ लोग आर्थिक सहयोग के नाम पर प्रकाशक को पैसा देते हैं, कम से कम मैंने तब भी नहीं दिए. ऐसा नहीं है कि यह परंपरा उस समय नहीं थी, यह परंपरा तो तब से है जब से प्रकाशन व्यवसाय शुरू हुआ था. हां, मेरी पहली पुस्तक के साथ एक मजेदार वाकिया यह हुआ कि प्रकाशक ने पुस्तक के फरमे पूरे करने के लिए उन्हें मैं अपनी रचनाओं की जो फाइल दे आया था, उनमें से कहानियों के साथ कुछ लेख भी छाप दिए.  

मेवात और वहां का जीवन आपके लेखन के केंद्र में रहा है. यहां तक कि काला पहाड़ को छपे बीस साल हो गए, वहां के जीवन में तब से अब तक क्या कोई बदलाव आया है? कितना बदला है मेवात?

भगवानदास मोरवाल:  यह सही है कि काला पहाड़ के प्रकाशन का यह बीसवां साल है. 1999 के लगभग अंत में यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन समूह के राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था. यह मेरा पहला उपन्यास था और सच कहूं तो इसी उपन्यास ने मुझे वह लेखकीय स्वीकार्यता दिलाई, जिसका आपने अपने पहले प्रश्न में ज़िक्र किया है. कहने को हम काला पहाड़ को आज से बीस साल पहले का मेवात कह सकते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें सिर्फ बीस वर्ष पहले का मेवात नहीं है, बल्कि एक पूरी सदी का मेवात है. जिसमें उसका सुनहरा अतीत है, तो साथ में मेवात का गौरवशाली इतिहास भी है.

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इसमें मेवात की मिश्रित संस्कृति का पक्का और गाढ़ा रंग देखा जा सकता है तो तेज़ी से इस रंग के फीके पड़ने की पीड़ा भी आप महसूस कर सकते हैं. आपने इस उपन्यास के हवाले से मेवात के जन-जीवन के बदलाव की बात पूछी है. मैं यहां यह कहना चाहता हूं कि इन पिछले दो दशकों में सिर्फ़ मेवात ही नहीं बल्कि हमारे पूरे भारतीय समाज में बदलाव आया है. विशेषकर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बाद हमारे समाज में आपसी भरोसा एक-दूसरे के प्रति कम हुआ है. एक तरह से मेवात को हम बदलते ग्रामीण भारत के रूप में देख सकते हैं. मैं कह सकता हूं कि धार्मिक कट्टरता सभी धर्म और समुदायों में समान रूप से बढ़ी है.

आपकी नज़र में आपकी सबसे अच्छी कृति कौन सी है और क्यों?

भगवानदास मोरवाल:  इस सवाल का जवाब देना किसी भी लेखक के लिए सबसे मुश्किल काम है. उसकी हर कृति उसे अच्छी लगती है. हां, कोई-कोई कृति एक लेखक की पहचान बन जाती है. दूसरे शब्दों में कहूं तो उस लेखक को पाठक उसकी किसी कृति विशेष से जानने लगते हैं. अगर ऐसा है तो एक लेखक के रूप में मेरी यह पहचान मेरे पहले उपन्यास ‘काला पहाड़’ ने दिलाई है. हालांकि इस 'अच्छी' को हमें अपने पाठकों पर छोड़ देना चाहिए. क्योंकि यह ज़रूरी नहीं है कि जो कृति आपको पसंद है, वही एक पाठक को भी हो. वास्तव में यह पाठकीय विवेक, आस्वाद और संवेदनशीलता का मामला है.

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आपका सबसे पसंदीदा लेखक? कौन है और क्यों?

