क्रांति में संघर्षों का अनिवार्य स्थान नहीं है, न ही उसमें व्यक्तिगत रूप से प्रतिशोध लेने की भावना होती है. बम और पिस्तौल की संस्कृति क्रांति नहीं है. क्रांति का मतलब और उसका आशय मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाना होना चाहिए. क्रांति से हमारा अर्थ है कि अंत में समाज में एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना की जाए जिसमें किसी प्रकार का भय न हो और जिसमें मजदूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए. फलस्वरुप विश्व संघ पूंजीवाद के बंधनों, दुखों और योद्धाओं की मुसीबतों से मानवता को उद्धार कर सके. मानव जाति का जन्मजात अधिकार है क्रांति. ये विचार हैं शहीद-ए-आजम भ्गत सिंह के, जो उन्होंने अपने खिलाफ मुकदमों की सुनवाई के दौरान दिए थे.
भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव में हुआ था. मौजूदा वक्त में ये स्थान पाकिस्तान में है. ये वो वक्त था जब पंजाब में आज़ादी की लौ जल रही थी. अंग्रेज़ों के खिलाफ बुलंद आवाज़ उठाने वालों में भगत के पिता सरदार किशन सिंह भी शामिल थे. इस लड़ाई में हिस्सा लेने की वजह से भगत के चाचा सरदार अजीत सिंह और सरदार स्वर्ण सिंह जेल में सजा भुगत रहे थे.
जब इस क्रांतिकारी बालक का जन्म हुआ तब पिता सरदार किशन सिंह जेल की सलाखों के पीछे थे. घर में उनकी मां विद्यावती, दादा अर्जुन सिंह और दादी जयकौर ही थे. लेकिन भगत सिंह के जन्म के तीसरे दिन ही पिता सरदार किशन सिंह को जमानत पर रिहा कर दिया गया. कुछ ही दिन बाद सरदार किशन के दोनों छोटे भाईयों को भी रिहाई मिल गई. परिवार में भगत सिंह के जन्म को शुभ संकेत माना गया. घर की बुजुर्ग दादी को लगा कि बच्चा भाग्यशाली है. इसलिए बच्चे का नाम दादी ने 'भागा वाला' यानी अच्छे भाग्य वाला रखा. धीरे-धीरे भागा वाले बालक को भगत सिंह कहा जाने लगा.
भगत सिंह अपने माता-पिता की दूसरी सन्तान थे. पहले पुत्र की छोटी उम्र में ही मृत्यु हो जाने के कारण भगत सिंह को ही सबसे पहली सन्तान माना जाता है. भगत सिंह के अलावा सरदार किशन सिंह के चार बेटे और बेटियां भी हुई थीं.
देश से प्रेम करने की सीख भागा को घर-परिवार से विरासत में मिली थी. दादा सरदार अर्जुन सिंह ब्रिटिश हुकूमत के कट्टर विरोधी थे. दादा सरदार अर्जुन सिंह की ही तरह भगत सिंह के पिता और उनके दोनो चाचा निडर और सच्चे देशभक्त थे. भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह पर तो अंग्रेज़ों ने सरकार के खिलाफ बगावत करने के लिए कई राजनीतिक मुकदमें तक चलाए थे. जिसकी एवज में किशन सिंह करीब अढ़ाई वर्ष तक जेल में बीता तो उन्हें दो वर्ष के लिए नजरबन्द भी रखा गया.
सरदार अजीत सिंह से अंग्रेज़ अधिकारी इतने भयभीत रहते थे कि हूकूमत के खिलाफ आंदोलनों मे भाग लेने के कारण उन्हें जून 1907 में बर्मा की राजधानी रंगून भेज दिया गया. जिससे वे पंजाब में अंग्रेज़ों के खिलाफ होने वाली बगावत में हिस्सा न ले सकें. वहां से रिहा होने के बाद सरदार अजीत सिंह ईरान, टर्की और आस्ट्रिया से होते हुए जर्मनी जा पहुंचे. उन दिनों प्रथम विश्वयुद्ध अपने चरण पर था. जर्मनी की हार के बाद वहां से ब्राजील चले आए. आखिरकार 1946 में मध्यावधि सरकार बनने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की कोशिशों से उनकी भारत वापसी हो सकी.
