Sahitya AajTak: 'दमादम मस्त कलंदर...' जब काबुल बुखारी ने लूटी महफिल, अंत तक बजती रहीं तालियां

साहित्य आजतक 2024 के दूसरे दिन का समापन मशहूर गायक, संगीतकार और लिरिस्टि काबुल बुखारी के सूफी महफिल से हुई. उनके एक-एक कव्वाली और गाने ने लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया. कार्यक्रम के अंत तक दर्शक बने रहे.

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काबुल बुखारी की पेशकश काबुल बुखारी की पेशकश

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 23 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 12:34 PM IST

Sahitya AajTak 2024: राजधानी दिल्ली के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में शनिवार की रात सूफी कव्वाली और संगीत का जलवा बिखरता रहा. जब साहित्य आजतक 2024 के दूसरे दिन के अंतिम इवेंट के तौर पर काबुल बुखारी ने अपने अलहदे अंदाज में एक से बढ़कर कव्वालियां और शायरी पेश की. 

काबुल मूल रूप से कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के रहने वाले हैं. उन्हें जम्मू और कश्मीर के लोक संगीत को वहां बोली जाने वाली विभिन्न भाषाओं जैसे पहाड़ी, कश्मीरी, गोजरी, डोगरी आदि में पुनर्जीवित करने का बड़ा श्रेय मिला है. 

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2006 में काबुल बुखारी का शुरू हुआ था संगीत का सफर
उनके संगीत का सफर  2006 में तब शुरू हुई जब उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो श्रीनगर में एक ऑडिशन में जीत हासिल की. उन्होंने टी-सीरीज, टिप्स म्यूज़िक, टाइम्स म्यूज़िक और स्पीड रिकॉर्ड्स जैसे प्रमुख संगीत कंपनियों के साथ काम किया. उनके नाम कई सारी उपलब्धियां है. 

इस कव्वाली से शुरू हुई सूफी महफिल
काबुल ने अपने कार्यक्रम की शुरुआत करने से पहले एक शेर पेश किया- हुआ न दीदार जिन्हें भी उनका, जेहन में उनके सवाल होंगे. जिन्होंने वो बेहिजाब देखे, नसीब भी उनके लाजवाब होंगे... मिलाते होंगे. इसके बाद उन्होंने अपने अंदाज में पहली कव्वाली पेश की.  

जरा देखिए सादगी तो हमारी...
ऐतबार आपके वादे पर हमने कर लिया..

इश्क में उलझने पहले ही कम न थी...
लोग डरते हैं कातिल की परछाई से... हमनें 

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ये जो हल्का हल्का सुरूर है... ने लूटी महफिल
पहली कव्वाली खत्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा परिसर गूंज उठा. काबुल ने  दर्शकों का धन्यवाद दिया. इसके साथ ही उन्होंने काफी फेमस एक गीत पेश किया. इसकी शुरुआत भी सूफी अंदाज में गीत के शुरुआती शेर सी की. 

माना कि जनाब पिता हूं, बाखुदा बेहिसाब पीता हूं
लोग, लोगों का खून पीते हैं, मैं तो फिर भी शराब पीता हूं..

इसके बाद जैसे ही उन्होंने  ये जो हल्का-हल्का सुरूर है... ये तेरी नजर का कुसुर है... शुरू किया लोग झूम उठे और बीच प्रस्तुति में ही तालियां बजनी शुरू हो गई.  काबुल की तीसरी पेशकश  तुम्हें दिल्लगी भूल जानी पड़ेगी... गीत थी.  इसकी शुरुआत भी उन्होंने इस शेर से की. 

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले...
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिले...

इसके बाद उन्होंने लाल मेरी पत रखिए बला... दमादम मस्त कलंदर.. पेश किया. 

बुखारी के गानों पर लोग इस कद झूम उठे की दर्शकदीर्घा में ही उठकर डांस करने लगे. बुखारी  के साथ साहित्य आजतक में आए लोगों ने खूब एंज्वाय किया. अंतिम बोल तक तालियों की गड़गड़ाहट होती रही.

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