भगवानदास मोरवाल:  मैं पसंदीदा लेखक तो नहीं कहूंगा, वे लेखक ज़रूर बता सकता हूं जिनको पढ़कर मेरे भीतर एक लेखकीय विवेक और भरोसा पैदा हुआ. इनमें राही मासूम रज़ा, फणीश्वरनाथ रेणु, श्रीलाल शुक्ल और प्रेमचन्द रहे हैं. विशेषकर फणीश्वरनाथ रेणु जिनका बहुत से लेखकों की तरह मैं भी इस रूप में ऋणी रहा हूं कि अगर हिंदी में ‘मैला आँचल’ जैसी कृति नहीं आती तो न जाने कितने अनदेखे, अनसुने अंचल आज हमारे साहित्य के हिस्से नहीं बन पाते. ‘मैला आँचल’ और ‘आधा गाँव’  इन दोनों उपन्यासों को पढ़कर मुझमें काला पहाड़ लिखने का साहस पैदा हुआ.  

बतौर लेखक अपने समकालीनों में आप को किसका लेखन पसंद है?

भगवानदास मोरवाल:  हर लेखक का अपना ढंग है. उसकी भाषा है. उसकी शैली है. जितनी मेहनत से मैं लिखता हूं संभवतः वे भी उतनी मेहनत करते हैं. फिर भी मुझे उन लेखकों का लेखन पसंद है जिनके लेखन में व्यापक जीवन दृष्टि होती है. यह जीवन दृष्टि आपके अनुभवों के आधार पर समृद्ध होती है. भारतीय समाज की इतनी परतें हैं कि उन्हें समझने में पूरा जीवन लग जाए. वैसे भी लेखन कोई करियर बनाने का माध्यम नहीं है. यह एक साधना है जो निरंतरता की मांग करता है.   

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इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं?

भगवानदास मोरवाल:  जैसाकि विदित है अभी सालभर पहले हाथरस शैली नौटंकी की एक अदाकारा को केंद्र में रखकर मेरा छठा उपन्यास 'सुर बंजारन' आया है. उससे सांस लेने की फ़ुरसत मिली है. वैसे इन दिनों पहले मुग़ल शासक या कहिये मुगल हमलावर बाबर से युद्ध लड़ने वाले पहले देसी मुस्लिम योद्धा हसन खां मेवाती पर प्रामाणिक सामग्री एकत्रित करने में लगा हुआ हूं. प्रामाणिक इसलिए कह रहा हूं कि हसन खां मेवाती को लेकर हमारे यहां बहुत कुछ मिलता नहीं है. जबकि इस रणबांकुरे ने हममज़हबी होने और बाबर द्वारा आमंत्रित होने के बावजूद उसके साथ नहीं, बल्कि राणा सांगा के साथ मिलकर बाबर के खिलाफ़ युद्ध लड़ा और खानवा की लड़ाई में शहीद हो गया था.

क्या आप मानते हैं कि हिंदी और भारतीय भाषाओं के लेखकों को उनके हिस्से का सम्मान और धन प्राप्त हो रहा है?

भगवानदास मोरवाल: मुझे नहीं लगता कि हिंदी और भारतीय भाषाओं का कोई लेखक किसी सम्मान या आर्थिक लाभ के लिए लिखता होगा. यह उसके चिंतन का कभी हिस्सा रहा भी नहीं. ज़्यादातर लेखक हमारे यहां पूर्णकालिक लेखक नहीं हैं और यह संभव भी नहीं है, क्योंकि खाली लेखन से जीवनयापन बेहद मुश्किल है. अच्छे-खासे ख्याति प्राप्त लेखकों को मिलने वाली रॉयल्टी के चर्चे अक्सर हमें सुनने को मिलते रहते हैं. ऐसे में एक लेखक को लेखन से होने वाली कमाई के बारे में बात करना, सिर्फ़ मन को बहलाने वाली बात है. वैसे भी लेखक की हैसियत आज उसके लेखन से कम उसकी जाति, उसकी पृष्ठभूमि, उसके राज्य, उसके क्षेत्र के साथ-साथ दूसरे कारणों से तय होती है. स्थिति यह है कि हिंदी जाननेवाला हर दूसरा व्यक्ति आज लेखक है ऐसे में यह निष्कर्ष निकालना बेहद दुष्कर है कि आप किसे लेखक मानते हैं.   

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नए लेखकों के लिए क्या सीख है?

भगवानदास मोरवाल: मैं अभी इस लायक नहीं हुआ हूं को किसी को कोई सीख दे सकूं. मैं तो खुद ही सीखने की प्रक्रिया से गुज़र रहा हूं..

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