आज 23 मार्च है. महान क्रांतिकारी भगत सिंह का शहीदी दिवस. इस अवसर पर पत्रकार-लेखक फ्रेंकलिन निगम की पुस्तक 'कुर्बानीः एक क्रांतिकारी की कहानी' का जिक्र जरूरी है. यह पुस्तक हाल ही में सर्व भाषा प्रकाशन से प्रकाशित हुई है, और अपनी तरह की अनूठी पुस्तक है. साहित्य तक के बुक कैफे के 'एक दिन एक किताब' कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार जय प्रकाश पाण्डेय ने इस पुस्तक पर अपनी राय दी है. पर इस विशेष अवसर पर 'साहित्य आज तक' के पाठकों के लिए हम पुस्तक 'कुर्बानीः एक क्रांतिकारी की कहानी' का एक संपादित अंश भी यहां दे रहे हैं, जो चौथे एपीसोड के रूप में पुस्तक में दर्ज है.
***
वे मुझे मार सकते हैं,
लेकिन वे मेरे विचारों को नहीं मार सकते.
वे मेरे शरीर को कुचल सकते हैं,
मेरी आत्मा को नहीं.
भगत सिंह पर 7 मार्च 1929 को एडीशनल मजिस्ट्रेट मिस्टर एफबी पुल की अदालत में सुनवाई शुरू की गयी. 7 मई 1929 को सुबह दस बजे भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त को जेल की अदालत में पेश किया गया. उस दौरान दोनो क्रांतिकारी इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे. 8 मई को फिर दोनों को अदालत में हाजिर किया गया.
अधिकारी - नाम
भगत सिंह- भगत सिंह
अधिकारी - व्यवसाय
भगत सिंह- कुछ नहीं
अधिकारी - निवास स्थान
भगत सिंह- लाहौर
अधिकारी - पता
भगत सिंह- एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते हैं
अधिकारी - क्या 8 अप्रैल को तुम असेंबली में मौजूद थे
भगत सिंह- मैं अभी बयान देने की जरूरत नहीं समझता
मजिस्ट्रेट के सामने भगत सिंह ने बयान देने से इनकार कर दिया.
4 जून, 1929 को सेशन कोर्ट में मुकदमें की सुनवाई शुरू हुई. अदालत में भगत सिंह और उनके साथियों पर सांडर्स की हत्या, असेंबली में बम धमाका मामलों पर मुकदमा चलाया गया.
इस दिन भगत सिंह और उनके साथी इंकलाब-जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अदालत में दाखिल हुए.
जज मिड्लटन- (भौंवे सिकौंडते हुए) आर्डर ! आर्डर !
भगत सिंह मुस्कुरा रहे थे.
जज - (चिल्लाए) इन लड़कों के हाथ-पैर में बेड़ियां बांध दो.
अदालत के आदेश पर सभी के बेड़ियां पहना दी गयी थी. अदालत की काररवाई शुरू हुई तो सरकारी वकील ने अपनी दलील पेश की.
वकील- मीलोर्ड! इन दोनों पर धारा 307 के अंतर्गत मानव हत्या की कोशिश करने और धारा 3 के अनुसार बम विस्फोट करने के आरोप हैं. सार्जेट टेरी की गवाही के साथ-साथ उन्नीस लोगों की गवाहियां हैं जिन्होंने बड़ी होशियारी और हिम्मत से इन अपराधियों को गिरफ्तार किया है.
जज ने अपने पास रखी एक फाईल को सरसरी तौर पर देखा फिर आरोपियों की तरफ देखकर बोले- अपने ऊपर लगे आरोपों के बारे में कुछ कहना चाहते हो?
भगत सिंह - (शांत स्वर में) जी हां ! ये सारी गवाहियां और सुबूत बनावटी हैं.
सरकारी वकील - (गुस्से से ) इसका मतलब ये कि तुमने असेम्बली में बम नही फेंका?
