नई दिल्ली में आयोजित हुए जी-20 सम्मेलन के इन्विटेशन कार्ड पर 'प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया' की जगह 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' लिखने के बाद से ही 'भारत' को भारत कहा जाए या इंडिया, इसपर देश में बहस छिड़ गई है. दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में आयोजित शब्द-सुरों के महाकुंभ 'साहित्य आजतक 2023' के दूसरे दिन लेखक और नेता योगेन्द्र यादव, बीजेपी प्रवक्ता तुहिन अमर सिन्हा और सीएसडीएस के एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद ने इंडिया बनाम भारत के मुद्दे पर खुलकर और विस्तार से बात की.
भारत सबको जोड़कर रखने वाला देश: योगेन्द्र यादव
India vs Bharat के मुद्दे पर आयोजित सत्र के दौरान योगेन्द्र यादव ने कहा है कि 'इंडिया वर्सेस भारत' का हमारा समाज और संस्कार नहीं है. भारत एक समावेशी देश है. जो जिससे मिला सीखा है हमने, गैरों को भी अपनाया हमने. भारत वर्सेज इंडिया यह बहुत ही अभारतीय सवाल है. भारत इस देश का नाम है, इसमें कोई संदेह नहीं है. प्रश्न यह है कि क्या भारत ही हो. क्या इंडिया भी हो या नहीं. यह ही का देश नहीं बल्कि भी का देश है, सबको जोड़कर रखने वाला देश है.
उन्होंने आगे कहा कि 'चक दे इंडिया' और यह 'भारत देश है मेरा' सबको साथ लेकर चलने वाला देश है यह भारत. यह सवाल तीन बार उठाया गया है. पहली बार 1947 में. दूसरी बार 80 के दशक में. लेकिन यह तीसरी बार जो सवाल उठा है वह डर से पैदा हुआ सवाल है. डर ऐसा कि जो कुर्सी पर बैठे हैं वह डर गए हैं. मुझे बीजेपी पसंद नहीं है इसका मतलब यह तो नहीं कि मैं यह कहूं कि कमल का फूल बहुत बुरा है. आपको इंडिया गठबंधन पसंद नहीं है. उससे डर भी लगता है. आपका दर्द समझता हूं, लेकिन उसके लिए क्या आप देश का नाम बदल देंगे?
भारत नाम डर क्यों: तुहिन अमर सिन्हा
बीजेपी प्रवक्ता तुहिन अमर सिन्हा ने योगेन्द्र यादव पर पलटवार करते हुए कहा कि डर आपको तब लगता है जब क्षमता और तैयारी का अभाव होता है. यह कोई नहीं कह रहा है कि भारत इंडिया को रिप्लेस करेगा. हमारे संविधान में यही बताया गया है. नाम बदलने के लिए आखिरी बिल भी कांग्रेस के सांसद ने ही 2012 में लाए थे. इससे हमारा दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है. हमारे देवताओं के भी 108 नाम थे. तो भारत का दो नाम हो जाए तो किसी को डरने की क्या जरूरत है? भारत एक प्राचीन शब्द है. जबकि इंडिया नवीन शब्द है. वहीं, भारत बहुत ही आत्मिक शब्द भी है.
उन्होंने आगे कहा कि 'इंडिया' शब्द को कोई नहीं हटा रहा है. 'प्रसिडेन्ट ऑफ इंडिया' और भारत दोनों का इस्तेमाल सही है. भारत शब्द धर्म से जुड़ा शब्द है. इस धर्म का संबंध किसी के धर्म से नहीं. बल्कि राजा के दायित्व से है. हमें इंडिया से कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि आपको भारत से डर लगने लगा है.
बिना प्रासांगिक बातचीत व्यर्थः हिलाल अहमद
सीएसडीएस के एसोसिएट प्रोफेसर और 'अल्लाह नाम की सियासत' पुस्तक के लेखक हिलाल अहमद ने इंडिया बनाम भारत मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इसके तीन पक्ष हैं. पहला यह कि इस पर बहस ही क्यों किया जाए.
दूसरा- क्या नाम और अवधारणा दो अलग-अलग चीजें हो सकती हैं. किसी का नाम अलग-अलग हो सकता है. लेकिन जिसका हम नाम दे रहे हैं. अगर उसकी अवधारणा में कोई ठोस बात कही जा रही है तब ही चर्चा प्रासांगिक होती है. नहीं तो यह चर्चा अप्रासांगिक हो जाती है.
तीसरी- अगर हमें इस पर चर्चा करनी है तो हमें 1980 के दशक में जब यह चर्चा उठी थी. उस हिसाब से चर्चा करनी चाहिए. जिसमें ग्रामीण भारत की बात हो. अन्यथा यह चर्चा या बातचीत तू-तू मैं-मैं बदल जाएगी. भारत में इंडिया वर्सेस की कोई जगह नहीं है. कभी हो भी नहीं सकती है.
उन्होंने आगे कहा कि जिन्ना भी इस देश के नाम भारत से नाराज थे. वह हिंदुस्तान और पाकिस्तान के पक्षधर थे. लेकिन उस वक्त के भारतीय नेतृत्व बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने इसमें से धार्मिक संकीर्णता को निकाला. और इसका नाम इस तरह से पेश किया कि एक देश के कई नाम हो सकते हैं.
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