महाप्रयाणः डॉ नरेंद्र कोहली, चिरंतन समय के भाष्यकार की याद को नमन

नरेंद्र कोहली ने लेखन का प्रांरभ में यथार्थवादी उपन्यासों से किया था, किन्तु थोड़े ही दिनों बाद उन्हें लगा कि भारतीय वांडमय में इतना कुछ है, जिसे सरल भाषा में पाठकों के समक्ष नहीं रखा गया है. अब जब वे नहीं हैं, तो उनके लेखन कर्म की याद

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साहित्य आजतक के दौरान डॉ नरेंद्र कोहली, स्मृति शेष साहित्य आजतक के दौरान डॉ नरेंद्र कोहली, स्मृति शेष

ओम निश्चल

  • नई दिल्ली,
  • 17 अप्रैल 2021,
  • अपडेटेड 10:33 PM IST

कोरोना समय ने हमारे समय के अनेक लेखकों कवियों को असमय अपनी गिरफ्त में लिया है. इनमें मंगलेश डबराल, राजीव कटारा सहित हमारे समय के जाने माने उपन्यासकार, व्यंग्यकार, नाटककार, कथाकार नरेंद्र कोहली का नाम भी जुड़ गया है जिन्होंने गए छह दशकों से हिंदी साहित्य को अपने विपुल उपन्यासों, कहानियों, व्यंग्य रचनाओं से समृद्ध किया है. वे पिछले हफ्ते कोरोना के संक्रमण में आए थे तथा अस्‍पताल में वेंटीलेटर पर उपचार के अधीन थे. उनके जाने से भारतीय वांड्मय और पुराख्या‍नों का औपन्यासिक आख्यान रचने वाला एक बड़ा लेखक हमारे बीच से विदा हो गया है. यह हिंदी साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति है.  

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आज से कोई चार दशक पहले का समय था जब उन्होंने पुराख्यानों को सीरीजबद्ध कर लिखना शुरू किया तथा रामकथा के तमाम आयामों को अनेक खंडों में समेटा और राम कथा के पाठकों को एक अलग अनूठे पाठकीय आस्वाद से जोड़ा. इसी तरह महाभारत की कथा सदियों से कही-सुनी जाती रही है, उस पर टीवी पर सीरियल भी बन चुका था तथापि महाभारत को अनेक खंडों में उपन्यासों में ढाल कर नरेंद्र कोहली ने यह सिद्ध किया कि रामकथा हो या महाभारत या अन्य पौराणिक प्रसंग- लेखक में कल्पना और तर्क का विनियोग हो, तो सर्वथा एक नयी कृति सृजित हो जाती है.

यही हाल विवेकानंद की जीवन गाथा को लेकर हुआ, जब विवेकानंद पर उनकी उपन्यास सीरीज का पहला खंड 'तोड़ो कारा तोड़ो' का प्रकाशन हुआ. इसके साथ ही जैसे एक नए विवेकानंद का जन्म हमारे बीच हुआ. पहला खंड पढ़ते ही पाठकों की मांग होती कि इसका दूसरा खंड कब तक आ रहा है. इस तरह उनके बहुआयामी उपन्यासों के अनेक खंड आते गए और पाठक उनकी किस्सागोई में रमते गए. इस तरह नरेंद्र कोहली उपन्यासों के कथ्य की खोज के लिए किसी बाहर से जुटाए घटना प्रसंग या आख्यान में नहीं गए बल्कि अपनी संस्कृति में रचे बसे आख्यान कहानियों और चरित्रों के इर्दगिर्द अपनी किस्सागोई का तानाबाना बुना और उत्तरोत्तर प्रसिद्धि के शिखर पर चढ़ते गए.