भगत सिंह- जी! बम हमने ही फेंके थे. लेकिन जैसा कि गवाह कहते हैं, वह सही नहीं है. उन्होंने हमारे हाथ से रिवाल्वर नहीं छीने थे. बल्कि हमने खुद ही उन्हें एक तरफ रख दिया था.
वकील- लेकिन बम फेंककर तुमने लोगों का मारने का भयंकर अपराध किया है, उससे तुम इंकार तो नहीं कर सकते. क्यों?
भगत सिंह - यह आरोप गलत है. हमें मानवता से जितना प्रेम है उतना आपको भी नहीं होगा. हमारे जीवन में मानव जीवन के प्रति अपार करुणा है. असेंबली में मौजूद लोगों से हमें कोई दुश्मनी नहीं थी. अगर होती तो हम उस व्यक्ति को निशाना बनाकर बम फेंकते. हम शूस्टर साहब को मार सकते थे. हमने खाली जगह पर ही बम फेंके थे. हमारा इरादा किसी को मारना नहीं था.
वकील- ( तंज करते हुए) अच्छा ! तो तुम सिर्फ आतिशबाजी करना चाहते थे.
भगत सिंह - (हंसकर) हां.. अपनी जिंदगी की आतिशबाजी कर हम यहां कटघरे में आना चाहते थे, जान की बाजी लगा कर. हम इस मंच से देशवासियों से कहना चाहते हैं कि ये विधानसभा एक ढोंग है. यह आप लोगों का कल्याण नहीं करेगी. बल्कि मायाजाल में फंसाकर आपकी गर्दन को गुलामी के पाश में जकड़ देगी. समय पर सावधान हो जाओ. सचेत हो जाओ. ये सरकार जनता विरोधी है.
भगत सिंह पूरे जोश से अपनी बात कहे जा रहे थे.
भगत सिंह - हम जब इंकलाब-जिंदाबाद का नारा लगाते हैं, तो कुछ लोगों को महसूस होता है कि हमारी क्रांति केवल बम-बंदूकों और हिंसा पर आधारित है. लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है. हमारी क्रांति की अवधारणा इतनी तुच्छ नहीं हो सकती. अत्याचारी और क्रूर शासन को धवस्त करके हम क्रांति करना चाहते हैं. बदलाव लाना चाहते हैं. लेकिन सिर्फ विनाश करना ही क्रांति नहीं है. उसके स्थान पर कल्याणकारी व्यवस्था द्वारा दिया जाने वाला नव-निर्माण ही सच्ची क्रांति है. हम दिलो-जान से इसकी घोषणा करते हैं. हम उसी क्रांति का नारा लगाते हैं.
जून का महीना होने की वजह से अदालत के कमरे में उमस थी. भगत सिंह ने पसीना पोंछते हुए कहा.
भगत सिंह - (थोड़ा रुक कर न्यायालय में मौज़ूद लोगों का चेहरा देखते हुए) - न्यायधीश महोदय ! हमें विश्वास है कि आप हम सभी को कठोर दंड देंगे. लेकिन हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि साम्राज्यवादी राजसत्ता एक-दो लोगों को कुचल सकती है. नष्ट कर सकती है. लेकिन इससे उनके विचारों, सिद्धांतों और अवधारणाओं को समाप्त नहीं किया जा सकेगा. महोदय! बहरों को सुनाने और उनको समय पर चेताने के लिए हम लोगों ने असेम्बली में बम धमाका किया था. जिससे विरोध की आवाज को बुलंद किया जा सके. यह बात हम स्वीकार करते हैं. इसके लिए हम हर तरह की सज़ा भुगतने के लिए तैयार हैं. क्योंकि हमारी पूरी जिंदगी क्रांति की बलदेवी को समर्पित है.
सरकारी गवाहों के बयानों के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली के सेशन जज मिस्टर लियोनाई मिडिल्टन की अदालत में 6 जून को अपना ऐतिहासिक बयान दिया.
