शब्द उनके लिए माशूका की ऐसी जुल्फें हैं, जिन्हें अपने ज़िगर में भर, वे जब चाहें संवारने लगते हैं, और उनसे झरने लगते हैं गीत. ...गीत, जो राग-रागिनियों में बंधकर न केवल खुद कालजयी हो जाते हैं, बल्कि अपने गायकों को भी कर देते हैं अमर. हम बात कर रहे हैं गुलज़ार की, जिन पर कलाविज्ञ, संगीत रसिक, कवि, लेखक यतीन्द्र मिश्र की वर्षों की मेहनत एक किताब के रूप में सामने आई है, नाम है 'गुलज़ार सा'ब: हज़ार राहें मुड़ के देखीं'.
गुलज़ार शब्दों के जादूगर हैं. ऐसे जादूगर जिन्हें शब्दों संग आंख-मिचौली खेलना आता है... वे हिंदी के व्याकरण को मुंह चिढ़ाते हैं, और जब देवनागरी का शब्दकोष बौराने लगता है, तब वे उर्दू का दामन थाम लेते हैं. पंजाबी, अवधी, ब्रज और लोक तो उनके यहां हैं ही.
हिंदी जगत की सदियां गुलज़ार के गीतों से गुलजार है. जवान इश्क में, बच्चे प्रार्थना में, वृद्ध उम्मीद में और असहाय आशा में उनका दामन थाम लेते हैं. कभी केदारनाथ सिंह ने पूछा था, 'हमको मन की शक्ति देना..., क्या तुमने लिखा है, गुलज़ार?' उनका उत्तर था- 'जी, मैंने ही लिखा है. केदारनाथ सिंह का जवाब था- 'मुबारक़! तुम्हारा काम तुम्हारे नाम से आगे निकल गया है... अब और क्या चाहिए!'
वाकई शब्दों संग गुलज़ार की अठखेलियां सरगोशियों से सरपरस्ती तक हैं. अन्यथा ज़िगर से न तो बीड़ी जलती है, न ही किसी के आने से गर्मियों की लू चलती है... यह और बात है कि आशा भोसले ने कभी कहा था- 'चाँद के बग़ैर तो तुम गाना लिख ही नहीं सकते...' पर शायद ऐसा है भी, और नहीं भी है.
गुलज़ार एक साथ संभव भी हैं, और असंभव भी, पर यतीन्द्र ने उनके इन दोनों को छोरों को साध सा लिया है. इस किताब के परिचय में वे लिखते हैं, 'गुलज़ार एक ख़ानाबदोश किरदार हैं, जो थोड़ी दूर तक नज़्मों का हाथ पकड़े हुए चलते हैं और अचानक अफ़सानों की मंज़रनिगारी में चले जाते हैं. फ़िल्मों के लिए गीत लिखते हुए कब डायलॉग की दुनिया में उतर जाते हैं, पता ही नहीं चलता. वे शायरी की ज़मीन से फ़िल्मों की पटकथाएँ लिखते हैं, तो अदब की दुनिया से क़िस्से लेकर फ़िल्में बनाते हैं. अनगिनत नज़्मों, कविताओं, ग़ज़लों और फ़िल्म गीतों की समृद्ध दुनिया है गुलज़ार के यहां, जो अपना सूफ़ियाना रंग लिये हुए शायर का जीवन-दर्शन व्यक्त करती है. इस अभिव्यक्ति में जहां एक ओर हमें कवि के अन्तर्मन की महीन बुनावट की जानकारी मिलती है, वहीं दूसरी ओर सूफ़ियाना रंगत लिये हुए लगभग निर्गुण कवियों की बोली- बानी के क़रीब पहुंचने वाली उनकी आवाज़ या कविता का स्थायी फक्कड़ स्वभाव हमें एकबारगी उदासी में तब्दील होता हुआ नज़र आता है.'