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स्यालकोट पाकिस्तान में 1940 में जन्मे नरेंद्र कोहली का परिवार भारत विभाजन के साथ ही वहां से भारत आकर जमशेदपुर बस गया था, जहां उन्होंने प्रारंभिक तालीम से लेकर स्ना्तक तक की शिक्षा हासिल की. बाद में उन्होंने दिल्ली विश्वयविद्यालय से पीएचडी की उपाधि हासिल की तथा इसी विश्वविद्यालय के एक कालेज में अध्यापन से जुड़ गए. 1995 में जब वे कथालेखन की दुनिया में पूरी तौर पर रम चुके थे और प्रतिष्ठित हो चुके थे, उन्होंने पूर्णकालिक लेखन के लिए कालेज से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली तथा पूर्णत: साहित्यक सृजन में रम गए. कोहली जी ने प्रांरभ में यथार्थवादी उपन्यासों से शुरुआत अवश्य की किन्तु थोड़े ही दिनों बाद उन्हें लगा कि भारतीय वांडमय में इतना कुछ है, जिसे सरल भाषा में पाठकों के समक्ष नहीं रखा गया है. लिहाजा कोहली ने सर्वप्रथम राम कथा को अपनी औपन्यासिकता का हिस्सा बनाया तथा उस पर विस्तार से लिखना शुरू किया. अनेक भाषाओं में रामकथा उपलब्ध होने के बावजूद उनके उपन्यासों के प्रकाशन के साथ ही उनकी किस्सागोई के प्रति एक पाठकीय उन्माद भी पैदा होना शुरू हुआ. लोग उपन्यासों में 'कोहली कल्ट' के वशीभूत होते गए और एक-एक कर आते उनके सभी खंड पाठकों के लिए एक सांस्कृतिक धरोहर बनते गए.

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व्यंग्य में अनूठापन
कोहली का एक अन्य वरेण्य रूप एक सफल व्यंग्यकार का रहा है. उन्होंने व्यंग्य लेखन में भी अनेक शैलियां आजमाईं तथा चोटी के व्यंग्यकारों के बीच अपनी जगह बनाई.  इस विधा में भी उनकी डेढ़ दर्जन से ज्यादा कृतियां हैं यथा- एक और लाल तिकोन, जगाने का अपराध, आधुनिक लड़की की पीड़ा, त्रासदियां, परेशानियां, गणतंत्र का गणित, आत्मा की पवित्रता, देश के शुभचिंतक, त्राहि त्राहि, इश्क एक शहर का आदि. मेरी श्रेष्ठ व्यंग्‍य रचनाएं नेशनल पब्लिशिंग हाउस एवं मेरी इक्वायन व्यंग्य रचनाएं शीर्षक व्यंग्य चयन अभिरूचि प्रकाशन से आया. नाटक लेखन पिछले दिनों में बहुत लोकप्रिय नहीं रहा. यही कारण है कि बहुधा विदेशी नाटकों के हिंदी रूपांतर ही मंचों पर खेले जाते रहे हैं. हिंदी नाटक विधा में इस अभाव की पूर्ति के लिए भी वे आगे आए तथा कई नाटकों- शम्बूक की हत्या, हत्यारे, गारे की दीवार, निर्णय रूका हुआ, किष्किंधा, अगस्त्‍य कथा आदि का सृजन किया.

यह बात गौरतलब है कि जिस पुरा आख्यानों ने उनके उपन्यासों में केंद्रीयता अर्जित की वह उनके अनेक नाटकों में भी छन कर सामने आई. मिथकों और पुरा आख्या‍नों का वे जैसे पुनराविष्कार कर रहे थे और इस बहाने हमारे समय की धड़कन को भी व्यक्त कर रहे थे. उन्‍होंने बच्‍चों के लिए भी कई रचनाएं लिखीं.

