गई दुनिया नई दुनिया: आपदा से जूझने का बल देती रचनाएं

अशोक चक्रधर ने अपने नए कविता संग्रह 'गई दुनिया नई दुनिया' से कोरोना से जूझ रहे इनसानी जीवन में अलख जगाई है और इस व्‍याधि से मनुष्यता को बचाने के कुछ सूत्र दिए हैं.

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अशोक चक्रधर के नए काव्य संकलन का कवर अशोक चक्रधर के नए काव्य संकलन का कवर

ओम निश्चल

  • नई दिल्ली,
  • 06 सितंबर 2020,
  • अपडेटेड 3:09 PM IST

कोरोना की व्या‍धि से इन दिनों पूरी दुनिया त्रस्त है, जिसमें भारत सर्वोच्च स्थान पर है. पर इस सबसे बड़ी वैश्विक महामारी के बीच भी लेखक अपना सर्जनात्मक कोना खोज ही लेता है. अशोक चक्रधर व्यंग्य और हास्य के प्रखर कवि हैं. न जीवन में और न कभी रचनात्मक लेखन में उन्होंने हताशा का वरण किया. इसलिए घोर निराशा और महामारी के इस माहौल में उन्होंने अपनी कविताओं से लोगों को जीने की राह सुझाई है. हाल ही में प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित अपने कविता संग्रह 'गई दुनिया नई दुनिया' से उन्होंने जीवन में अलख जगाई है और इस व्‍याधि से मनुष्यता को बचाने के कुछ सूत्र दिए हैं. जैसा कि उनका लहजा व्यंग्यात्मक है, उन्होंने इन कविताओं में भी अपना स्थायी मिजाज ओझल नहीं रहने दिया है पर हर कविता जैसे किसी न किसी हेतु किसी न किसी प्रयोजन से संबद्ध है और वह जिस बिन्दु पर आकर खत्म होती है, किसी न किसी संदेश या प्रतिकथन में बदल जाती है. सच कहें तो आपदा प्रबंधन की ये कविताएं जन जागृति की कविताएं हैं.

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काव्यशास्त्रियों के अनुसार, कविता के कुछ हेतु और प्रयोजन होते हैं. कोई भी कविता बिना अपने हेतु और प्रयोजन की सार्थक नहीं हो सकती. इस दृष्टि से अशोक चक्रधर की कविताएं बृहत्तर सामाजिक और मानवीय उद्देश्यों से जुड़ती हैं. भले ही इनका लहजा हास्‍य व व्‍यंग्‍य का हो. जहां तक कविता में अंदाजेबयां का सवाल है चक्रधर ने अपनी व्यंग्य और विट शैली का बेहतरीन प्रयोग किया है, किन्तु कविताएं अपनी सिद्धि में अद्वितीय हैं. मुक्तिबोध के समीक्षक के रूप में चक्रधर ने कविता की प्रयोजनीयता को सदैव अपनी दृष्टि में रखा है तथा बेहतरीन अर्थ की प्राप्ति के लिए मुक्तिबोध जिस तरह बेहतरीन और सार्थक तुकों को व्यवहार में लाते थे चक्रधर भी उसे अपनी कविताओं में सहेजते हैं. इस गुण में चक्रधर के आशुकवित्व ने भी बेहतरीन सहयोग दिया है. कविताओं में प्रत्युत्पन्नमति, संस्कृति के चार अध्याय के जरिए श्यामलाल एंड संस के आपदा वृत्तांत को एक किस्सागोई में बदलने में कामयाबी पाई है. संस्कृति के चार अध्याय के अलावा प्रयाण गीत, नन्हीं सचाई, मैं नागरिक, दशरथ माझी और दाना माझी, नोम तोम का ताजमहल, माई री माई एफडीआई, टीन और कोरंटीन, बाप रे बाप रे बाप रे, यहीं बजना है जीवन संगीत, दुनिया नई बनानी है -आदि कई कविताओं का कथ्य किस्सागोई के अंदाज में हैं जिन्हें पढ़ते हुए आपके भू-गर्भीय हिस्से में हलचल हो सकती हैं; बत्तीसी मुक्त भाव से मुक्त थियेटर के अंदाज में परिणत हो सकती है.