... सच ही तो है, 'चौरस रात' हो या 'माचिस'; गुलज़ार शब्दों का जो संसार रचते हैं, उसमें जो कसक है, जो कशिश है, उसके लिए उन्हें कोशिश नहीं करनी पड़ती. वे 'एक बूँद चाँद' के लिए 'रावी पार' कर सकते हैं और इसके लिए 'मौसम' से कर सकते हैं 'हू तू तू'. 'नमकीन' होती हवाओं के बीच , बहुधा ओढ़ लेते हैं 'खामोशी'. कब 'इज़ाज़त' लेनी है और कब 'मासूम' बन 'यार जुलाहे' लिखना है, इसे गुलज़ार से बेहतर कोई नहीं जानता. वह जब-तब 'छैंया छैंया' के बीच 'रात पश्मीने की' चादर ओढ़ 'त्रिवेणी' पहुंच 'रात, चाँद और मैं' के बीच 'मेरे अपने' बना सकते हैं, इसे उनसे बेहतर कोई और नहीं जानता. 'आनंद' हो या 'आशीर्वाद' गुलज़ार अपनी पूरी धज से मौजूद रहते हैं...
यह यों ही नहीं है कि हमारे समय के इस सर्वाधिक चर्चित और लोकप्रिय लेखक, पटकथा लेखक, फ़िल्म निर्देशक, नाटककार, प्रख्यात शायर और बहुरंगी गीतकार गुलज़ार की कविताओं पर यतीन्द्र लिखते हैं, 'इस अर्थ में गुलज़ार की कविता प्रेम में विरह, जीवन में विराग, रिश्तों में बढ़ती हुई दूरी और हमारे समय में अधिकांश चीज़ों के संवेदनहीन होते जाने की पड़ताल की कविता है. इस यात्रा में ऐसे कई सीमान्त बनते हैं, जहाँ हम गुलज़ार की क़लम को उनके सबसे व्यक्तिगत पलों में पकड़ने का जतन करते हैं. एक पुरकशिश आवाज़, समय 'आईना बनाकर पढ़ने वाली जद्दोजहद, कविताओं की शक्ल में उतरी हुई सहल पर झुकी हुई प्रार्थना... उनका सम्मोहन, उनका जादू, उनकी सादगी और उनका मिज़ाज ये सब पकड़ना छोटे बच्चे के हाथों तितली पकड़ने जैसा है.'
गुलज़ार मुख्यतः हिन्दी, उर्दू तथा पंजाबी में सर्जते हैं, पर उनके यहां ब्रज, अवधी, भोजपुरी, खड़ी बोली, मारवाड़ी और हरियाणवी भी मौजूद है. तभी तो साहित्य अकादेमी, पद्म भूषण, ऑस्कर और ग्रैमी पुरस्कार से सम्मानित इस सर्जक के जीवनकर्म पर लिखते हुए यतीन्द्र यह बताना नहीं भूलते कि- गुलज़ार का सम्मोहन, उनका जादू, उनकी सादगी और उनका मिज़ाज ये सब पकड़ना छोटे बच्चे के हाथों तितली पकड़ने जैसा है. उनके जीवन-लेखन- सिनेमा की यात्रा दरअसल फूलों के रास्ते से होकर गुज़री यात्रा है, जिसमें फैली ख़ुशबू ने जाने कितनी रातों को रतजगों में बदल दिया है. गुलज़ार की ज़िन्दगी के सफ़रनामे के ये रतजगे उनके लाखों प्रशंसकों के हैं. आइए, ऐसे अदीब की ज़िन्दगी के पन्नों में उतरते हैं, कुछ सफ़हे पलटते हैं, कुछ बातें सुनते हैं... और अपने दौर को हम इस तरह भी साहित्य और सिनेमा के एक सुख़नवर की नज़र से देखते हैं.
तो साहित्य आज तक पर विशेष रूप से पढ़िए, यतीन्द्र मिश्र द्वारा लिखी इस अनूठी पुस्तक 'गुलज़ार सा'ब: हज़ार राहें मुड़ के देखीं...' के अंश
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पुस्तक अंश- 'गुलज़ार सा'ब: हज़ार राहें मुड़ के देखीं...'