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विचारधारा से मुक्त स्वतंत्र वैचारिकी
यों उन्हें विचारधारा की दृष्टि से हिंदुत्ववादी लेखक और संघ संस्कृति के निकट का लेखक माना समझा जाता रहा है तथा भारतीय सांस्कृतिक आख्यानों के पुनर्रचयिता के रूप में भी वे जाने गए तथापि, लेखन की दुनिया में वे किसी फैशन या विचारधारा से नहीं बँधे तथा जो चाहा वह लिखा. पाठक, पुरस्कार, पद और प्रतिष्ठा को तरजीह न देकर उन्होंने स्वांत: सुखाय को ज्यादा अहमियत दी. उन्होंने जो भी लिखा, अपने रस के लिए लिखा. हिंदी अकादमी का शलाका सम्मान, केके बिडला फाउंडेशन का व्यास सम्मान व हिंदी संस्थान उत्तर प्रदेश का साहित्य भूषण जैसे कुछ बड़े सम्मान उनके खाते में अवश्य आए तथा 2017 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री से भी नवाजा पर भारतीय सांस्कृतिक जड़ों, मिथकों, आख्यानों से जुड़े उन जैसे लेखक को उनके कद के बराबर के ऊंचे दर्जे के साहित्यिक पुरस्कार नहीं मिले. न साहित्य अकादेमी, न मूर्तिदेवी, न भारत भारती, जबकि वे इन सभी पुरस्कारों के न केवल हकदार रहे, बल्कि कई पुरस्कार विजेताओं से हर तरह से बेहहतर थे. यों तो उनके लेखन का परिमाण और उसकी सांस्कृतिक आभा इतनी उदात्त रही है कि उसे किसी पुरस्कार की आवश्यकता ही नहीं, पर वे एक ऐसे संवेदनासिद्ध रचनाकार अवश्य रहे हैं जिन्होंने हिंदी पाठकों की अनेक पीढ़ियों का निर्माण किया है. जो काम हिंदी के प्रसार का गोरखपुर से निकलने वाली 'कल्याण' पत्रिका ने किया है वही काम कोहली के उपन्या्सों ने किया है. जब उनके उपन्यास धारावाहिक छप रहे होते थे, तो लोग उस कृति के अगले खंडों की बाट जोहते थे. हिंदी की दुनिया में आज बेस्ट सेलर की परिभाषा बदल गयी है पर वे उस युग के रचनाकार हैं जहां वाकई पाठक खरीद कर बेहतरीन साहित्य पढ़ा करते थे. आचार्य चतुरसेन शास्त्री, धर्मवीर भारती, राही मासूम रजा, शिवानी, मालती जोशी, रामदरश मिश्र, जैनेन्द्र कुमार, भगवती चरण वर्मा, यशपाल, अमृतलाल नागर आदि लेखकों को पुरस्कारों ने नहीं, पाठकों ने लेखक बनाया है.

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2012 में व्यास सम्मान मिलने के अवसर पर उनसे मैंने पूछा था कि आपने पुरस्कारों या पाठकों में किसकी परवाह की है?  तो उन्होंने कहा था, ''पुरस्कार या अकादमियों की परवाह मैंने कभी नहीं की, पर सच कहूं तो पाठकों की भी परवाह नहीं की मैंने. मैंने दरअसल अपनी परवाह की है. मैंने यही चाहा कि मैं जो चाहता हूं वह लिखूं. पाठकों को पसंद आए तो पढ़े, नहीं तो वे अपना काम करें, मैं अपना. मैं सच कहूँ तो स्वांखत: सुखाय लिखता हूं.'' यह उनकी रचना का सामर्थ्य है कि उनके लेखक व्यक्तित्व की धमक कभी फीकी नहीं पड़ी. उनके उपन्यासों की सराहना पं हजारीप्रसाद द्विवेदी, नागार्जुन, अमृतलाल नागर, धर्मवीर भारती, यशपाल व भगवतीचरण वर्मा जैसे आधुनिक समय के कृती लेखकों ने की है. कोहली को उपन्यासों को भी एक महाकाव्यात्मक गरिमा देने का श्रेय प्राप्त है. उन्होंने हिंदी समाज में फैलाए गए इस मिथ को झुठलाया है कि हिंदी में पाठक नहीं हैं, हिंदी का पाठक गरीब है अथवा उसके पास पढ़ने का समय नहीं है. उनकी हजारों की कीमत वाली पुस्तकों के दशाधिक संस्करण छप चुके हैं तथा आज भी पाठकों में कोहली के उपन्यासों की सर्वाधिक मांग है. हमारे वाड्.मय में प्राय: कहानियां और आख्यान के लिए काव्य शैलियां अपनाई गयी हैं. कोहली जी ने उस पूरे आख्यान को कथात्मक गद्य में प्रस्तुत किया तथा एक नई ही शैली ईजाद की महाकाव्यात्मक उपन्यासों की जिसका जनक उन्हें ही माना जाता है. यह और बात है कि जो साहित्‍यिक ख्याति शिवाजी सावंत को 'मृत्युंजय' और 'युगंधर' जैसे उपन्यास से मिली वह ख्याति नरेंद्र जी को 'मृत्युंजय' के समतुल्‍य अनेक औपन्यासिक कृतियां लिखने के बावजूद नहीं मिल सकी.