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कविता यदि आत्मा के उपचार की औषधि है तो यह दैहिक उपचार की भी औषधि है. एक स्वस्थ मन ही स्वस्थ‍ तन का नियामक हो सकता है. कोराना के साथ जीने ही जीवन शैली बताती हुई अनेक कविताएं यहां हैं. दशरथ माझी ने पत्नी के उपचार के लिए अस्पताल जाने आने के लिए पहाड़ को काट कर रास्ता बनाने का असंभव कार्य किया था, चक्रधर की कविता दशरथ माझी के साहस की दास्तान है. 'सबकी है ये धरती' शिक्षाप्रद कविता है. सीख देती है संकट से निबटने की. 'नोम तोम का ताजमहल' कविता का तो कहना ही क्या. गाइड नोम तोम की भाषा में पूरे ताजमहल के इतिहास ओर अतीत को पुरलुत्फ अंदाज में बयां कर देना आसान नहीं है. वे ऐसा करते हैं कि पूरी ताजमहल की तस्वीर सामने घूम जाती है हम बिना गए ताजमहल की सैर पर निकल जाते हैं. निगमबोध से लेकर अनन्य जीवन बोध तक के अहसास को कवि ने अपने सधे काव्यात्मक लहजे में सामने रखा है .

इन कविताओं में मजदूरों की कठिन जीवन नियति पर सहानुभूति और समानुभूति का दर्शन दिखता है तो प्रकृति पर होने वाले मानवीय अन्याय की भर्त्सना भी कवि ने खुले मन से की है. वह कहता है: प्रकृति नहीं सहती है कोई अन्याय/ अति हो जाती है तो आता है नया अध्याय. इनमें ओज है माधुर्य है, प्रबोधन है, वीर तुम बढ़े चलो वाला भाव है, एक पांव रखता हूँ कि सौ राहें फूटती वाली मुक्तिबोध की बेचैनी है तो भीतर सुसुप्त चेतना को झकझोर कर मनुष्य को जगाने का सतत आवाहन भी है.

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अशोक चक्रधर इस पुस्तक की प्रस्तावना में कहते हैं, 'यह कोरोना संक्रमण काल है, आगे चल कर इसे पूर्व कोरोना काल व उत्तर कोरोना काल कहा जाएगा...आज लड़ाई एक अदना वायरस से है, जब आदमी सन्न है और प्रकृति प्रसन्न है. यह कोरोना सभ्यता का दौर है. लोग पहले तो घर में कैद होने पर छटपटाते थे अब पिंजरे के तोते की तरह कैद रहने में ही भलाई समझने लगे हैं.' चक्रधर ऐसे घर कैदियों के लिए ही जीवन संदेश देते हैं. दिवंगत चित्रकार मित्र मिकी पटेल के मजाहिया रेखांकनों से सजी यह पुस्तक संकट काल में राहत देने वाली संवेदना से लैस है. यों भी अशोक चक्रधर जहां हो वहां विषाणुओं के लिए उनकी वाणी लोबान सा काम करती है. वे खुद सत्तर के आसपास हैं पर जीवनी शक्ति युवाओं जैसी. संस-कृति के चार अध्याय, श्यामलाल एंड संस के कारनामों की कहानी है बहुत ही रोचक व दिलचस्प. इसे पढ़ते हुए ज्ञान चतुर्वेदी के व्यंग्य आख्यान हम न मरब की कहानी याद हो आती है. श्यामलाल कैसे कोरोना संकट से बच कर वापस आते हैं इसकी एक साहसिक और लोमहर्षक दास्तान लिखी है अशोक चक्रधर ने. यह एक उपन्यासिका की पीठिका भी हो सकती है.

'नन्हीं सचाई' बहुत करुण कविता है, जिसमें बच्ची के भोलेपन को चक्र्धर ने बारीकी से पकड़ा है. यह दूसरे लॉकडाउन के बाद आपदा प्रबंधन की बेहतरीन कविता है. क्रमश: क्या करना क्या नहीं करना. बातरतीब उपचार की कविता है. हम कह सकते हैं कि कविता यदि आत्मा के उपचार की औषधि है तो यह कविता दैहिक उपचार की औषधि है. कोराना के साथ जीने ही जीवन शैली बताती हुई अनेक कविताएं यहां हैं. स्विस बैंक काला धन का आगार है. लोग कहते है 'स्विस कल्याणी की एक बंदिश' इसी धारणा का गौरवगान है.

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अशोक चक्रधर के पोर-पोर में हास्य भरा है, विट भरा है, हाजिरजवाबी भरी है. पर वे सदैव हँसते ही नहीं रोते और रुलाते भी हैं. भाभी के जन्मदिन पर बहुत कारुणिक कविता लिखी हैं उन्होंने यहां तो 'दुख सुख का मीत है' लिख कर दुख ओर सुख दोनों संगी साथियों की सदियों की मैत्री पर मुहर भी लगाई है. 'बाप रे बाप रे बाप रे' तो कितनी सधी हुई गजल की तरह है. हास्य के रैपर में पर के माध्यम से जीवन और समय की सचाई बयान की है चक्रधर ने. निगमबोध से लेकर अनन्य जीवन बोध तक के अहसास को चक्रधर ने काव्यात्मक लहजे में सामने रखा है. अंत में जिस कविता में मेरा ध्यान अंटका वह कितनी मासूम सी है-
गोदाम भरे पड़े हैं
लोग बाहर भी मरे पड़े हैं
सफाईकर्मी लाशों को कूडे की तरह ढो रहा है
हे भगवान ये क्या हो रहा है
भगवान बड़ी मुश्किल से अपने अधर खोले
और कराहते हुए बोले यह दृश्य मेरी फिल्म से निकाल दो
फिलहाल दो बूंद गंगाजल मेरे मुंह में भी डाल दो