- लेखक: यतीन्द्र मिश्र
बचपन याद है उन्हें. सरहद के उस पार का बचपन. झेलम ज़िले के दीना (अब पाकिस्तान में) की वो गलियाँ, जो उनके होने का वजूद उस मिट्टी से तय करती थीं, सब याद है. माँ सुजान कौर और पिता सरदार माखन सिंह कालरा का दुलारा 'पुन्नी' (सम्पूरन सिंह कालरा का पुकार का नाम) अपने नाना भाग सिंह से इकन्नी और नानी से दुअन्नी पाकर कैसे अपने बचपन के खेलों में डूबा रहता था. भाग सिंह, दीना और झेलम के बीच के पड़ोसी गाँव काला के निवासी थे. इस तरह सम्पूरन सिंह के नानी का गाँव पड़ोस में ही पड़ता था. ख़ुद दादा जी सरदार निहाल सिंह का पैतृक गाँव 'कुर्लां'; दीना से लगभग एक मील दूर था.
कुर्लां, काला और दीना से गुज़रता हुआ सम्पूरन सिंह का बचपन अपने सबसे सुन्दर दिनों में बीत रहा था और उनकी परवरिश में बहुत सारी चीज़ें, ढेरों आवाज़ें अपनी पकड़ मज़बूत कर रही थीं. उन्हें याद है कि उनके गाँव और आसपास की बस्ती में हीर सुनाने वाले, गुरुबानी गाने वाले लोग रहते थे. बचपन से ही कानों को जपुजी साहिब और गुरुबानी के पाठ की लत लग चुकी थी. गुरुग्रन्थ साहिब की आरती, जो राग धनाश्री में पारम्परिक तौर पर गायी जाती है, उसे जब रागी अपने साज़-बाज़ के साथ गाते थे, तो उनका मन अजीब मस्ती में डोलता था. आरती की टेक वाली लाईन, जो हर अन्तरे के बाद आती थी, उनके मन का मौसम ख़ुशगवार कर देती थी-
'कैसे आरती होय भवखण्डना तेरी
आरती अनहदा शब्द बाजन्त भेरी
आज के गुलज़ार साहब बहुत एहतराम से यह बताते हैं कि जिस सम्पूरन सिंह के कान में यह सब पड़ा है, उस पंजाबी और गुरुमुखी से उनका साबक़ा रहा है.
दीना बड़ा व्यापारी शहर था. बड़े क़स्बे की तरह का शहर. आढ़त वाले, थोक व्यापारी और कपड़ा बेचने वाले बजाज सभी उनके नानके काला तक व्यापार करने जाते थे. ... और इस तरह काला और दीना मिलाकर अच्छे-ख़ासे व्यापार के दो क़स्बे होते थे. दूसरे विश्वयुद्ध के दिन थे. दीना के स्टेशन पर वही ट्रेन रुकती थी, जिनमें फ़ौजियों के डिब्बे लगे होते थे. यह 1942-1945 के दरम्यानी सालों का वक़्त है और विश्वयुद्ध की प्रेत-छाया से डोलते हुए न जाने कितने मासूम क़स्बों, शहरों पर उसका कुछ न कुछ असर पड़ा हुआ है. आज गुलज़ार साहब नवासी वर्ष की उम्र में पीछे मुड़कर दीना के स्टेशन पर खड़े आठ साल के सम्पूरन सिंह की ओर जब ताकते हैं, तो उनके शायर का मन भी कलेजे को आ जाता है. आठ साल की उम्र में, सन् 1942 में उनका दीना छूटा और वे दिल्ली बसर के लिए आ गये. आज का शायर पीछे मुड़ता है, तो सेकेण्ड वर्ल्ड वार की तमाम ख़रोचें जैसे उनके दामन को किसी अनजान नेज़े से थोड़ा खुरच देती हैं. गोया, वो वक़्त का छूटा हुआ लम्हा आज भी उनकी गिरफ़्त में हो.
वो बच्चा जो दीना में छूट गया, वो शायर जो दिल्ली में जवान हुआ, वो किरदार जो बम्बई में बैठकर अपने गाँव-क़स्बे, दादके-नानके, दीना और झेलम को याद करता है, उसकी बस तारीख़ बदल गयी है और बीच में लगभग पिचहत्तर बरस का लम्बा समय बीत चुका है. 'ज़ीरो लाइन' कविता में भी दीना ऐसे ही आता है-
मगर सन्नाटे का इक रास्ता था जो दिखाई दे रहा था
वो रास्ता 'दीना' जाता था....