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उपन्यास-श्रृंखलाएं
दूरदर्शन पर सोप ओपेरा और मेगा सीरियल की शुरुआत 80 के बाद हुई किन्तु नरेंद्र कोहली ने औपन्या्सिक श्रृंखलाओं की शुरुआत 1975 के आसपास ही 'दीक्षा' के प्रकाशन से शुरू कर दी थी. रामकथा पर आधारित स्वंतत्र उपन्यासों की यह श्रृंखला दीक्षा, अवसर, संघर्ष की ओर और युद्ध (दो भाग) खंडों में विभाजित है. इसके अलावा उन्होंने 'अभ्युदय' शीर्षक से दो खंडों में भी रामकथा को औपन्यासिक वृत्तांत में समेटा है. इसी तरह उन्होंने महाभारत की कथा पर आधारित उपन्यास- 'महासमर' के कई खंड लिखे हैं: बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल प्रच्छ्न्न, प्रत्यक्ष एवं निर्बंध. महाभारत के आख्यान में रूचि रखने वाले पाठकों के लिए महासमर के खंड बेहद लोकप्रिय हुए. महाभारत की कहानी को अलग से भी कई उपन्यासों में समेटा है जैसे 'जहां धर्म है वहीं जय है' यानी यतो धर्म:ततो जय:.
उपन्यास श्रृंखला की एक और महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में उनके उपन्यास 'तोड़ो कारा तोड़ो!' के चार खंड आए तथा वे सब बहुत लोकप्रिय हुए. स्वामी विवेकानंद के जीवन कर्म और विचार पर आधारित यह उपन्यास पांच खंडों--निर्माण, साधना, परिव्राजक, निर्देश और संदेश में उपन्यस्त होने के बावजूद एक विराट जीवन की कथा को आदि से अंत तक खूबसूरती से एक बड़े आख्यान में पिरोता है. इन सीरीजबद्ध उपन्यासों के खंड एक-एक कर आते रहे. कोहली जी डूब कर उन्हें लिखते रहे और उनके पाठकों का संसार बृहत्तर होता गया. कभी- कभी एक तरफ 'महासमर' का कोई खंड आता तो कुछ दिनों बाद 'तोड़ो कारा तोड़ो' का बहुप्रतीक्षित खंड. कोहली जी देखते-देखते पुराख्यानों महाभारत और रामायण के प्रसंगों के एकमात्र गल्पकार बन गए. कहानियों में किसी बड़े तोड़ मरोड़ से बचते हुए उन्होंने आधुनिक समय में रामायण, महाभारत और विवेकानंद के जीवन मूल्यों को भी इस बहाने पुनर्स्थापित किया. विवेकानंद के जीवन पर पांच  खंडों में बृहद गाथा लिखने के बावजूद 'न भूतो न भविष्यति' नामक उपन्यास लिखा जो एक ही खंड में विवेकानंद को एक अलग शिल्प के आईने में देखता परखता है. इस उपन्यास के लिए कोहली जी प्रतिष्ठित व्यास सम्मान से सम्मानित किए गए.