भगत सिंह- असेंबली में मौजूद किसी भी व्यक्ति के खिलाफ हमारी कोई दुश्मनी नहीं थी. हम तो यहां तक कहते हैं कि हम मानव जीवन को सबसे पवित्र मानते हैं. और किसी को भी चोट पहुंचाने की बजाय मानव जाति की सेवा में अपने प्राण तक दे सकते हैं. हम साम्राज्यवादी सेना के भाड़े के सैनिक नहीं हैं, जिन्हें हत्या करने में रस आता हो. इसके बावजूद हम स्वीकार करते हैं कि हमने असेंबली में बम फेंका.
भगत सिंह पूऱे आत्मविश्वास के साथ बोले जा रहे थे. अदालत में मौजूद लोग भगत सिंह को खामोश होकर सुन रहे थे.
भगत सिंह- क्रांति में संघर्षों का अनिवार्य स्थान नहीं है, न ही उसमें व्यक्तिगत रूप से प्रतिशोध लेने की भावना होती है. बम और पिस्तौल की संस्कृति क्रांति नहीं है. क्रांति का मतलब और उसका आशय मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन लाना होना चाहिए. क्रांति से हमारा अर्थ है कि अंत में समाज में एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना की जाए जिसमें किसी प्रकार का भय न हो और जिसमें मजदूर वर्ग के प्रभुत्व को मान्यता दी जाए. फलस्वरुप विश्व संघ पूंजीवाद के बंधनों, दुखों और योद्धाओं की मुसीबतों से मानवता को उद्धार कर सके. मानव जाति का जन्मजात अधिकार है क्रांति.
भगत सिंह- जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में सैंकड़ों लोगों की हत्या की थी, लेकिन उस पर कभी मुकदमा नहीं चलाया गया. इसके विपरीत उसे लाखों के इनाम देकर सम्मानित किया गया. उसकी तुलना में हम कमजोर बम बनाते हैं, जिसमें हम किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते. लेकिन हम क्रांतिकारियों को उम्र भर की कैद दी जाती है. किसी की हत्या का हमारा इरादा नहीं होता. द्वेष शब्द को निकाल दीजिए बस! मुझे संतोष हो जाएगा. हमारा एक निश्चित आदर्श है, मकसद है. जिसे पाने के लिए हम इस राह आने को विवश हैं.
10 जून को मुकदमा खत्म हुआ. 2 दिन बाद 12 जून को अदालत में 140 पेज का फैसला सुनाया गया. फैसले में कहा गया था कि उद्देश्यों के लिए तारीफों के कितने ही पुल बनाए गए हों, इससे अपराध गौण नहीं होता. इसलिए गैर-कानूनी तरीकों से हिंसा करने के आरोप पर हम दोनों अपराधियों को आजीवन कारावास की सजा दे रहे हैं. इस फैसले के दौरान इंकलाब-जिंदाबाद के नारे गूंजने लगे. अदालत ने अपना फैसला सुना दिया था. लेकिन सांडर्स हत्या में भगत सिंह का नाम होने के कारण उससे संबंधित मुकदमा चलना बाकी था. अदालत ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को दिल्ली से लाहौर की मियांवाली जेल भेजने का आदेश भी दिया. जिसके बाद सेशन कोर्ट के फैसले के खिलाफ लाहौर हाईकोर्ट में अपील की गयी. यहां अपील की सुनवाई जस्टिस एफ. फोर्ड और जस्टिस एडीसन ने की. भगत सिंह और बचाव पक्ष के वकील आसिफ अली ने ढाई दिन तक बहस की. फैसले में जस्टिस एफ. फोर्ड ने लिखा-
जस्टिस एफ. फोर्ड- ये कहना कोई गलत नहीं होगा कि ये लोग दिल की गहराईयों और जोश के साथ वर्तमान समाज के ढांचे को बदलना चाहते हैं. भगत सिंह एक ईमानदार और सच्चे क्रांतिकारी हैं. मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं कि वे अपने इस सपने को लेकर पूरी सच्चाई के साथ डटे हैं कि दुनिया का सुधार वर्तमान सामाजिक ढांचे को तोड़कर, बदलकर ही किया जा हो सकता है. लेकिन उनके ये विचार आरोपों की सफाई नहीं माने जा सकते.