***
बहुत छोटा सा क़स्बा था, कभी वो
बहुत छोटा सा गत्तों का बनाया एक स्टेशन था
वहाँ सब गाड़ियाँ रुकती नहीं थीं
मगर वो 'लाम' के दिन थे
वही रुकती थीं जिनमें फ़ौजियों के डिब्बे होते थे
धुआँ दिखता था गाड़ी का, तो दौड़ आता था स्टेशन पर
उसमें अब्बा हट्टी के लिए सामान लेकर लौटा करते थे...
बस इतने भर से पुन्नी की यादें पूरी नहीं होतीं. उनमें पूरा जीवन अपने क़स्बाई किरदार में इस क़दर रचा-बसा है कि उसमें से सरदार माखन सिंह कालरा के ख़ानदान की कहानी को निकालकर अलग नहीं किया जा सकता. यादें और बचपन, वहाँ की आब-ओ-हवा और मिट्टी, रागियों का सबद कीर्तन और गुरुबानी पाठ और गायन, सब कुछ को स्मृतियों से कहाँ निकाला जा सकता है? दीना उसी तरह अब सिर्फ़ स्मृतियों का ही नहीं, बल्कि विचार और रोज़मर्रा की ज़रूरतों का हिस्सा है. उसकी क़िस्सागोई में वहाँ का बाज़ार-हाट और नसीहतें सभी कुछ अमिट रूप से दर्ज हैं. दीना की कविता इस तरह आगे बढ़ती है-
बस इक बाज़ार था
इक 'टाल्हियों' वाली सड़क भी थी
वो अब भी है
मदरसा था जहाँ मैं टाट की पट्टी बिछा कर तख़्ती लिखता था
गली भी है...
वो जिसका इक सिरा खेतों में खुलता था
वो दीवारें टटोलें, कोयले से जिन पे उर्दू लिखा करता था....
गुलज़ार का शायर मन इतने तरीक़ों से, इतनी गलियों-नुक्कड़ों में बँटकर दीना में बसता है. उफ़! कई दफ़ा ये दर्द बाँट लेने का मन करता है.
वे अठहत्तर साल की उम्र में दोबारा दीना जा पाये. अपने घर, अपने बचपन, अपने दादा और नाना को याद करने. अपनी नानी की दुअन्नी की खनक टटोलने. माँ सुजान कौर को थोड़ा और साँसों और एहसास में बसा लेने के लिए. हाँ! एक और बात के लिए. दीना के उस स्टेशन को देखने, जिसके अब दो ट्रैक हो गये हैं. ट्रेन अब भी आती है, मगर अफ़सोस कि उसमें से बचपन नहीं उतरता. सत्तर बरस बाद जैसे सब कुछ को दोनों हाथों से समेटने की ग़रज़ के साथ गुलज़ार दीना में खड़े हैं और स्मृतियों में धुँधलाया सहमा पुन्नी सेकेण्ड वर्ल्ड वार के दिनों में ट्रेन से उतरते हुए फ़ौजियों को देख रहा है.
सत्तर साल लगे हैं मुझको
दीना' वापस आकर धय्या छूने में
कितना दौड़ा हूँ मैं वक़्त के वीराने में
कितनी लम्बी आँख मिचौली खेली है!
(ध्य्या)
यादें पीछा करती हैं, मगर समय उनकी रंगत में पीलापन भरने लगता है. सुनहरी होती जाती स्मृतियाँ, बचपन और सपनों को एक ख़ास ढंग से ख़ाली भी करती जाती हैं. इकतारे पर गाये जा रहे बाबा फ़रीद और बुल्लेशाह ही बस नेक आवाज़ों की तरह बचे रह जाते हैं. बुल्लेशाह के क़ौल में अन्तर्मन का संगीत गूँजता है-
उठ चल्ले गुआंढों यार, रब्बा हुण की करिये
उठ चल्ले हुण रहंदे नाही
होया साथ तियार
रब्बा हुण की करिये?'