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सामाजिक जीवन का चित्रण
कोहली जी ने बड़े उपजीव्य ग्रंथों से अलग कुछ महत्वपूर्ण चरित्रों को भी अपनी किस्सागोई में उठाया. जैसे अहल्या, शिखंडी, हिडिंबा, हिडिंबा, सैरंध्री, सुभद्रा, वसुदेव आदि. पर सीरीजबद्ध उपन्यासों के अलावा कुछ बेहतरीन मानवीय संबंधों के सामाजिक उपन्यास भी उन्होंने लिखे. 'क्षमा करना जीजी', 'साथ सहा गया दुख', 'सागर मंथन' आदि ऐसे ही उपन्यासों में हैं. हाल ही आए 'सागर मंथन'  को देखने से लगता है कि यह भी कोई पौराणिक कथा होगी किन्तु यह विदेशी धरती पर लिखा गया समकालीन कथ्य वाला उपन्यास है जहां अनेक महाद्वीपों के लोगों के जीवन संसार के संबंधों, अंतर्विरोधों, विडंबनाओं, ऐतिहासिक कड़वाहटों, देश की कमियों और खूबियों की कहानी है जो परिवर्तन और नए निर्माण की कथा कहता है. इसी तरह 'क्षमा करना जीजी'  पारिवारिक संबंधों का एक भावुक कर देने वाला उपन्यास है. एक निम्नमध्यवर्गीय स्त्री के जीवन संघर्षों को बहुत ही आत्मीयता से बुना है कोहली जी ने. उपन्यास की नायिका जिजीविषा की मिसाल है जो अपने पुरुषार्थ से एक नया जीवन और समाज रचना चाहती है. वह अपने आत्मसम्मान के लिए अंत तक संघर्षरत रहती है तथा इस मुहिम में सफल भी होती है. पौराणिक आख्यानों से अलग यह किस्सागोई उनके कथाकार की अलग शिल्प  प्रविधि का पर्याय है. 'साथ सहा गया दुख' का कथानक भी पारिवारिक सामाजिक है जिसमें बच्चे की बीमारी और मृत्यु की घटना में पति और पत्नी के साथ रहा और एक-दूसरे के साथ साझा किया गया दुख उपन्यास का विषय है -जो पाठक के अन्तरंग को छू लेता है. ऐसा ही एक उपन्यास है 'पुनरारंभ' जिसके केंद्र में एक जुझारू स्त्री की कहानी है. जीवन अपने अस्तित्व और अस्मिता के लिए सदैव कोई न कोई मार्ग खोज लेता है. ऐसे ही यह स्त्री प्रतिकूल हालात में जीवन के प्रति आस्था से नहीं डिगती और कठिनाई के दौर में भी एक जीवन का पुनरारंभ करने की क्षमता रखती है.

नरेंद्र कोहली का रचना फलक बहुत विपुल है. उन्होंने छह वर्ष की उम्र से लिखना आरंभ कर दिया था. स्यालकोट में पैदा अवश्य हुए किन्तु विभाजन के बाद जमशेदपुर स्थानांतरित परिवार के साथ रहते हुए ग्रेजुएट स्तर तक की पढ़ाई जमशेदपुर से हुई तथा यहीं उर्दू में भी महारत हासिल की किन्तु बाद में हिंदी में उनका हाथ रवां होता गया. उनका प्रारंभिक जीवन बहुत संघर्ष भरा रहा. पिता की आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी न थी. पर उन्होंने अपनी बौद्धिकता से न केवल परिवार में जगह बनाई बल्कि  उसे आर्थिक संकटों से उबारा भी. पत्नीं मधुरिमा कोहली ने उन्हें लेखन के लिए सर्वथा स्वतंत्र रखा. लेखन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ही थी कि वे चाहते तो 65 साल तक अध्यापन कर सकते थे किन्तु उन्होंने 55 की उम्र में ही स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ली और स्वतंत्र लेखन को समर्पित हो गए. यही वजह है कि उन्होंने लेखन को जीवन की एक निरंतर सक्रिय अनुष्ठान में बदला तथा हिंदी को अनेक उपन्यास, कहानियां, व्यंग्य, नाटक एवं निबंध दिए.

