साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10: वर्ष 2023 में 'भाषा-आलोचना' श्रेणी में जिन पुस्तकों ने बनाई जगह

'साहित्य तक: बुक कैफे टॉप 10' पुस्तकों की शृंखला जारी है. वर्ष 2023 में कुल 17 श्रेणियों की टॉप 10 पुस्तकों में 'भाषा-आलोचना' श्रेणी में श्याम नारायण पांडेय, प्रभाकर माचवे, डॉ रामदरश मिश्र, गोपेश्वर सिंह, सुरेश पंत और भालचन्द्र जोशी के अलावा और किनकी पुस्तकें शामिल हैं

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साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10: वर्ष 2023 की 'भाषा-आलोचना' की टॉप 10 पुस्तकें साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10: वर्ष 2023 की 'भाषा-आलोचना' की टॉप 10 पुस्तकें

जय प्रकाश पाण्डेय

  • नई दिल्ली,
  • 19 दिसंबर 2023,
  • अपडेटेड 4:01 PM IST

शब्द की दुनिया समृद्ध हो और बची रहे पुस्तक-संस्कृति इसके लिए इंडिया टुडे समूह के साहित्य, कला, संस्कृति और संगीत के प्रति समर्पित डिजिटल चैनल 'साहित्य तक' ने पुस्तक-चर्चा पर आधारित एक खास कार्यक्रम 'बुक कैफे' की शुरुआत वर्ष 2021 में की थी... आरंभ में सप्ताह में एक साथ पांच पुस्तकों की चर्चा से शुरू यह कार्यक्रम आज अपने वृहद स्वरूप में सर्वप्रिय है.
साहित्य तक के 'बुक कैफे' में इस समय पुस्तकों पर आधारित कई कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं. इन कार्यक्रमों में 'एक दिन, एक किताब' के तहत हर दिन एक पुस्तक की चर्चा, 'शब्द-रथी' कार्यक्रम में किसी लेखक से उनकी सद्य: प्रकाशित कृति पर बातचीत और 'बातें-मुलाकातें' कार्यक्रम में किसी वरिष्ठ रचनाकार से उनके जीवनकर्म पर संवाद होता है. इनके अतिरिक्त 'आज की कविता' के तहत कविता पाठ का विशेष कार्यक्रम भी बेहद लोकप्रिय है. 
भारतीय मीडिया जगत में जब 'पुस्तक' चर्चाओं के लिए जगह छीजती जा रही थी, तब 'साहित्य तक' पर हर शाम 4 बजे 'बुक कैफे' में प्रसारित कार्यक्रमों की लोकप्रियता बढ़ती ही गई. हमारे इस कार्यक्रम को प्रकाशकों, रचनाकारों और पाठकों की बेपनाह मुहब्बत मिली. अपने दर्शक, श्रोताओं के अतिशय प्रेम के बीच जब पुस्तकों की आमद लगातार बढ़ने लगी, तो यह कोशिश की गई कि कोई भी पुस्तक; आम पाठकों, प्रतिबद्ध पुस्तक-प्रेमियों की नजर से छूट न जाए. आप सभी तक 'बुक कैफे' को प्राप्त पुस्तकों की जानकारी सही समय से पहुंच सके इसके लिए सप्ताह में दो दिन- हर शनिवार और रविवार को - सुबह 10 बजे 'किताबें मिलीं' कार्यक्रम भी शुरू कर दिया गया. यह कार्यक्रम 'नई किताबें' के नाम से अगले वर्ष भी जारी रहेगा.  
