अदब के शहर लखनऊ में 'साहित्य आजतक लखनऊ' का आयोजन जारी है. दो-दिवसीय महोत्सव का आज दूसरा दिन है, और 16 फरवरी को गोमती नगर के अंबेडकर मेमोरियल पार्क में आयोजित हो रहे इस शब्दों-सुरों के इस महाकुंभ में देश-विदेश के प्रसिद्ध साहित्यकार, कलाकार और मनोरंजन जगत के दिग्गज शामिल हो रहे हैं. दूसरे दिन के पहले सत्र का आगाज लोकगीतों की सुंदर धुन के साथ हुआ, जिसे प्रख्यात लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपने खूबसूरतों सुरों से सजाया.
इस दौरान लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने साहित्य आजतक लखनऊ के मंच पर अपनी नई किताब ‘चंदन किवाड़’ के बारे में भी खुलकर बातचीत की.
क्यों रखा किताब का नाम ‘चंदन किवाड़’?
मालिनी अवस्थी ने बताया कि यह किताब उन गीतों की प्रेरणा से उपजी है, जो उन्होंने वर्षों से गाए हैं. इन गीतों के पीछे के किरदार बहुत ही शक्तिशाली और प्रेरणादायक रहे हैं. उन्होंने किताब का नाम ‘चंदन किवाड़’ रखने की वजह बताते हुए कहा, "आजकल किवाड़ (दरवाजे) दिखते नहीं हैं, वे सिर्फ मंदिरों और हवेलियों में बचे हैं, लेकिन पुराने जमाने जब चंदन के किवाड़ होते थे और शीतल चंदन की सुगंध लिए जब आप गृहप्रवेश करते थे तो ऐसा लगता था कि संस्कृतियों-संस्कारों के किसी संसार में प्रवेश कर रहे हैं. ये सब लोक जीवन की यादें हैं. इस किताब को मैंने अपनी मां निर्मला को समर्पित किया है."
मालिनी अवस्थी ने आगे बताया कि इस किताब को लिखने की प्रेरणा उनके विभिन्न रिश्तों से भी मिली. उन्होंने कहा, 'मैं बेटी, मां, पत्नी, सास, समधन और दादी-नानी भी हूं. इन सारे रिश्तों ने मुझे इस किताब को लिखने के लिए प्रेरित किया."
'रेलिया बैरन' गीत और मजदूरों का दर्द
मालिनी अवस्थी ने अपने प्रसिद्ध गीत 'रेलिया बैरन' का संदर्भ देते हुए मजदूरों के संघर्ष की कहानी भी साझा की. उन्होंने बताया कि एक बार वह लद्दाख में कार्यक्रम के लिए गई थीं. वहां से जब उन्हें दिन में समय मिला, तो वह खार डूंगला गईं, जो दुनिया की सबसे ऊंची जगहों में से एक है.
वहां सड़क निर्मा का काम चल रहा था. वहां मजदूर भाई लोग सड़क निर्माण में जुटे थे. "मैंने मजदूरों से पूछा कि वे कहां से आए हैं तो पता चला कि कोई सहरसा, पटना, जौनपुर से था. वे चार महीने का ठेका लेकर वहां काम कर रहे थे और फिर कमाकर घर लौटने की उम्मीद में थे. मैंने महसूस किया कि हमारे देश में जो भी निर्माण कार्य होते हैं, उनकी नींव में इन मजदूरों की पत्नियों के विरह के आंसू भी शामिल होते हैं."
मंच पर मौजूद दर्शकों की मांग पर मालिनी अवस्थी ने ‘रेलिया बैरन’ गीत भी गाया. उन्होंने यह भी बताया कि यह गीत अंग्रेजों के जमाने की उस पीड़ा को बयां करता है, जब भारत में जबरन नील की खेती कराई जाती थी. उस दौर में विश्व में औद्योगिक क्रांति हो रही थी और भारतीय श्रमिकों को सस्ते मजदूरों की तरह इधर-उधर भेजा जा रहा था. वह कहती हैं कि 'वे भले ही श्रमिक हों, मजदूर हों, लेकिन थे तो किसी न किसी के सुहाग ही. उनकी ब्याहताओं का दर्द ही इस गीत में समाया है.' साहित्य आजतक के मंच पर यह सत्र लोक संस्कृति, साहित्य और समाज के अनकहे पहलुओं को उजागर करने वाला साबित हुआ.
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