इस बात को जान लेना भी जरूरी है कि भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद उनके दूसरे क्रांतिकारी साथी शांत नहीं बैठे थे. वे भगत को आज़ाद कराने की हरसंभव कोशिश करना चाहते थे. भगत सिंह को जब लाहौर जेल भेजे जाने की बात सामने आयी तो दिल्ली से लाहौर के रास्ते में उन्हें छुड़ाने की योजना भी बनायी गयी. इस योजना में क्रांतिकारी अजयकुमार घोष सबसे आगे थे. लेकिन ये योजना सफल न हो सकी. क्योंकि कुछ दिन बाद ही अजय घोष को गिरफ्तार कर लिया गया था.
आखिरकार दिल्ली से हथकड़ी पहनाकर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को ट्रेन के अलग-अलग कम्पार्टमेंट में लाहौर ले जाया गया. अंग्रेज़ इतने डरे हुए थे कि कहीं भगत सिंह के साथी उन्हें छुड़ा न लें, इसलिए पुलिस के जवान तैनात कर रखे थे. और भगत सिंह आराम से एक सीट पर कमर टिकाकर आंखे बंद किए बैठे थे.
ट्रेन अपनी रफ्तार पर थी. भगत सिंह ध्यान-मग्न थे.
***
करीब अढ़ाई साल का एक बच्चा अपने पिता सरदार किशन सिंह का हाथ थामे खेत के बीच चला जा रहा है. थोड़ी देर बाद किशन सिंह अपने मित्र नन्दकिशोर मेहता के पास पहुँचे. दोनों अपनी बातों में मशगूल हो गए. भगत ने मिट्टी के ढेर पर खेलने लगा. किशोर मेहता कि निगाह बालक पर पड़ी. भगत छोटे-छोटे तिनके ज़मीन पर बोने की कोशिश कर रहा था. मेहता ने मासूम बालक से पूछा-
मेहता - तुम्हारा नाम क्या है ?
बालक - भगत सिंह.
मेहता - तुम क्या कर रहे हो?
बालक - मैं बंदूकें बो रहा हूं.
मेहता - (हैरान होकर) बंदूकें!
बालक - हां, बंदूकें
मेहता - क्या करोगे बंदूकों का?
बालक - अपने देश को आज़ाद कराऊंगा.
ये थी देशभक्त और क्रांतिकारी भगत सिंह के बचपन की पहली झलक. अढ़ाई वर्ष की छोटी-सी उम्र में ही बंदूके बोने का बड़ा सपना देख रहा था. तब भगत सिंह के पिता और चाचा किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक दिन ये मासूम हिंदूस्तान का सबसे बड़ा क्रांतिकारी बनेगा. शायद बचपन में ही भगत के दिल-ओ-दिमाग पर आसपास के परिवेश और देश में अंग्रेज़ों के खिलाफ भड़क रही भावना से जुड़े घटनाक्रमों की गहरी छाप पड़ चुकी थी. परिवार में मौजूद देशभक्ति की भावना का असर भगत सिंह पर दिखने लगा था.
भागा का बचपन आम बच्चों से थोड़ा अलग रहा. उनकी शुरुआती चार साल की पढ़ाई अपने गांव बंगा चक्क नंबर 105 गुरैरा ब्रांच से हुई. जोकि फिलहाल लायलपुर, पाकिस्तान है. इस दौरान दादा अर्जुन सिंह ने ही पोते भागा की देखरेख की. आगे की पढ़ाई के लिए भागा को पिता के पास लाहौर जाना पड़ा. उन दिनों लाहौर में अंग्रेज़ों के खिलाफ माहौल था. 1916-17 में लाहौर में गदर पार्टी के शहीदों के कीर्तिमान गूंज रहे थे. इसी दौरान भगत सिंह ने अपने दादा अर्जन सिंह को पहला खत लिखा.
22 जुलाई, 1918 लाहौर
पूज्य बाबाजी,
नमस्ते.