समकालीनों की दृष्टि में नरेंद्र कोहली
जैसा कि मैंने ऊपर लिखा, कथा साहित्य की मुख्य धारा की आलोचना में नरेंद्र कोहली को बेशक किस रूप में देखा जाता है, यह एक अलग और आलोचना की राजनीति का हिस्सा है किन्तु उनके साहित्य की लोकप्रियता और उस पर शोधार्थियों की संख्या विपुल है. अब तक उन पर दो सौ से ज्यादा शोध कार्य हो चुके हैं और अब भी कोने-कोने में विद्यार्थी उनकी रचनाओं पर शोध कार्य में संलग्न हैं. जहां तक उनके साहित्य की व्यापक मान्यता का सवाल है, हमारे समय के अनेक लेखकों ने उनके लेखन पर आश्वस्ति जताई है. रामकथा पर आधारित 'दीक्षा' पर अपना मत व्यक्त करते हुए भगवतीचरण वर्मा ने कहा था कि ''मैंने आपमें वह प्रतिभा देखी है जो आपको हिन्दी के अग्रणी साहित्यकारों में ला देती है. राम कथा के आदि वाले अंश का कुछ भाग आपने ('दीक्षा' में) बड़ी कुशलता के साथ प्रस्तुत किया है. उसमें औपन्यासिकता है, कहानी की पकड़ है.'' जबकि यशपाल ने माना कि ''उन्होंने राम कथा, जिसे अनेक इतिहासकार मात्र पौराणिक आख्यान या मिथ ही मानते हैं, को यथाशक्ति यथार्थवादी तर्कसंगत व्याख्या देने का प्रयत्न किया है. अहल्या के मिथ को भी कल्पना से यथार्थ का आभास देने का अच्छा प्रयास किया है उन्होंने.''

'अवसर' उपन्‍यास पर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उन्हें लिखा कि ''रामकथा को आपने एकदम नयी दृष्टि से देखा है. 'अवसर' में राम के चरित्र को आपने नयी मानवीय दृष्टि से चित्रित किया है. इसमें सीता का जो चरित्र आपने चित्रित किया है, वह बहुत ही आकर्षक है. सीता को कभी ऐसे तेजोदीप्त रूप में चित्रित नहीं किया गया था. साथ ही सुमित्रा का चरित्र आपने बहुत तेजस्वी नारी के रूप में उकेरा है. मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यथा-संभव रामायण कथा की मूल घटनाओं को परिवर्तित किये बिना आपने उसकी एक मनोग्राही व्याख्या की है.'' जाने माने कथाकार अमृतलाल नागर कहते हैं कि ''आप अपने नायक के चित्रण में सश्रद्ध भी हैं और सचेत भी....प्रवाह अच्छा है. कई बिम्ब अच्छे उभरे, साथ साथ निबल भी हैं, पर होता यह चलता है कि एक अच्छी झांकी झलक जाती है और उपन्यास फिर से जोर पकड़ जाता है. इस तरह रवानी आद्यांत ही मानी जायगी. इस सफलता के लिए बधाई....सुबह के परिश्रम से चूर तन किन्तु संतोष से भरे-पूरे मन के साथ तुम्हें बहुत काम करने और अक्षय यश सिद्ध करने का आशीर्वाद देता हूँ.'' नागार्जुन ने उन्हें लिखा कि ''प्रथम श्रेणी के कतिपय उपन्यासकारों में अब एक नाम और जुड़ गया- दृढ़तापूर्वक मैं अपना यह अभिमत आप तक पहुंचाना चाहता हूँ. ...रामकथा से सम्बन्धित सारे ही पात्र नए-नए रूपों में सामने आये हैं, उनकी जनाभिमुख भूमिका एक-एक पाठक-पाठिका के अन्दर (न्याय के) पक्षधरत्व को अंकुरित करेगी यह मेरा भविष्य-कथन है.''

वर्तमान में हिंदी में मिथकों, भारतीय पुराख्यानों महाभारत व रामायण को आधार बनाकर कथा साहित्य लिखने वाली एक मात्र शख्सियत नरेंद्र कोहली ही थे. उनके भीतर भारतीय वांड.मय के प्रति अटूट आस्था थी. एक बार मैंने पूछा था कि ''व्यंग्य के धुरंधर लेखक होते हुए भी यह विधा आज भी जैसे साहित्य की मुख्य विधा न होकर हाशिए की विधा मानी जाती है, ऐसा क्‍यों है?'' उत्तर में उन्होंने कहा था, ''असल में व्यंग्य तो बहुत लिखा है मैंने. विधा के रूप में भी स्वीकृति देता हूं इसे. पर यह ज्यादातर छिद्रान्वेषण की विधा है. या तो हम दोषों पर कटाक्ष करते हैं या जिससे पीड़ित होते हैं, उस पर विष उगलते हैं. इसलिए व्यंग्य व्यापक कथा को, धनात्मक विचारों को प्रश्रय नहीं देता. ऐसा नहीं कि यह हो नहीं सकता. पर अभी तक व्यंग्य विडंबनाओं को ही प्रकट करता आया है. वरना सारे काम उसके हैं. जब तक ये गुण उसमें न आ जाएं, व्यंग्य एक विधा तो हो सकती है पर इसमें बड़ी रचना हो नहीं सकती. जब तक व्यंग्य को महाकाव्यात्मक और औपन्यासिक आयाम नहीं मिलता इसमें बड़ी रचना संभव नहीं. प्रतीक्षा करनी होगी शायद कोई आए और इस विधा को इसके योग्य बना दे.''
 