मुझे याद है मारीशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर यहां के मोर और मारीशस के राष्ट्रीय पक्षी डोडो को लेकर जो लालित्यपूर्ण गीत उन्होंने लिखा था वह अद्भुत सांस्कृतिक समरसता और दोनों देशों की आत्मीयता का प्रतीक बन गया. उसके बोल थे- भारत का है मोर और है मारीशस की डोडो/ आ गई आ गई, सतरंगी माटी से आ गई डोडो. इसी क्रम भोपाल से मारीशस नामक पुस्तक के अंत में शामिल संकल्प गीत की ये पंक्तियां अशोक चक्रधर के दृढ़निश्चयी शख्‍सियत की परिचायक हैं-
मंजिल हो जाय परास्त  
गतिमान प्रगति का चक्का हो
अनकिया सभी पूरा हो, यदि
संकल्प हमारा पक्का हो.

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अशोक चक्रधर मुक्तिबोध के अध्येता रहे हैं. उनकी कविताई व समीक्षाई पर दो पुस्तकें लिखी हैं. कविता का मर्म और धर्म वे बखूबी समझते हैं. अपनी भूमिका में उन्होंने मुझे पुकारती हुई पुकार कहीं खो गयी- का जिक्र किया है. इस पुकार की प्रतिध्वनि इन कविताओं में सुन पड़ती है.

हाल ही में जब इस पुस्तक का लोकार्पण हुआ तो एक चर्चा भी हुई, जिसमें देश के शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने इन कविताओं के जरिए अशोक चक्रधर के कवि धर्म की सराहना की तथा कहा कि ऐसे ही रचनात्मतक उपक्रमों से हम बड़ी से बड़ी मानवीय व्याधियों से लड़ते हुए हौसला बनाए रख सकते हैं. निशंक ने गई दुनिया नई दुनिया के बहाने डॉ अशोक चक्रधर की कविताई की प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि आज के गंभीर वातावरण में भी अशोक चक्रधर ने कविता को जन जागरण से जोड़ते हुए सरकार के आपदा प्रबंधन की दिशा में किए जा रहे प्रयत्नों को रचनात्मक दिशा दी है, यह उनकी विशेषता है. कथाकार ममता कालिया ने अशोक चक्रधर के कविता संसार को मनुष्य के लिए प्रेरक बताया और कहा कि अशोक ने सदैव कविताओं में उस मानवीय पक्ष को ओझल नहीं रहने दिया है जिसे प्राय: हास्य-व्यंग्य की धारा के कवि भूल जाते रहे हैं. पत्रकार व लेखक अनंत विजय ने कहा कि अशोक चक्रधर जिस हास्य व व्यंग्य के लिए जाने जाते हैं, उसके आलोक में कभी लगा ही नहीं कि यह शख्स कविताओं में इतनी मानवीय दृष्टि का वाहक हो सकता है. उन्होंने कहा कि इससे पूर्व तक उन्होंने अशोक चक्र्धर को इस संजीदगी से नहीं पढ़ा था पर ये कविताएं एक नया द्वार खोलती हैं. ये कविताएं गंभीरता का कवच ओढ़े असंतोष उगलती दुनिया में आशा और उम्मीद का संदेश देती हैं तथा बताती हैं कि जनता तक पहुचने के लिए कविता को किस सरलता और सहजता से रचा जाना चाहिए. अशोक चक्रधर इस दौर को तीसरे विश्वयुद्ध की संज्ञा देते हैं. उन्होंने कहा कि मैंने कलम को इंसान की रक्षा में कोरोना के खिलाफ डंडा बनाया है. मनुष्य वही जो मनुष्य के मन को जाने, पराई पीर पहचाने. ग़ज़लगो रंजन निगम ने भी इन कविताओं के वैशिष्ट्य का बखान किया और इन्हें  मनुष्य हित में जरूरी माना.

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इस तरह, 'गई दुनिया नई दुनिया' मानवीय आपदा के इस दौर में नई रचनात्मकता का प्रस्तावन कही जा सकती है.

# समीक्षक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी कवि समालोचक एवं भाषाविद हैं.
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पुस्तक: गई दुनिया, नई दुनिया: आपदा प्रबंधन की कविताएं
रचनाकार: अशोक चक्रधर
विधाः कविता
भाषाः हिंदी
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन, मुंबई
पृष्ठ संख्याः 200
मूल्यः 400 रुपए.

 

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