'साहित्य तक' ने वर्ष 2021 में ही पूरे वर्ष की चर्चित पुस्तकों में से उम्दा पुस्तकों के लिए 'बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला शुरू की थी, ताकि आप सब श्रेष्ठ पुस्तकों के बारे में न केवल जानकारी पा सकें, बल्कि अपनी पसंद और आवश्यकतानुसार विधा और विषय विशेष की पुस्तकें चुन सकें. तब से हर वर्ष के आखिरी में 'बुक कैफे टॉप 10' की यह सूची जारी होती है. 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' की यह शृंखला अपने आपमें अनूठी है, और इसे भारतीय साहित्य जगत, प्रकाशन उद्योग और पाठकों के बीच खूब आदर प्राप्त है. 
'साहित्य तक के 'बुक कैफे' की शुरुआत के समय ही इसके संचालकों ने यह कहा था कि एक ही जगह बाजार में आई नई पुस्तकों की जानकारी मिल जाए, तो पुस्तकों के शौकीनों के लिए इससे लाजवाब बात क्या हो सकती है? अगर आपको भी है किताबें पढ़ने का शौक, और उनके बारे में है जानने की चाहत, तो आपके लिए सबसे अच्छी जगह है साहित्य तक का 'बुक कैफे'. 
हमें खुशी है कि हमारे इस अभियान में प्रकाशकों, लेखकों, पाठकों, पुस्तक प्रेमियों का बेपनाह प्यार मिला. हमने पुस्तक चर्चा के कार्यक्रम को 'एक दिन, एक किताब' के तहत दैनिक उत्सव में बदल दिया है. वर्ष 2021 में 'साहित्य तक- बुक कैफे टॉप 10' की शृंखला में केवल अनुवाद, कथेतर, कहानी, उपन्यास, कविता श्रेणी की टॉप 10 पुस्तकें चुनी गई थीं. वर्ष 2022 में लेखकों, प्रकाशकों और पुस्तक प्रेमियों के अनुरोध पर कुल 17 श्रेणियों में टॉप 10 पुस्तकें चुनी गईं. साहित्य तक ने इन पुस्तकों को कभी क्रमानुसार कोई रैंकिंग करार नहीं दिया, बल्कि हर चुनी पुस्तक को एक समान टॉप 10 का हिस्सा माना. यह पूरे वर्ष भर पुस्तकों के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता और श्रमसाध्य समर्पण का द्योतक है. फिर भी हम अपनी सीमाओं से भिज्ञ हैं. संभव है कुछ बेहतरीन पुस्तकें हम तक पहुंची ही न हों, संभव है कुछ श्रेणियों में कई बेहतरीन पुस्तकें बहुलता के चलते रह गई हों. संभव है कुछ पुस्तकें समयावधि के चलते चर्चा से वंचित रह गई हों. पर इतना अवश्य है कि 'बुक कैफे' में शामिल ये पुस्तकें अपनी विधा की चुनी हुई 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' पुस्तकें अवश्य हैं. 
पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने की 'साहित्य तक' की कोशिशों को समर्थन, सहयोग और प्यार देने के लिए आप सभी का आभार.
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साहित्य तक 'बुक कैफे-टॉप 10' साल 2023 की 'भाषा-आलोचना' श्रेणी की श्रेष्ठ पुस्तकें-
* 'पंडित श्याम नारायण पांडेय ग्रंथावली'- प्रधान संपादक: पुरुषार्थ सिंह, उपसंपादक: डॉ अंजना सिंह सेंगर व डॉ सीमा सिंह 