अथक अनवरत लेखन
नरेंद्र कोहली की रचनाशीलता अब तक अथक रही है. उनकी लेखनी कभी थमी नहीं, रूकी नहीं. हाल ही में उनकी कई नई कृतियां आई है. 'कुंती' पर लिखे उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद: 'द रिटर्न', 'सुभद्रा' पर नया उपन्‍यास, संस्‍मरणों की उनकी पुस्तक 'समाज जिसमें मैं रहता हूँ' उनकी नवीनतम कृतियों में है. समाज जिसमें मैं रहता हूं - उनके अनुसार न तो समाज विश्लेषण है न समाजशास्त्र की पुस्तक है पर यह चरित्रों, लोगों, व्यक्तियों के बारे में कहानी शैली में लिखे संस्‍मरणों की पुस्तक है. अपने जीवन से जुड़े सिद्धांतों के अनुसार जिए जीवन की अनेक ऐसी अविश्वसनीय कहानियां इसमें उन्होंने पिरोई हैं जिसे आप एक बार पढ़ने के लिए उठाएं तो फिर रख नहीं सकते. एक आनलाइन वक्तव्य में वे इस किताब के बहाने बोलते हुए कहते हैं, ''मेरा समाज जिस समाज में मैं रहता हूं वह मुझे पिछड़ा मानता है. क्योंकि मैं मैगजीन को पत्रिका, बुक को पुस्तक और मिसेज को पत्नी कहता हूं. ठीक है कुछ लोग मेरी भाषा को बोलचाल की भाषा मानने से भी इन्कार करते हैं. जब वो बोलचाल की भाषा नहीं हो सकती तो साहित्य की भाषा कैसे हो सकती है क्योंकि मैं खिलाफत का अर्थ दुश्मनी नहीं विरोध नहीं, खलीफा का शासन मानता हूं. क्योंकि मैं बर्फबारी नहीं कहता हिमपात कहता हूं, मैं बाबा बर्फानी को अमरनाथ या महादेव शिव कहता हूं तो ऐसी भाषा वे कैसे स्वीकार कर सकते हैं. ......मैं सड़क पर खड़े सिपाही को उसका चाय पानी जो सौ रूपए है, न देकर चालान कटवाता हूं जो पूरे पांच सौ रूपए का है. वह मुझे कई बार समझाता है, बहुत सारे संकेत करता है और जब मैं इस पर अड़ा रहता हूं कि मुझे पर्ची कटवानी है, तो वह भी यह मान कर कि यह सिरफिरा आदमी है, इससे क्या सिर मारना, मुस्‍करा देता है और पर्ची काट देता है. ''

दुख है कि ऐसे जीवंत, भारतीय संस्कृति, वांड्मय, मिथक और पुराख्‍यानों व जीवन के उदात्त मूल्यों को अपने लेखन में सहेजने वाला मुखर व स्पष्ट‍भाषी एक बड़ा कथाकार हमारे बीच नहीं रहा. आज जब देश कोरोना संकट से गुजर रहा है, सकारात्मक संदेश देने वाले लेखकों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है, नरेंद्र कोहली का लेखन सदैव लाखों करोड़ो पाठकों को अपनी किस्सागोई ने ताकत व प्रेरणा देता रहेगा, इसमें संदेह नहीं.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं.  संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com

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