Sahitya Aajtak 2024: आईना देख-देख खुद को जवान करते हैं...'कविता के बहाने' सेशन में खूब जमा रंग

Sahitya Aajtak 2024: साहित्य आजतक 2024 की शुरुआत हो चुकी है. 3 दिन चलने वाले साहित्य के इस महाकुंभ में पहले दिन कई दिग्गज कलाकारों और साहित्यकारों ने हिस्सा लिया. इस दौरान 'कविता के बहाने सेशन' में IAS नीतीश्वर कुमार,  प्रोफेसर संगीत कुमार रागी,  IAS पवन कुमार और आलोक यादव ने हिस्सा लिया और रंग जमा दिया.

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Alok yadav, Pawan Kumar, Nitishwar Kumar, sangeet Ragi Alok yadav, Pawan Kumar, Nitishwar Kumar, sangeet Ragi

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 नवंबर 2024,
  • अपडेटेड 8:33 PM IST

साहित्य आजतक का मंच एक बार फिर सज गया है. 22 नवंबर से 24 नवंबर तक यानी पूरे तीन दिनों के लिए दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में साहित्य का मेला लग गया है. साहित्य आजतक 2024(Sahitya Aajtak 2024) के पहले दिन 'कविता के बहाने' के इस सेशन में नीतीश्वर कुमार,  प्रोफेसर संगीत कुमार रागी,  पवन कुमार और आलोक यादव ने हिस्सा लिया. ये सभी अलग-अलग पेशे से आते हैं, लेकिन कविताएं, शायरी और गजलों को लिखने और कहने में भी इन्हें महारत हासिल है. नीतीश्वर कुमार और पवन कुमार जहां IAS हैं तो संगीत रागी प्रोफेसर हैं. वहीं, आलोक यादव भी लंबे समय से ब्यूरोकेसी का हिस्सा रहे हैं.

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चारों दिग्गज नीतीश्वर कुमार,  प्रोफेसर संगीत कुमार रागी,  पवन कुमार और आलोक यादव ने 'कविता के बहाने'  सेशन में अपनी  कविताएं, गजल और अपने शायराना कलाम से दर्शकों का दिल जीत लिया और रंग जमा दिया.  आइए नजर डालें साहित्य आजतक 2024 में पढ़े गए उनकी कुछ रचनाओं पर. 

IAS पवन कुमार की कुछ गजलें

1. जुनूं में रेत को यूं ही नहीं निचोड़ा था
किसी की प्यास ज़ियादा थी पानी थोड़ा था

फिर उस के बा'द तो आँखों से नींद गायब थी
किसी ख़याल ने एहसास को झिंझोड़ा था

तमाम उम्र भटकते रहे थे वहशत में
बस एक मर्तबा हम ने हिसार तोड़ा था

वजूद रखना था अपनी शनाख़्त खो कर भी
नदी ने ख़ुद को समुंदर की सम्त मोड़ा था

ये मुश्किलात उसी राह में न आनी थीं
मैं जो भी रास्ता चुनता उसी में रोड़ा था

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बिखर गए थे मिरे गिर्द दर्द के सिक्के
तुम्हारी याद की गुल्लक को रात तोड़ा था.

2.किसी ने रक्खा है बाज़ार में सजा के मुझे
कोई ख़रीद ले क़ीमत मिरी चुका के मुझे

उसी की याद के बर्तन बनाए जाता हूँ
वही जो छोड़ गया चाक पर घुमा के मुझे

है मेरे लफ़्ज़ों को मुझ से मुनासिबत कितनी
मैं कैसा नग़्मा हूँ पहचान गुनगुना के मुझे

मैं ऐसी शाख़ हूँ जिस पर न फूल-पत्ते हैं
तू देख लेता कभी काश मुस्कुरा के मुझे

कड़ी है धूप तो सूरज से क्या गिला कीजे
यहाँ तो चाँद भी पेश आया तमतमा के मुझे

उसे भी वक़्त कभी आइना दिखाएगा
वो आज ख़ुश है बहुत आइना दिखा के मुझे

क़सीदे पढ़ता हूँ मैं उस की दिल-नवाज़ी के
जलील करता है अक्सर जो घर बुला के मुझे

प्रोफेसर संगीत रागी की रचनाएं

1. आईना देख-देख खुद को जवान करते हैं 
हुश्न को यूं बेलगाम करते हैं
कत्ल करना है तो कोई उनसे सीखे
वो जो हस-हस तमाम करते हैं

2. टिड्डियों की तरह वह छा गए हैं
बहुत से बाल स्वयंसेवक आ गए हैं
समय के नब्ज के माहिर खिलाडी
बदलते चाल के अद्भूत जुआरी
नए घुसपैठिए बेचारे घर को खा गए

ब्यूरोक्रेट आलोक यादव के जानदार-शानदार शेर

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1. अब न रावण की कृपा का भार ढोना चाहता हूँ
आ भी जाओ राम मैं मारीच होना चाहता हूँ

थक चुका हूँ, और कब तक ये दुआ करता रहूँ मैं
एक कांधा कर अता मौला कि रोना चाहता हूँ

3. बन के ज़ंजीर मेरे पांव में वो रहती है

मैंने इक बार जो पायल तुझे पहनाई थी

उम्र भर सिर्फ़ वही रौनक़े-तन्हाई थी

मैंने तस्वीर तेरे साथ जो खिंचवाई थी 

3.फ़ाख़्ता शाख़ से उड़ते हुए घबराई थी 
जब परिंदों के बिलगने की सदा आई थी 

इस जबां पर ही नहीं रूह पे भी छाले हैं
मैंने इक बार तेरी झूठी क़सम खाई थी 

4. नहीं हैं सब हमारे यार झूठे
यही होंगे कोई दो चार झूठे

उठा कर हाथ में गंगाजली को
क़सम खाते रहे हर बार झूठे

हवस को अपनी कहते हैं मुहब्बत
हैं सारे आपके बीमार झूठे

IAS नीतीश्वर कुमार के शेर

1. बड़ी लंबी है तेरे साथ तमन्नाओं की रात
चांद निकला था घड़ी भर की बरसात के बाद
मैं अंधेरे में तेरी तस्वीर को रंग देता हूं
लोग कहते हैं तेरा चेहरा है आफताब के बाद

2. ये शाख है नई नई मोहब्बतों के नाम की 
तलाश थी यार  की अच्छा हुआ तू आ गई
दिल के अधूरे मेल में, इन ख्वाहिशों के खेल में
पल भर के ही एहसास में तू आंख में नहा गई 
तलाश थी यार की अच्छा हुआ तू आ गई

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