 चार खंडों में प्रकाशित इस ग्रंथावली के पहले खंड में 'हल्दीघाटी- जय हनुमान- आरती', दूसरे खंड में 'जौहर -तुमुल- माधव', तीसरे खंड में 'परशुराम- रूपांतर' और चौथे खंड में 'शिवाजी- गोरा वध' जैसी कालजयी रचनाएं शामिल हैं. पंडित श्याम नारायण पांडेय की लुप्तप्राय दस कृतियों को एकसूत्रित कर ओज के आधुनिक भूषण के अंतरतम को चार खंडों में संकलित करने की कोशिश इन ग्रंथावलियों के ज़रिए की गई है. यह ग्रंथ आदि से आधुनिक काल तक, पराधीनता के बंधन से लेकर जीवन के उन्नयन तक, मुक्ति की चाह में लड़ते मन से लेकर सहज मन के भावार्पण तक को एकरूपता देने की कोशिश करता है.
प्रकाशक- प्रभात प्रकाशन
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* 'आधुनिक साहित्य सर्जना के आयाम'- रामदरश मिश्र

अपने आंखों अपनी सदी देख रहे हिंदी के सुपरिचित कवि, कथाकार, आलोचक, गद्यकार प्रो रामदरश मिश्र ने इस पुस्तक में साहित्य विधा पर एक दृष्टि देकर उसे समझाने का प्रयास किया है. हर प्रमुख सर्जक अपने युग का प्रबुद्ध चेता होता है, उसकी संवेदना अपने में नवीन तत्वों को समेटती रहती है. अतः जब वह सर्जन करता है, तब उसके व्यक्तित्व में आत्मसात सारी परम्परागत और नवीन चेतनाएं अपने-आप व्यक्त होती रहती हैं. युगीन चेतना फैशनवश ओढ़ी हुई कोई चीज नहीं है, वह ऐतिहासिक संदर्भ में पूरे समाज के जीवन के मूल्य और प्रणाली को प्रभावित करने वाली नवीन शक्ति है. युग चेतना को छोड़कर हम किसी जीवंत समाज को सही रूप में अंकित नहीं कर सकते. हर सर्जन के पीछे एक दृष्टि होती है. युगीन परिस्थितियों और चेतनाओं के परिवेश में जीवन-सत्यों को पहचानने की वह दृष्टि सहज ही नहीं मिल जाती. हिंदी साहित्य संसार के बहुआयामी, वयोवृद्ध साहित्यकार की यह पुस्तक हिंदी के स्नातकोत्तर विद्यार्थियों, शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण पुस्तक है. 
- प्रकाशक: सर्वभाषा ट्रस्ट
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* 'नामवर सिंह: आलोचना की सार्थकता' - भालचन्द्र जोशी

नवीन कहानी, कला की समीक्षा, प्रगतिवादी हिंदी आलोचना के एक समर्थ हस्ताक्षर के रूप में नामवर सिंह का नाम लिया जाता है. उन्होंने आदिकालीन साहित्य से लेकर नए से नए हिंदी कवियों व लेखकों को अपनी आलोचना का विषय बनाया. वे पृथ्वीराज रासो से लेकर मुक्तिबोध और धूमिल तक की लंबी और विशाल काव्य परंपरा को आत्मसात कर उसकी सम्यक समीक्षा करते थे. उनके लेखन का आरंभ अपभ्रंश से होता है किंतु नई कविता और समकालीन साहित्य पर भी सर्वाधिक सशक्त टिप्पणी करने वालों में वे अग्रणी रहे. यह पुस्तक हमारे समय के एक श्रेष्ठ आलोचक के कृतित्व को परखती आलोचना पुस्तक है, जो अनेक सन्दर्भों के साथ लिखी गई हैं. इसमें सिंह के अपने लेखन से जुड़े भरोसे के कुछ उदाहरण, उनके लेखन की उलझनें, कहे या लिखे गए को लेकर संशय और उनसे मुकरने की बातें हैं. यह पुस्तक नामवर सिंह के जीवन काल में ही आधी से ज्यादा लिखी जा चुकी थी. 
- प्रकाशक: रुद्रादित्य प्रकाशन
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* 'भाषा के बहाने'-सुरेश पंत

चर्चित भाषा प्रेमी, हिंदी-संस्कृत से विशेष लगाव और व्याकरण, शब्द-व्युत्पत्ति में रुचि रखने वाले पंत की यह पुस्तक हिंदी भाषा, बोली और शब्दों के प्रयोग पर बेहद रोचक, मारक और व्यंग्यात्मक ढंग से लिखे गए उनके 80 जानकारीपरक लेखों का संग्रह है. पंत के खुद के शब्दों में- मेरी पुस्तक 'भाषा के बहाने' का बहाना, शब्दकोश का टरकाऊ बहाना नहीं है. भाषा के बहाने आम जीवन के अनेक विषयों के भाषिक पहलुओं पर चर्चा की गई है. पाठक पाएंगे कि कुछ कहावतें, विश्वास, मसले, चिंताएं- भाषा से जुड़ी कोई बात कहीं दिखाई पड़ी तो उसे लपक लेने के लिए कलम उत्सुक हो गई. पुस्तक में दो परिशिष्ट भी हैं, एक है हिंदी व्याकरण पर ध्यान केंद्रित करना और दूसरा है आगे के संदर्भ के लिए पुस्तकों की सूची. यह पुस्तक मीडिया पेशेवरों और सिविल सेवा प्रतिभागियों सहित उन लोगों के लिए भी उपयोगी है, जो हिंदी भाषा और इसकी बारीकियों को ध्यान से समझना, बरतना और जानना चाहते हैं. 
- प्रकाशक: नवारुण प्रकाशन
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* 'प्रभाकर माचवे: रचना-संचयन'- चयन और संपादन: राजेंद्र उपाध्याय