अर्ज़ ये है कि आपका खत मिला. पढ़कर दिल खुश हुआ. इम्तिहान की बात ये हैं कि मैंने पहले इसलिए नहीं लिखा था क्योंकि हमें बताया नहीं गया था. अब हमें अग्रेजी और संस्कृत का नतीजा बताया गया है. उन सभी में पास हूं. मुझे संस्कृत में 150 में से 110 नम्बर और अंग्रेजी में 150 में से 68 नम्बर मिले हैं. जो विद्यार्थी 150 में से 50 नम्बर ले आए, उसे पास माना जाता है. मैं अच्छी तरह पास हो गया हूं.
आपका आज्ञाकारी,
भगत सिंह
इसे भगत सिंह का पहला खत माना जा सकता है. हालांकि इस खत में उनके क्रांतिकारी विचार नहीं थे. ये एक पोते का दादा के नाम खत था. लेकिन आगे चलकर भगत सिंह ने परिवार और साथियों को कई खत लिखे. जिनमें उनके क्रांतिकारी तेवर साफ देखने को मिलते हैं. खैर लाहौर में रहकर भगत सिंह पढ़ाई में व्यस्त थे और पिता आज़ादी के राष्ट्रीय आंदोलन में. इसका प्रभाव भगत के जीवन पर पड़ तो रहा था लेकिन एक चिंगारी का भड़कना अभी बाकी था और वो वक्त भी आ गया.
1918 में अहमदाबाद की मिलों में हड़ताल हुई और इस हड़ताल को जबरदस्त जनसमर्थन मिला. जिससे ब्रिटिश हुकूमत सतर्क हो गयी थी. 1919 की शुरुआत में रॉलेट एक्ट लाया गया. इस कानून का मकसद था. आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के नाम पर भारतीयों के नागरिक अधिकारों पर पाबंदी लगाना. इस कानून के खिलाफ पूरा देश एकजुट होने लगा. महात्मा गांधी ने सत्याग्रह सभा की स्थापना कर स्वाधीनता सेनानियों से गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करने की घोषणा की. सत्याग्रह की स्थापना और गांधी की अपील का असर हुआ और बड़ी सभाएं आयोजित होने लगीं. इतिहासकार मानते हैं कि 1919 के मार्च-अप्रैल महीने में आज़ादी के आंदोलन में जनता के राजनीतिक रूप से जागरूक और अंग्रेज़ों के के खिलाफ उठ खड़े होने का दौर था. जिससे हुकूमत आंदोलनों को दबाने पर उतारू हो गयी.
रॉलेट एक्ट के विरोध में पूरे देश में हड़ताल और विरोध प्रदर्शन हुए. लखनऊ, पटना, कलकत्ता बॉम्बे, कोटा और अहमदाबाद में विरोध-प्रदर्शनों को दबाने के लिए अंग्रेज़ों ने निहत्थे लोगों पर लाठियां और गोलियां बरसाई. आंदोलनकारियों को जेल में ठूंसा जाने लगा, गिरफ्तारियां होने लगीं. इसी बीच महात्मा गांधी ने 6 अप्रैल को राष्ट्रव्यापी हड़ताल की घोषणा कर दी. लोगों का उत्साह चरम पर पहुंचे चुका था. वो गुलामी की बेड़ियां तोड़ने के लिए बेचैन थे.
13 अप्रैल, 1919 जलियांवाला बाग, पंजाब
अंग्रेजों की दमनकारी नीति, रॉलेट एक्ट, क्रांतिकारी सत्यपाल और सैफुद्दीन की गिरफ्तारी के खिलाफ सभा का आयोजन किया गया. इस दौरान शहर में कर्फ्यू लगा था- कर्फ्यू के बावजूद हजारों लोग सभा में शामिल होने पहुँचे- कई लोग बैसाखी के मौके पर अपने परिवार के साथ मेला देखने निकले थे- जब अंग्रेज अधिकारियों ने जलियांवाला बाग पर जबरदस्त भीड़ देखी, तो वह बौखला गए- सभा में शामिल नेता भाषण दे रहे थे- इस विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर अपने 90 ब्रिटिश सैनिकों के साथ वहां पहुँचे- सभा में करीब 5000 लोग मौजूद थे- जनरल डायर ने जलियांवाला बाग चारों ओर से घेर लिया- कहा जाता है कि जनरल डायर ने सिपाहियों को गोलियां बरसाने का आदेश दे दिया- ब्रिटिश सिपाहियों ने महज 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाईं- गोलियों की आवाज़ से भगदड़ मच गयी- जलियांवाला बाग से बाहर निकलने के लिए बस एक संकरा रास्ता था- चारों तरफ मकान बने थे- भागने का कोई रास्ता न होने के कारण वहां लोग फंस गए और बच्चे, महिलाएं और बूढ़े गोलियों का निशाना बने- कुछ लोग गोलियों से बचने के लिए एक कुए में कुद गए- कुछ देर में कुआं भी लाशों से भर गया- इस नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए- अनगिनत घायल हुए- जनरल डायर के इस गुनाह को आज तक भूला नहीं जा सका है और न ही इस अपराध माफ किया जा सकता है- जलियांवाला बाग नरसंहार में बहे खून ने भारत के स्वाधीनता आंदोलन को एक नई दिशा दे दी.