पिता, जिन्हें गुलज़ार अब्बू कहते हैं, स्टेशन पर खड़े मिलते हैं, मगर दीना का, उनके सीने में दर्द से भारी होता हुआ समय पीछे छूटता जाता है. सब कुछ एक साथ स्मृतियों के सन्दूक से निकलकर एकबारगी हाथों से होता हुआ दामन में पसरता है और फिर धीरे-धीरे आँख के सामने से ओझल हुआ जाता है. असमंजस पलता है मन के भीतर और बाहर दोनों तरफ़...
बहुत दिनों की चिपकी हुई तस्वीर थी एक स्टेशन की
कुछ बीच हवा में ठहरा हुआ इंजन का धुआँ
पीली पड़ने लगी थी अब रंगत उसकी
ट्रेन के इक दरवाज़े में जो खड़े थे, मेरे अब्बू थे ...
(2)
उन्होंने इकतारे पर बाबा फ़रीद और बुल्लेशाह को बहुत सुना है बचपन में...'रांझा जोगीड़ा बन आया', 'जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल', 'की बेदर्दां के संग यारी' और इसी तरह के न जाने कितने कलाम. ताडी जत्था गाता हुआ चलता था और उनके बचपन को कविता और संगीत से भरकर एक अलग ही रंग में रचता जाता था. उन्हें एक आवाज़ भी याद है, सुबह उठकर मथानी लेकर दही बिलोने की. तीसरी माँ विद्यावती उन्हें दही बिलोने के काम पर लगाती थीं. वे 'अधरिड़का' यानी आधा बिलोया हुआ दही उसके मक्खन और छाछ समेत हर रोज़ कांसे के बड़े गिलास से पीते थे. इसी मेहनताने की एवज़ में दही बिलोते थे, जिसमें मथानी और दही के बीच चलने वाली रस्साकशी से उपजने वाली गुड़प जैसी आवाज़ उनकी चेतना में बहुत दूर तक बसी हुई है. इसमें ख़ुद की माँ के गुज़र जाने के बाद दूसरी माओं का वो दौर भी शामिल है, जिससे कभी सहजता नहीं बन सकी. ....और ये भी हुआ कि रिश्ते की महीन धागे सरीखी डोर के दूसरी तरफ़ से भी इस रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए कभी कोशिशें नहीं हुईं.
अलबत्ता दीना से चला आया गुरुबानी सुनने का अभ्यास यहाँ दिल्ली में भी जारी रहा. हीर सुनाने वाले यहाँ भी गुरु-पर्व में गाने आते थे. आशा सिंह मस्ताना जैसे बड़े गवैये को उन्होंने बचपन में सुना है. कवि दरबार होते थे और उनके ख़ुद के रिश्तेदार दर्शन सिंह 'आवारा' पंजाबी के बड़े शायर हुए. गुलज़ार पर या यों कहें किशोर सम्पूरन सिंह पर इस तरह संगीत और कविता का प्रभाव पड़ता गया. बारह-तेरह वर्ष की उम्र में यह सब दिल्ली के सब्ज़ी मण्डी इलाक़े में सुना है उन्होंने. पंजाबी लोक संगीत की धरती दीना से निकल कर कब दिल्ली आकर अपनी जड़ें जमा गयी, ये आज तक ख़ुद गुलज़ार बूझ नहीं पाए. रोशनआरा बाग़ में भी यह चीज़ें उनके किशोर मन को अनजाने ही प्रभावित करती रहीं. बचपन में एक और चीज़ जुड़ी उनकी स्मृतियों में, जो बड़ी दिलचस्प और नयी बात थी. यह था आल्हा गायन सुनना. बुज़ुर्ग गुलज़ार आज ऐसे आल्हा की पंक्तियाँ सुनाते हैं, लगता है जैसे उनका किशोर मन जाग उठा है-
आल्हा ऊदल बड़े लड़ैया, ताका वार सहा न जाय
उन्हें याद है बड़े भाई जसमेर सिंह का एक दोस्त होता था ध्रुव. वो गांधी जी के प्रिय भजन 'वैष्णव जन तो तेने कहिए' को बड़े ही ख़ूबसूरत ढंग से गाता था. उनकी फ़ितरत में ध्रुव भी एक रोचक किरदार की तरह बसा हुआ है, क्योंकि उसने ही जवानी के दिनों में उनके मन को गांधी जी के इस भजन से रँगा था. इसी तरह स्कूल में दो दुआएँ पढ़ी जाती थीं. इनमें एक थी अल्लामा इक़बाल की 'लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी' और दूसरी 'तेरी शान जल्ले-जलाल हू'.