'तार सप्तक' के कवि प्रभाकर माचवे का जन्म 26 दिसंबर, 1917 को एक मराठी परिवार में ग्वालियर में हुआ था. दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर के बाद उन्होंने 'हिंदी-मराठी निर्गुण संत काव्य' विषय पर आगरा विश्वविद्यालय से शोध पूरा किया. माचवे विद्यार्थी जीवन से ही कविताएं लिखने लगे थे. उन्होंने कविताएं, उपन्यास, कहानियां, निबंध, संस्मरण, शब्द-चित्र के अलावा लगभग सभी विधाओं में लेखन कार्य किया है. उनकी पहली कविता 1934 में माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित 'कर्मवीर' में छपी, तो पहली कहानी 1935 में प्रेमचंद ने 'हंस' में प्रकाशित की. इस कृति में माचवे की चुनिंदा कविताओं, कहानियों, निबन्धों का संचयन किया गया है. 
- प्रकाशक: साहित्य अकादमी
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* 'रुजुवात- आस्वाद, आलोचना, मीमांसा' - डॉ अशोक रा केळकर, अनुवाद- गोरख थोरात

यह एक अद्भुत पुस्तक है, जो मेल कराती है मराठी और हिंदी के बीच; उसकी कला, कविता, साहित्य और संस्कृति के बीच. हिंदी आलोचना के क्षेत्र में ऐसा बहुत कम होता है आलोचक साहित्य के अलावा अपने समय की अन्य कलाओं और उनमें चरितार्थ सौंदर्य-बोध और दृष्टि पर भी सजग नज़र रखता हो. क्र्ति और कृतिकार पर विचार करते समय भाषा, वाणी, साहित्य के संबंध और संवाद पर भी हिंदी विचार कम हुआ है. इस सन्दर्भ में मराठी के भाषा-चिन्तक और आलोचक अशोक केळकर को हिंदी में प्रस्तुत करना आलोचना के लिए नये रास्ते खोलने और नयी सम्भावनाओं की खोज की ओर संकेत करने जैसा है.
- प्रकाशक: रज़ा फ़ाउण्डेशन | सेतु प्रकाशन
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* 'रामचरितमानस में सौंदर्यचेतना: एक विवेचन'- डॉ सरोज कुमार

'जाकी रही भावना जैसी, हरी मूरत देखी तिन तैसी'
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस में राम के रूप-सौंदर्य के निरूपण में सौंदर्य की सभी कोटियों को ग्रहण किया है. तुलसी सौंदर्य के उपासक हैं. उनके राम सुंदर हैं और प्रकृति और मनुज की सुंदरता के लिए वे संपूर्ण रूप से, सर्वात्मना, समर्पित हैं. यह एक सुचिंतित शोधपरक ग्रंथ है. जिसमें उन्होंने प्रेम, भक्ति, आनंद और सौंदर्यशास्त्र की कसौटियों, तुलसी की काव्यदृष्टि के साथ-साथ सौंदर्यसंबंधी पश्चिमी अवधारणाओं को ध्यान में रखते हुए भाषा, अलंकार, विशेष्य-विशेषण एवं व्यास, तुलसी, कालिदास, कबीर, जायसी और सूरदास को सम्मुख रखते हुए मानस के विश्वव्यापी वितान को हमारे लिए सहेज कर रखा है. कविता को परखने के लिए सौंदर्यबोध की जो कसौटियां हो सकती हैं, लेखक ने इन सभी कसौटियों से गुजरते हुए मानस के सौंदर्यबोध की चर्चा की है. 
- प्रकाशक: सर्व भाषा प्रकाशन
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* 'परंपरा की पहचान' -अवधेश प्रधान