जलियांवाला कांड की खबर 12 साल के भगत सिंह को भी लगी- वे इस घटना से इतना आहत थे कि वे घर से स्कूल जाने के लिए निकले और लाहौर से अमृतसर 12 मील पैदल चलते-चलते जलियाँवाला बाग पहुँचे गए- जलियांवाला बाग में पसरा सन्नाटा और दहशत को महसूस किया- वे उस ज़मीन पर बैठ गए जहां लाशें गिरी थी- फिर खून से भीगी मिट्टी को हाथों से छुआ- भगत सिंह की आंखे नम थी- उन्होंने छोटी-सी बोतल में जलियांवाला बाग की मिट्टी को उठा कर भर लिया- कुछ समय वहां बिताने के बाद घर की वापस चल पड़े- रास्ते भर भगत अंग्रेज़ों के खिलाफ न जाने क्या-क्या विचार मन में पालते रहे और देर रात अपने घर वापस लौटे- घर में आते ही वे चुपचाप अपने कमरे की ओर बढ़े- घर में बेसब्री से उनकी छोटी बहन अमरकौर इंतजार में बैठी थी-
अमरकौर- ( भगत सिंह टोकते हुए) वीरजी, आज आने में बहुत देर कर दी? कहां थे आप? मैं कब से इंतजार कर रही हूं-
(भगत सिंह खामोश, बहन की ओर देखते हैं)
अमरकौर - वीरजी, भंडारघर में आम पक गए हैं- हमने एक साथ खाने की बात की थी न, इसलिए आपके इंतजार में बैठी हूं- चलो जल्दी, मेरे मुंह में पानी आ रहा है- आपको तो आम बहुत पसंद हैं न?
भगत सिंह - (थोड़ा गुस्से में) तुमको खाना है तो खालो, मेरा इंतज़ार क्यों करना- अभी मेरा मन नही आम खाने का.
शाम से ही छोटी बहन अमरकौर भाई का इंतज़ार कर रही थी- वह जानती थीं कि भागा को आम बेहद पसंद हैं. वे इस उम्मीद से बैठी थी कि भाई आएगा और उसके साथ आम खाएगा. लेकिन भगत परेशान थे, चुपचाप कमरे में चले गए. अमर से रहा न गया उसने भाई के कमरे में झांका तो वे आंखे बंद कर कुर्सी पर बैठा था. चेहरे पर मायूसी और दुख झलक रहा था.
अमरकौर- (आगे बढ़कर, सिर पर हाथ रखा) क्या बात है वीरजी? तबीयत तो ठीक है? किसी ने कुछ कहा है क्या?
भगत सिंह - (शांत भाव से) नहीं, ऐसी कोई बात नहीं,अमरो.
अमरकौर - तो इतने दुखी क्यों हो? सच-सच बोल भागा, बात क्या है?
भगत सिंह- तू नहीं समझेगी, इस बात को समझने के लिए बहुत छोटी है तू.
अमरकौर - (प्यार से) वीरजी, अब तक हमने सारी बातें साझा की है, फिर कौन-सी बात है जो मैं न समझूंगी? वीरजी बता तो- इत्ता दुखी क्यों है?
