मालेगांव धमाके की आरोपी साध्वी प्रज्ञा को लोकसभा चुनाव में भोपाल से दिग्विजय सिंह के खिलाफ मैदान में उतारकर बीजेपी ने भगवा आतंकवाद पर बहस को राजनीति के केंद्र में ला दिया है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'आजतक' को दिए विशेष इंटरव्यू में इसे कांग्रेस के भगवा आतंकवाद शब्द उछालने और साजिश कर निर्दोष लोगों को फंसाने के खिलाफ लड़ाई का सिंबल बताया है. ऐसे मौके पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ प्रवीण तिवारी की किताब 'आतंक से समझौता' उस कथित साजिश को बेनकाब करने का दावा करती है जो लेखक के मुताबिक भगवा आतंकवाद की मौजूदगी साबित करने के लिए रची गई और साध्वी प्रज्ञा, स्वामी असीमानंद व कर्नल प्रसाद पुरोहित जैसे लोग उसका शिकार बने.
ब्लुम्सबरी द्वारा प्रकाशित करीब तीन सौ पन्नों की ये किताब समझौता ब्लास्ट, मालेगांव ब्लास्ट, अजमेर धमाके, मक्का मस्जिद ब्लास्ट की जांच से जुड़े लोगों, आरोपियों के कोर्ट में पेश हलफनामों, उनके वकीलों के दावों और अलग-अलग मौके पर राजनीतिक दलों के नेताओं की ओर से आये बयानों की कड़ियां जोड़ कर ये साबित करने की कोशिश करती है कि भगवा आतंकवाद शब्द एक साजिश था, जिसे राजनीतिक फायदे के लिए सोची समझी रणनीति के तहत उछाला गया और जिसके निशाने पर हिंदूवादी संगठन और संघ-बीजेपी के बड़े नेता थे.
किताब में तथ्यों, दावों, अलग-अलग लोगों से हुई बातचीत और एनआईए की जांच की जद में आए अलग-अलग किरदारों, उनपर लगे आरोप और उन आरोपों के आधार पर विस्तार से चर्चा की गई है. किताब में कई दिलचस्प प्रसंग हैं जिनमें एक एनआईए के उस एजेंट से मुलाकात और बातचीत का भी है जिसने समझौता और मालेगांव ब्लास्ट की जांच में कई अहम ठिकानों यहां तक कि असीमानंद का आश्रम और बीजेपी के दफ्तर तक में जासूसी की.
इसी तरह कर्नाटक फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के तत्कालीन डायरेक्टर बी. एम. मोहन से लंबी बातचीत भी इस किताब का हिस्सा है जिसमें मोहन ये दावा करते हैं कि महाराष्ट्र एटीएस द्वारा पहले पकड़े गए सिमी आतंकियों ने नार्को टेस्ट में उन ब्लास्ट में अपनी संलिप्तता स्वीकार की थी, जिनमें पहले एटीएस और फिर एनआईए ने साध्वी प्रज्ञा, असीमानंद और कर्नल प्रसाद पुरोहित जैसे लोगों को गिरफ्तार कर जांच की दिशा ही मोड़ दी.
किताब में साध्वी प्रज्ञा के उस टॉर्चर का भी जिक्र है जिसका उल्लेख प्रज्ञा लगातर भोपाल में अपने चुनाव प्रचार में कर अपने खिलाफ सहानुभूति की लहर पैदा करने की कोशिश कर रही हैं. किताब में कई महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए गए हैं और उन किरदारों को सामने लाया गया है जिनके बारे में राष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा बात तक नहीं की जाती. जैसे इंदौर से एटीएस द्वारा उठाया गया युवक दिलीप पाटीदार जिसके बारे में आजतक कोई नहीं जानता कि वो अब जिंदा भी है या नहीं और जिसकी गुमशुदगी में महाराष्ट्र एटीएस के दो अफसरों पर कोर्ट ने कार्रवाई भी की है.
किताब के एक चैप्टर में देशभर में अलग-अलग मौके पर हुए बम धमाकों का जिक्र है जिसे पढ़कर शरीर में सिहरन दौड़ने लगती है. किताब कुछ सवाल मीडिया के एक हिस्से पर भी उठाती है कि आखिर कैसे जिन हलफनामों के आधार पर हिंदू आतंकवाद की थ्योरी साबित करने की कोशिश की गई वे बेहद गोपनीय होने के बावजूद कुछ चुनिंदा मीडिया समूहों को मिलते जा रहे थे.
एक अन्य चैप्टर संघ प्रमुख मोहन भागवत और इंद्रेश कुमार की हत्या की साजिश के खुलासे पर भी विस्तार से प्रकाश डालता है और सवाल खड़ा करता है कि क्या साजिश की इस बात को इसलिए दबा दिया गया क्योंकि इससे भगवा आतंक के आरोपियों का आरएसएस और फिर बीजेपी से रिश्ता साबित करने में मुश्किल आती, जिससे इस पूरी थ्योरी को खड़ा करने के राजनैतिक मकसद को हासिल करना मुश्किल हो जाता.
लेखक और पत्रकार डॉक्टर प्रवीण तिवारी इस मामले से जुड़े कई मुद्दों पर समय समय पर अपनी न्यूज रिपोर्ट और ब्लॉग में अपनी राय रखते रहे हैं. लेकिन अब वे इसे पूरी किताब की शक्ल में लेकर आए हैं. इस किताब को अंग्रेजी में भी द ग्रेट इंडियन कॉन्सपिरेसी के नाम से प्रकाशित किया गया है.
पुस्तकः आतंक से समझौता
लेखकः डॉ. प्रवीण तिवारी
प्रकाशकः ब्लुम्सबरी
पृष्ठ संख्याः 282
मूल्यः हिंदी संस्करण-399 रुपए/ अंग्रेजी संस्करणः499
aajtak.in