यह सब मन के कपड़े को रँगने वाली ऐसी चीज़ें थीं, जिनके रंगरेज़ उसके बाद से बचपन और किशोरावस्था की स्मृतियों में कहीं गुम हो गये. तब से आज तक सम्पूरन सिंह के मार्फ़त गुलज़ार के भीतर का युवा वो सब खोजना, बीनना, बटोरना चाहता है, जो अनजाने ही रास्तों में छूट गयी हैं. अपनी यादों के बड़े से सफ़री झोले में सब कुछ को समेट लेने की एक नाकाम-सी, मगर बड़ी जद्दोजहद.... इस जद्दोजहद में शायर का बहुत कुछ ऐसा पीछे छूट गया, जिसकी याद से मन ख़ुश्क़ हो जाता है और दर्द है कि न जाने कहाँ-कहाँ से रिसता रहता है.
यह रिसते हुए दर्द में खो जाने की तड़प और कुछ भी बचे न रह पाने की आह को कुछ कविताओं की अलग-अलग अभिव्यक्तियों में पढ़ा जा सकता है, जहाँ से गुलज़ार का किरदार एक मुकम्मल सूरत पाता है.
जाने कब छोटी का मुझ से छूटा हाथ
वहीं उसी दिन फेंक आया था अपना बचपन-
लेकिन मैंने सरहद के सन्नाटों में सहराओं में अक्सर देखा है
एक 'भमीरी' अब भी नाचा करती है
और एक 'लाटू' अब भी घूमा करता है! (भमीरी)
***
एक ही चक्कर लेता है चक्की पर रखा उम्र का चाक
एक ही चक्कर में सारा कुछ पिस जाता है....
रात और दिन की तसबीहें अब टूट रही हैं
इक बालिश्त हिस्सा बाक़ी है उम्र का शायद!
लौट रहा हूँ 'दीना' जहाँ से चाक चला था! (एक ही चक्कर लेता है...)
***
मगर ये सिर्फ़ ख़्वाबों ही में मुमकिन है
वहाँ जाने में अब दुश्वारियाँ हैं कुछ सियासत की
वतन अब भी वही है, पर नहीं है मुलक अब मेरा
वहाँ जाना हो अब तो दो-दो सरकारों के दसयों दफ़्तरों से
शकल पर, लगवा के मुहरें, ख़्वाब साबित करने पड़ते हैं!
(अगर ऐसा भी हो सकता है)
(3)
'गुड्डी' फ़िल्म से सम्बन्धित एक रोचक तथ्य का उल्लेख यहाँ प्रासंगिक लगता है. यह फ़िल्म जनवरी, 1971 में प्रदर्शित हुई. उस दिन संयोग से गुलज़ार, ऋषिकेश मुखर्जी और फ़िल्म के प्रोड्यूसर एन.सी. सिप्पी दिल्ली में मौजूद थे. तीनों ही लोग फ़र्स्ट डे, फ़र्स्ट शो देखना चाहते थे, सिर्फ़ इस लिहाज़ से कि ऑडियंस को यह फ़िल्म कैसी लगी? गुलज़ार साहब बताते हैं, हम लोग दिल्ली के डिलाइट सिनेमा में इसे देखने गये.
