नदी का कोई रंग नहीं होता. नदी बहना जानती है. समय से परे अनंत काल से बहती है नदी. नदी खामोश गवाह है. वो सब कुछ देखती है. प्रतिकार नहीं करती. फिर भी बहती रहती है निःशब्द और अपार. नदी की यही गाथा जब शब्दों में ढलती है, तो जामुनी नदी की व्यथा कथा सामने आती है.
मालिनी गौतम अंग्रेजी की प्रोफेसर हैं. नदी के इस बहाव का दर्द उन्होंने हिंदी में बयान किया है. नदी कभी स्त्री का रूप लेती है, तो कभी लड़की का. हर नदी एक कहानी है जिसकी कल कल बहती लहरों में आप कोई भी रंग तलाश सकते हैं. ये रंग कभी धोखे का है कभी दरकते रिश्तों का, लेकिन नदी का बहाव साबित करता है कि सबसे चटख रंग प्यार का है. मालिनी की कविताएं भी प्यार की दास्तां बयां करती है.
प्यार का यही रंग कभी जामुनी नदी की तरह निखरता है, तो कभी छतरी बन कर ये एहसास दिलाता है कि परिवार के लिए स्त्रियां किस तरह धुरी बन जाती हैं. हर स्त्री के अंदर सुख और दुःख की एक नदी बहती है. ये संग्रह ऐसी ही कई नदियों का संगम है.
इसमें छोटे-छोटे दुःख हैं छोटे-छोटे सुख, लेकिन आखिर में उम्मीद का रंग सबसे चटख और गाढ़ा है. ठीक उस गौरैया की तरह जो एक टुकड़ा धूप के इंतज़ार में न जाने कब से घर के अहाते में बैठी है. अमलतास के पीले सुर्ख़ फूलों का यौवन है तो इश्क के सूखे पत्तों की दास्तां भी उसी शिद्दत से हैं.बरसात में कदमों के निशान तलाशने की जिद है.
हर कविता अपने समय का संक्षिप्त दस्तावेज है और इस लिहाज से मालिनी अपनी बात कहने में कामयाब रही हैं. मालिनी की ये कविताएं इस दृष्टि से सार्थक हैं कि यहां कहीं शब्दों का आडंबर नहीं. ये कविताएं नदी की तरह बहती हैं, जो पढ़ते-पढ़ते कब आपके मन को नम कर दें पता भी नहीं चलता.
किताब का नाम: एक नदी जामुनी सी
प्रकृति: कविता संग्रह
कवियित्री: मालिनी गौतम
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन
मूल्य: 100 रुपये
अंजलि कर्मकार