पुण्यतिथि विशेषः फणीश्वरनाथ रेणु, जिनकी कृतियों में जी उठते थे पात्र, सज जाते थे गांव-जवार

हिंदी साहित्य में गांवगिरांव की बात हो तो मुंशी प्रेमचंद के बाद सहज ही जिस कथाकार का नाम ध्यान आता है वह हैं, फणीश्‍वरनाथ रेणु. आज उनकी पुण्यतिथि पर साहित्य आजतक की ओर से नमन.

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फणीश्वरनाथ रेणु फणीश्वरनाथ रेणु

जय प्रकाश पाण्डेय

  • नई दिल्ली,
  • 11 अप्रैल 2019,
  • अपडेटेड 10:32 AM IST

हिंदी साहित्य में गांवगिरांव की बात हो तो मुंशी प्रेमचंद के बाद सहज ही जिस कथाकार का नाम ध्यान आता है वह हैं, फणीश्‍वरनाथ रेणु. वह भारतीय जनमानस के एक अद्भुत चितेरे थे. उनकी रचनाएं शब्दचित्र सरीखी होती थीं. इसीलिए रेणु को भारतीय साहित्य जगत में एक बेहद सम्मानित स्थान हासिल है. आज रेणु की पुण्यतिथि है.

फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च, 1921 को बिहार के अररिया जिले के फॉरबिसगंज के निकट औराही हिंगना ग्राम में हुआ था. उस समय यह पूर्णिया जिले का हिस्सा था. रेणु जी की प्रारंभिक शिक्षा फॉरबिसगंज तथा अररिया में हुई. उसके बाद वह नेपाल चले गए. वहां कोईराला परिवार के साथ रहकर विराटनगर के विराटनगर आदर्श विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास की. बाद में उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े विद्यालय से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की और 1942 में गांधी जी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े.

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भारत-छोड़ो आंदोलन में रेणु की शिरकत ने उनमें सियासत की समझ जगाई. इसी दौरान वह सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए व राजनीति में सक्रिय भागीदारी निभाई. कहा जाता है कि वह साल 1950 में नेपाल की दमनकारी रणसत्ता के विरूद्ध सशस्त्र क्रांति के सूत्रधार थे, जिसके परिणामस्वरुप नेपाल में जनतंत्र की स्थापना हुई. रेणु के जीवन में साहित्य व सियासत दोनों साथसाथ चलते रहे. रेणु जी ने आजीवन शोषण और दमन के विरूद्ध संघर्ष किया.

फणीश्वरनाथ रेणु ने 1936 के आसपास से कहानी लेखन की शुरुआत की थी. उस समय उनकी कुछ कहानियां प्रकाशित भी हुईं, किंतु वे किशोर रेणु की अपरिपक्व कहानियां थीं. 1942 के आंदोलन में गिरफ़्तार होने के बाद जब वे 1944 में जेल से मुक्त हुए, तब घर लौटने पर उन्होंने 'बटबाबा' नामक पहली परिपक्व कहानी लिखी. 'बटबाबा' 'साप्ताहिक विश्वमित्र' के 27 अगस्त, 1944 के अंक में प्रकाशित हुई, रेणु की दूसरी कहानी 'पहलवान की ढोलक' 11 दिसम्बर, 1944 को 'साप्ताहिक विश्वमित्र' में ही छपी थी.

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साल 1954 में उनकी महान कृति 'मैला आँचल' प्रकाशित हुआ. रेणु को जितनी ख्याति अपने उपन्यास 'मैला आँचल' से मिली, उसकी मिसाल हिंदी साहित्य में मिलना दुर्लभ है. इस उपन्यास के प्रकाशन ने उन्हें रातो-रात हिंदी के एक बड़े कथाकार के रूप में स्थापित कर दिया. कुछ आलोचकों ने इसे 'गोदान' के बाद इसे हिंदी का दूसरा सर्वश्रेष्ठ उपन्यास करार दिया. हालांकि 'मैला आँचल' ने विवाद भी कम नहीं खड़े किए. रेणु से जलने वालों ने इसे सतीनाथ भादुरी के बंगला उपन्यास 'धोधाई चरित मानस' की नक़ल बताया, पर 'परती परिकथा' के शिल्प ने यह स्थापित कर दिया की रेणु क्या हैं? समय के साथ इस तरह के झूठे आरोप समाप्त हो गए.  

1972 में रेणु ने अपनी अंतिम कहानी 'भित्तिचित्र की मयूरी' लिखी. उनकी अब तक उपलब्ध कहानियों की संख्या 63 है. 'रेणु' को जितनी प्रसिद्धि उपन्यासों से मिली, उतनी ही प्रसिद्धि उनको उनकी कहानियों से भी मिली. 'ठुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की महक', 'एक श्रावणी दोपहरी की धूप', 'अच्छे आदमी', 'सम्पूर्ण कहानियां', आदि उनके प्रसिद्ध कहानी संग्रह हैं. 'मारे गए गुलफाम' उर्फ तीसरी कसम का तो कहना ही क्या?

कथा-साहित्य के अलावा रेणु ने संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ताज आदि विधाओं में भी लिखा. उनकी चर्चित रचनाओं में - 'मैला आंचल', 'परती परिकथा', 'जूलूस', 'दीर्घतपा', 'कितने चौराहे', 'पलटू बाबू रोड'; कथा-संग्रह- 'एक आदिम रात्रि की महक', 'ठुमरी', 'अग्निखोर', 'अच्छे आदमी', रिपोर्ताज- 'ऋणजल-धनजल', 'नेपाली क्रांतिकथा', 'वनतुलसी की गंध', 'श्रुत अश्रुत पूर्व' आदि शामिल हैं. 'समय की शिला पर', 'आत्म परिचय' उनके संस्मरण हैं.

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इसके अतिरिक्त रेणु जी 'दिनमान पत्रिका' में रिपोर्ताज भी लिखते थे. 'नेपाली क्रांति कथा' उनके रिपोर्ताज का उत्तम उदाहरण है. जिन कहानियों ने शोहरत के कीर्तिमान बनाए उनमें 'मारे गये गुलफाम' उर्फ तीसरी कसम', 'एक आदिम रात्रि की महक', 'लाल पान की बेगम', 'पंचलाइट', 'तबे एकला चलो रे', 'ठेस', 'संवदिया' आदि शामिल हैं.

रेणु के रचनाकर्म की खासियत यह थी कि उनकी लेखन-शैली वर्णनात्मक थी. इसीलिए इनके कथानकों के पात्र और पृष्ठभूमि दोनों चलचित्र का सा प्रभाव छोड़ते. उनकी रचनाओं में आंचलिकता का चित्र कुछ ऐसे खिंचा होता था, कि आप बिना उस अंचल में गए उसकी कल्पना कर सकते हैं. इनकी लगभग हर कहानी में पात्रों की सोच घटनाओं से प्रधान होती थी.

रेणु जी ने जयप्रकाश नारायण आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और सत्ता द्वारा दमन के विरोध में पद्मश्री का त्याग कर दिया.  रेणुजी ने हिंदी में आंचलिक कथा का विस्तार किया, जिसकी नींव मुंशी प्रेमचंद ने रखी थी. सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' जैसे स्थापित रचनाकारों की मित्रता के अलावा वह उस दौर में पटना के उदीयमान फोटोपत्रकार एस. अतिबल के भी मित्रवत थे. हिंदी साहित्य में आंचलिकता के इस अनूठे चितेरे ने 11 अप्रैल, 1977 को पटना में अंतिम सांस ली. साहित्य आजतक की ओर से नमन!

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