फ़िल्म जब अपने अन्त तक पहुँची, तो उसमें वाणी जयराम की आवाज़ में अभिनेत्री जया भादुड़ी पर मीराबाई का भजन 'हरि बिन कैसे जिऊँ री' फ़िल्माया गया, चल रहा था. वो भजन जैसे ही शुरू हुआ, ऑडियन्स हूटिंग करते हुए हँसने लगी. सारे लोग सहम गये, क्योंकि यही तो फ़िल्म का क्लाइमेक्स है! अब बात कैसे बनेगी? ऋषि दा तुरन्त सिप्पी साहब के साथ सिनेमा हॉल से बाहर आये और उन्होंने मुम्बई अजित बनर्जी को फ़ोन कॉल लगाया, जो फ़िल्म के आर्ट डायरेक्टर थे. उन्होंने अजित दा को तुरन्त निर्देशित किया कि उनके ख़ुद के घर में वे फिर से एक सेट लगायें और वे दिल्ली से मुम्बई शाम को लौटकर दूसरे ही दिन फ़िल्म का अन्त री-शूट करेंगे. ऋषि दा समझ गये थे, फ़िल्म बुरी तरह असफल होने वाली है.
गुलज़ार साहब आगे बताते हैं, दूसरे ही दिन मुम्बई पहुँचकर भजन हटाया गया और बिमल रॉय की 'मधुमती' का मशहूर गीत 'आ जा रे परदेसी, मैं तो कब से खड़ी इस पार' को जया जी पर फ़िल्माया गया. मुझे आज तक इस बात का पता नहीं चल सका कि इसी गाने को लेकर ऋषि दा के मन में क्यों यह बात सूझी और उन्होंने इसे अन्त के लिए किस कारण सुरक्षित कर लिया? अब समस्या यह थी कि अन्त तो री-शूट हो गया है, मगर देश भर के सिनेमा हॉलों में इसके प्रिंट जारी हो चुके हैं. इसका निगेटिव किस तरह हर सिनेमाघर तक पहुँचाया जाए और वहाँ अन्त बदलकर फ़िल्म नये सिरे से दिखाई जाये.
एन.सी. सिप्पी साहब बड़ी सूझ-बूझ वाले प्रोड्यूसर थे. उनका अपने निर्देशकों पर भरोसा पूरा रहता था, फिर वे ऋषि दा के तो बिज़नेस पार्टनर भी थे. उन्होंने बहुत जल्दी, कुछ ही दिनों के अन्तराल में इसे मैनेज कर लिया. इस तरह 'गुड्डी' का अन्त बदला गया और 'मधुमती' के गाने के साथ फ़िल्म डूबने से बच गयी. बाद में, उस अन्त ने ही फ़िल्म को क्लाइमेक्स के उस शिखर तक पहुँचाया, जिसके चलते 'गुड्डी' ने कामयाबी के बड़े कीर्तिमान स्थापित किये.
गुलज़ार साहब हँसते हुए बताते हैं, इस तरह 'गुड्डी' में लता मंगेशकर जी की आमद हुई, क्योंकि उनकी एक पुरानी क्लासिक कम्पोज़ीशन मुख्य नायिका पर फ़िल्मायी गयी थी. वो यह जोड़ना भी नहीं भूलते कि यही चीज़ उस्तादों से सीखने वाली है कि उन्हें (ऋषिकेश मुखर्जी) ऐसा क्या समझ में आ गया, जिससे फ़िल्म उबारी जा सकी. एक गाना, जो अपने आप में मुकम्मल ढंग से कम्पोज़ हुआ था, वह किन कारणों से अन्त में फ़िट नहीं बैठ रहा था, समझ से परे था. इसी तरह, एक पुराना गाना, जो पहले एक मशहूर फ़िल्म में न सिर्फ़ शाया हुआ, बल्कि बेहद पॉपुलर रहा है, को क्लाइमेक्स में शामिल कर लेने से इतना बड़ा अन्तर रचा जा सका. ऋषिकेश मुखर्जी की इस युक्ति की थाह आज तक गुलज़ार लगा नहीं पाये.
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पुस्तक: गुलज़ार सा'ब: हज़ार राहें मुड़ के देखीं
लेखक: यतीन्द्र मिश्र
भाषा: हिंदी
विधा: जीवनी
पृष्ठ संख्या: 515
मूल्य: 1995 रुपए
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
जय प्रकाश पाण्डेय