तीन खंडों में विभाजित यह पुस्तक साहित्यानुरागी आलोचक के विस्तृत लेखन और चिंतन का प्रतिनिधि चयन है. पुस्तक में- भारतीय नवजागरण का विस्तार, जातीय साहित्य का प्रवाह और परंपरा का संधान खंड में प्रधान ने धर्म और धर्मनिरपेक्षता की बहस के बीच धर्म को अफीम मानने वाली दृष्टि की एकांगिकता को परखा है और धर्म के अंध विरोध की जगह धर्मांधता के विरोध पर बल दिया है. उन्होंने रामकृष्ण, विवेकानंद और रवींद्रनाथ के संदर्भ के साथ एकता के साथ विविधता के समन्वय बिंदुओं पर अपने अध्ययन को केंद्रित किया है. यहां लेखक के लिए भारत महज एक मंशा नहीं, विचार है, जो इसी नाना और बहुधापन से जगमग और जीवंत है. इस जीवंतता की पहचान के लिए लेखक भक्ति काव्य की ओर लौटते हैं और 'पद्मावत' की सांस्कृतिक भूमि पर विचार करते हुए उसके केंद्र में अवध के लोक जीवन की शिनाख्त करते हैं. हिंदी जातीय प्रदेश और जातीय संस्कृति के अंग के रूप में हिंदी और मुसलमान एक ही वृक्ष की दो डाले हैं, जिन्हें हमारा लोक जीवन न केवल सशक्त बनाता है बल्कि हमारे लोक गीत और लोक कथाएं उनका उत्सव मनाते हैं. 
- प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन
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* 'आलोचक का आत्मावलोकन' - गोपेश्वर सिंह

यह पुस्तक हमारे समय का ऐसा दस्तावेज है, जिसमें समाज, सियासत और साहित्य की हर जरूरी हलचल और सवाल कैद हैं. इस पुस्तक के ज़रिए लेखक, प्राध्यापक और आलोचक सिंह विचारधारा और आत्मावलोकन के द्वंद्व की मांग करते हैं. वे साहित्य को वैचारिक निबंध की तरह पढ़े जाने को जायज नहीं मानते. उनका तर्क है कि इधर के वर्षों में साहित्य में आत्मावलोकन की प्रवृत्ति घटी है. जब से अस्मितावादी राजनीति का वर्चस्व बढ़ा है, रचना-आलोचना में आत्मावलोकन का भाव ज़रूरी नहीं रह गया है. बाइनरी में रचना-आलोचना को देखने का चलन ज़ोरों पर है. अपने विरोधी पर प्रहार और उसकी आलोचना का भाव जितना उग्र है, उतनी ही मंद है आत्मावलोकन की प्रक्रिया. कुल मिलाकर साहित्यालोचन राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप का सहोदर होता गया है. यह पुस्तक साहित्य पढ़ने की आदत बदलने पर ज़ोर देती है और आलोचना को प्रासंगिक बनाये जाने की मांग करती है. लेखक का मानना है कि रचना में विचार-तत्त्व के साथ रचनाकार का आत्मानुभव भी जुड़ा होता है. इसलिए एक ही समय में एक ही विचारधारा के रचनाकारों में भेद होता है. इसी तरह का भेद आलोचना-लेखन में भी होता है. 
- प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
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* 'प्रौद्योगिकी बैंकिंग और हिंदी' - डॉ रमेश यादव

यह पुस्तक भाषा प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी के विशेष संदर्भ में लिखी गयी है. लेखक का मानना है कि बैंकिंग आज हर किसी शहरी, कामकाजी, कस्बाई और अब तो ग्रामीण जीवन का भी अविभाज्य घटक बन चुका है. चूंकि आम से लेकर खास लोगों से इसका सीधा संबंध है, इसलिए इसकी गतिविधियों और इस व्यवस्था में हो रहे लगातार बदलावों को लेकर नागरिकों का सरोकार होना चाहिए. इस पुस्तक में स्थानीय स्तर पर विशेष तौर से भारतीय भाषा के स्तर पर बैंकों की गतिविधियां किस तरह से महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया के दौर से गुजरी हैं, क्या कुछ उसके नियम-विनियमन हैं, उसकी कार्यप्रणाली किस तरह की शब्दावली का प्रयोग करती है, इस विषय पर विस्तार से बात की गयी है. पुस्तक पिछले चार दशकों में बैकिंग क्षेत्रों में जो बदलाव हुए हैं उसे भी दर्ज करती है. 
- प्रकाशक: अद्विक पब्लिकेशन
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वर्ष 2023 के 'साहित्य तक बुक कैफे टॉप 10' में शामिल सभी पुस्तक लेखकों, प्रकाशकों, अनुवादकों और प्रिय पाठकों को बधाई! 

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