साहित्य आजतक का मंच एक बार फिर सज गया है. 22 नवंबर से 24 नवंबर तक यानी पूरे तीन दिनों के लिए दिल्ली के मेजर ध्यानचऺद नेशनल स्टेडियम में साहित्य का मेला लग गया है. साहित्य आजतक 2024(Sahitya Aajtak 2024) के पहले दिन बदलते दौर में बाल साहित्य में हुए बदलाव को लेकर भी चर्चा हुई, जिसमें लेखक दिविक रमेश, लेखिका क्षमा शर्मा और डॉ शकुंतला कालरा ने हिस्सा लिया. बता दें कि क्षमा शर्मा और दिविक रमेश दोनों को साहित्य अकादमी बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. वहीं, डॉ शकुंतला कालरा को बाल साहित्य भारती पुरस्कार से नवाजा जा चुका है.
बदलते दौर में कहां है बाल साहित्य
आज के दौर में बाल साहित्य कहां है, इसपर बात करते हुए दिविक रमेश कहते हैं. बदलते दौर की दुनिया में भी हर जगह बाल साहित्य है. गूगल पर एक सर्च पर बाल साहित्य सामने आ जाती है. बाल साहित्य की किताबें इतनी बिकती हैं कि इसके लेखकों को अभी भी साल भर में 8 लाख तक की रॉयल्टी मिल जाती है. असली सवाल ये है कि बाल साहित्य में कितना उत्कृष्ट काम हो रहा है. मुश्किल ये आ रही है कि कई साहित्यकार बच्चों को अपनी रचनाओं में बच्चों की सहभागी नहीं बना रहे हैं. अगर आप कहते हैं मैं बच्चों के लिए लिखता हूं तो ये गलत है. आपको साहित्य लिखने से पहले ये जानना जरूरी है कि बच्चा क्या चाहता है, उसकी जिज्ञासा क्या है. इस हिसाब से साहित्य लिखेंगे तो उत्कृष्ट रचनाएं निकलकर आएंगी. हालांकि, सच ये भी है कि बाल साहित्य में कई लोग उत्कृष्ट काम कर रहे हैं.
क्या साहित्यकार बच्चों की मन की बात
क्या बाल साहित्यकार बच्चों की मन की बात समझ पा रहे हैं. इसपर लेखिका क्षमा शर्मा कहती हैं. मन की बात समझने का पैरामीटर क्या है? बाल साहित्य की किताबों पर लाखों की रॉयल्टी मिल रही है. इसका अर्थ ये ही हुआ है ना कि बाल साहित्यकार बच्चों की मन की बात से समझ पा रहे हैं. हां, टेक्नॉलॉजी आती हैं तो चीजें बदलती है, इसपर सवाल उठता है, उठना चाहिए. बच्चों को मोबाइल इंटरनेट दूर रखना चाहिए. दरअसल, क्या हो रहा बच्चों के माता-पिता बच्चों को मोबाइल थमा दे रहे हैं,जो बच्चों को बाल साहित्य से दूर कर रहा है. बच्चों के माता-पिता को ध्यान देना चाहिए को अपने बच्चों के लिए कितनी पुस्तकें खरीद रहे हैं. जहां पुस्तकें बिकने की बात है तो सरकारी स्तर पर भी काफी पुस्तकें खरीदी जाती हैं और हमें रॉयल्टी मिल जाती हैं, सवाल यही है कि कितनी पुस्तकें असल में माता-पिता अपने बच्चों के लिए ले रहे हैं. अगर बाल साहित्य हाशिए पर है तो इसके लिए हम सब जिम्मेदार है.
बाल साहित्य से बच्चों में आता है संस्कार
डॉ शकुंतला कालरा कहती हैं कि बाल साहित्य बच्चों में संस्कार लाता है. आप जोर देते हैं कि आपका बच्चा पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़े. उसका करियर अच्छा हो. ये सब हो जाएगा, लेकिन क्या वह अच्छा नागरिक बन पाएगा. ऐसा नहीं हो पाएगा. बाल साहित्य की यही भूमिका है कि वह बच्चों को अच्छा इंसान बनाता है. आप अपने बच्चों को महंगी-महंगी सुविधाएं दिलाते हैं, महंगी जगहों पर जाते हैं, लेकिन किताबें दिलाने में कोताही बरतते हैं. ऐसे में जरूरी है माता-पिता बच्चों को किताबें खरीदकर देना शुरू करें.
डॉ शंकुतला कालरा आगे कहती हैं कि साहित्यकार की भी एक जिम्मेदारी है कि वह अपने कहानी और कविताओं के माध्यम से बच्चों की उलझनें, जिज्ञासाएं को शांत करे. जबतक बच्चों को बाल साहित्य से संदेश नहीं मिलना शुरू होगा तब तक उसकी साथर्कता नहीं है. बाल साहित्य मनोरंजक हो इसपर ज्यादा लोग जोर देते हैं, लेकिन इससे बच्चे को कोई ना कोई संदेश हासिल हो ऐसा भी होना चाहिए. इसके अलावा प्रकाशक का काम है कि साहित्यकारों की रचनाओं को किताब की शक्ल में आकर्षक तरीके से तैयार कर बच्चों तक पहुंचाएं. बाल साहित्य फले-फूले यह हम सब की साझी जिम्मेदारी है.
साहित्यकारों को इस गलतफहमी से बाहर आना चाहिए.
दिविक रमेश साहित्यकारों की गलतफहमी की तरफ भी इशारा करते हुए कहते हैं कि हमें लगता है कि भारत का बच्चा शहरों और गांवों मे ही रहता है. साहित्यकारों को इस गलतफहमी से बाहर आना चाहिए. हमारा बच्चा वह भी है जो आदिवासी क्षेत्रों में रहता है, उनके पास सुविधाओं कमी है. उनके लिए भी साहित्य लिखा जाना चाहिए. ऐसा करने वाले अभी कम हैं लेकिन उनकी संख्या में भी इजाफा हो रहा है, दूर-सृदूर रहने वाले बच्चों के लिए भी बाल साहित्य लिखा जा रहा है.
aajtak.in