भगत सिंह - तू जिद्द कर रही है तो सुन, लेकिन याद रख किसी को कुछ कहना नहीं. बेबो को तो इस बारे में कुछ नहीं बोलेगी.
अमरकौर- न बिल्कुल नहीं. विश्वास कर भागा... मैं किसी को नहीं बताऊंगी.
भगत सिंह - (थोड़ा रुककर) जानती है, आज मैं स्कूल नहीं गया था.
अमरकौर- (हैरानी से) क्या, तो तुम दिन भर कहां थे? इतनी देर से घर क्यों आए?
भगत सिंह - अपने एक यारा संग अमृतसर चला गया था.
अमरकौर - अमृतसर! दरबार साहब के दर्शन करने? तो बताया क्यों नहीं?
भगत सिंह- नहीं नहीं.. अमृतसर में दरबार साहब के दर्शन करने नहीं, मौत का भयानक मंजर देखने गया था.
छोटी-सी अमरकौर को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन वो ध्यान से भगत की बातें सुन रही थी.
भगत सिंह - चारों ओ मायूसी थी. वहां मौजूद हर घर पर मातम था. ऐसा लग रहा था जैसे मौत ने तांडव किया हो.
बोलते-बोलते भगत ने अपनी जेब से एक शीशी निकाली और अमरकौर को दिखायी.
भगत सिंह- देख इसे, जानती है, क्या है ये?
अमरकौर- (मुस्कुरा कर) अरे दवात है स्याही वाली.
भगत सिंह- अरे पगली अमरो- इसे खोलकर देख.
अमरकौर- (दवात खोल कर देखी तो हैरान होकर पूछा) क्या भरा है इसमें?
भगत सिंह - मिट्टी है, खून से सनी- लाल मिट्टी.
अमरकौर - (चौंक गयी) किसके खून से सनी? कहां से लाए हो ये लाल खूनी मिट्टी.
भगत सिंह- तूने सुना है न? अमृतसर के जलियांवाला बाग में गोरों ने निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसायी हैं. कितने बच्चे, बूढ़े और महिलाओं का खून गिरा है वहां. उन्हीं के खून से वहां की मिट्टी लाल हो गई. वही मिट्टी है अमरो.
अमरकौर- उफ, भागा तू ये यह सब देखने गया था?
भगत सिंह- हां, मैं उस दिन जो हुआ, उसी नरसंहार की भीषण यातनाओं की पीड़ा महसूस करने गया था.
अमरकौर- (सांत्वना देते हुए) भागा, चाचा अजीत होते न तो अंग्रेज़ों को मार-मार कर भगा देते.
भगत सिंह- तू ठीक बोल रही है अमरो. तू देख लेना एक दिन मैं भी चाचा जैसा बनूंगा और अत्याचारी गोरों को सबक सीखाऊंगा.
ये बोलते हुए भगत ने अपने हाथ में पकड़ी दवात को दीवार में बने एक आला में रख दिया.
भगत सिंह- अमरो जा कर थोड़े फूल ले आ.
अमरो भागी-भागी गयी और फूल ले आयी.
अमरो- ले वीरजी, फूल.
दोनों भाई-बहन ने शहीदों की मिट्टी पर फूल चढ़ाए और हाथ जोड़कर नमन किया.
भगत सिंह- (धीरे से) मुझे इस मिट्टी की कसम! जलियांवाला में हुई मौतों का बदला जरूर लूंगा.
भगत सिंह ने मन ही मन प्रण कर लिया था कि वे उन हत्यारे गोरे अधिकारियों से निर्दोष लोगों के खून का बदला लेंगे. देश को गुलाम बनाने वालों का खात्मा कर अपने मुल्क को आज़ाद करवाएंगे.
ट्रेन अपनी रफ्तार पर चल रही थी और भगत आंखें बंद कर एक-एक घटना का याद कर रहे थे.
***
पुस्तक 'कुर्बानीः एक क्रांतिकारी की कहानी' के लेखक हैं फ्रेंकलिन निगम. सर्वभाषा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में कुल 88 पृष्ठ हैं और इसका मूल्य 250 रुपए है.
जय प्रकाश पाण्डेय