तो आंखों से अश्कों की बरसात होगीः शीन काफ़ निज़ाम जन्मदिन विशेष

उनका असली नाम शिव किशन बिस्‍सा है, पर जब वह शायरी लिखने लगे तो उर्दू में शीन काफ़ निज़ाम से इस कदर मशहूर हुए कि उनका असली नाम लोग भूल गए. निज़ाम साहब के ग़ज़ल संग्रह 'दश्त में दरिया' से ली गईं चुनिंदा गज़लें

दश्त में दरिया का कवर [सौजन्यः राजकमल प्रकाशन]
aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 26 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 5:07 PM IST

उनका असली नाम शिव किशन बिस्‍सा है, पर जब वह शायरी लिखने लगे तो उर्दू में शीन काफ़ निज़ाम से इस कदर मशहूर हुए कि उनका असली नाम लोग भूल गए. निज़ाम साहब इस दौर के उन चुनिंदा शायरों में से हैं जो मंच पर होकर भी मंचीय हल्केपन से बचे रहे. राजस्थान के जोधपुर में 26 नवंबर, 1947 को जन्मे शीन काफ़ निज़ाम ख़ालिस हिंदुस्‍तानी तहज़ीब की नुमाइंदगी करते हैं.उनके पास इस्‍लामी तौर तरीकों, धर्मग्रंथों, मिथकों का इतना गहरा अध्‍ययन है कि आप आसानी से उन्‍हें मौलवी या उलेमा मान सकते हैं। उनकी गज़लें जिस संवेदन संसार में हमें आमंत्रित करती हैं, वह हमारा जाना-पहचाना क्षेत्र हैं और उसमें वह बड़ी सहजता से प्रवेश करते हैं! नाद, लम्हों की सलीब, दश्त में दरिया, साया कोई लम्बा न था, सायों के साए में जैसे संग्रहों की अहमियत ऐसे भी समझिए कि उन्हें लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है.कहने की जरूरत नहीं कि शीन काफ़ निज़ाम की रचनाओं में जो देश-काल गूंजता है वह भी हमारा अपना सुपरिचित देश-काल है! उन्हें पढ़ते हुए हमें अपने को यह याद नहीं दिलाना पड़ता कि हम किसी सुन्दर मगर पराये बगीचे में झाँक रहे हैं! निज़ाम साहब के काव्य में एक और बात विशेष आकृष्ट करती है; वह है उसमें भावना और विचार का विलक्षण सामंजस्य ! निजाम दूर की कौड़ी लाने वाले या उड़ती चिड़िया के पर काटने वाले शायर नहीं हैं ! चमत्कारी बात उनकी अभीष्ट नहीं है.आज उनके जन्मदिन पर साहित्य आजतक पर पढ़ें उनके ग़ज़ल संग्रह 'दश्त में दरिया' से ली गईं चुनिंदा गज़लें-

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 मंज़िलें ख़्वाब और सफ़र अब तकमिट गया दश्त रहगुज़र अब तकहै कोई साथ हमसफ़र अब तकखौफ के साथ है ख़तर अब तकआईने सैकड़ों मयस्सर हैं।खुद को पहचानने का डर अब तकहो चले ज़र्द सब्ज़ साये भीबेख़बर को नहीं ख़बर तककितने दीवारो-दर से गुज़रा हूँज़हन में है मगर शजर अब तकयाद कर कर के जाने वालों कोफोड़ते हैं किवाड़ सर अब तकजाने किस को सदायें देता हैबिन किवाड़ों का एक दर अब तकशाख़ को एक बार छोड़ा थाढूँढता हूँ घना शजर अब तक***वो गुनगुनाते रास्ते ख़्वाबों के क्या हुएवीरान क्यूँ हैं बस्तियाँ बाशिन्दे क्या हुएवो जागती जबीनें कहाँ जा के सो गईंवो बोलते बदन जो सिमटते थे क्या हुएजिन से अँधेरी रातों में जल जाते थे दियेकितने हसीन लोग थे, क्या जाने, क्या हुएख़ामोश क्यूँ हो कोई तो बोलो जवाब दोबस्ती में चार चाँद से चेहरे थे, क्या हुएहम से वो रतजगों की अदा कौन ले गयाक्यूँ वो अलाव बुझ गए वो क़िस्से क्या हुएपूरे थे अपने आप में आधे-अधूरे लोगजो सब्र की सलीब उठाते थे क्या हुएमुम्किन है कट गए हों वो मौसम की धार सेउन पर फुदकते शोख़ परिन्दे थे क्या हुएकिसने मिटा दिये हैं फ़सीलों के फ़ासलेवाबस्ता जो थे हम से वो अफ़साने क्या हुएखंभों पे ला के किस ने सितारे टिका दिएदालान पूछते हैं कि दीवाने क्या हुएऊँची इमारतें तो बड़ी शानदार हैपर इस जगह तो रैन बसेरे थे क्या हुए***तो आँखों से अश्कों की बरसात होगीअगर ज़िन्दगी से मुलाक़ात होगीमैं बहती नदी हूँ तू वादी का सीनाख़ुदा जाने फिर कब मुलाक़ात होगीमुसाफ़िर हैं लेकिन नहीं कोई मंज़िलजहाँ दिन ढलेगा वहीं रात होगीसरे-शाम ही दिल घुमड़ने लगा हैलगे है कि इस रात बरसात होगीदरख़्तों के दामन से उलझेंगी किरनेंकहीं दिन उगेगा कहीं रात होगीजमीं जब ज़माने सभी खा चुकेगीपरिन्दों की आवाज़ सौगात होगीजहाँ साँस टूटेगी अपनी वहीं सेनए इक सफ़र की शुरूआत होगी*** आज हर सम्त भागते हैं लोगगोया चौराहा हो गए हैं लोगहर तरफ़ से मुड़े-तुड़े हैं लोगजाने कैसे टिके हुए हैं लोगअपनी पहचान भीड़ में खो करख़ुद को कमरों में ढूँढ़ते हैं लोगबंद रह रह के अपने कमरों मेंटेबिलों पर खुले खुले हैं लोगले के बारूद का बदन यारो!आग लेने निकल पड़े हैं लोगहर तरफ़ इक धुआँ-सा उठता हैआज कितने बुझे-बुझे हैं लोगरेस्तॉरानों की शक्ल कह देगीऔर क्या सोचते रहे हैं लोगरास्ते किस के पाँव से उलझेखूँटियों पर टँगे हुए हैं लोग.***पुस्तक: दश्त में दरिया लेखक: शीन काफ़ निज़ामविधा: ग़ज़ल/ नज़्मप्रकाशन: राजकमल प्रकाशनमूल्य: 150/- रुपए, पेपरबैकपृष्ठ संख्या: 144 

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