जीवन में तमाम तरह के इंसान देखे. कवि देखे, लेखक देखे, तमाम ओहदेदारों को देखा. प्रतापगढ़ से लखनऊ आया तो वही मेरे लिए एक बड़ा भूमंडल था. साहित्यकारों का गढ़. गांव का संकोची मन मिलने में हिचकता. पर साहित्यकारों के लिए मन में बहुत इज्जत थी. वहां पढ़ते हुए बच्चों के कवि द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी से मुलाकात हुई तो लगा यह तो दूसरे गांधी हैं. फिर नौकरी में आने के बाद निदेशक संपादक के रुप में ठाकुरप्रसाद सिंह मिले. क्या खूब शख्सियत थे वे भी. अज्ञेय से लखनऊ रहते ही मुलाकात हुई तो हिंदी के दिग्गज की छाया में बैठने का क्या सुख होता है वह जाना.
दिल्ली आए तो क्षितिज और व्यापक हुआ पर लंबे अरसे तक उस शख्स से मुलाकात न हुई जिससे मिलते ही जीवन की उदासियां फुर्र हो जाएं, मन में रस का संचार हो, खुद के भीतर बड़प्पन का बोध जागे, जिससे मिल कर पुन: पुन: मिलने की उत्कंठा जागती रहे. पर कुछ चीजें पूर्वनिर्धारित होती हैं. यह सौभाग्य 2015 में मिला जब अशोक चक्रधर के साथ एक साहित्यिक दल में शामिल होकर दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर जाने का सुयोग मिला. पग-पग पर बातों से बात और अर्थ से अर्थ निकाल लेने में प्रवीण, कैसे भी मनहूस वातावरण को चंचल बना देने में कुशल और अपने संचालन में किसी भी कवि को प्रस्तुत करने का उनका ढंग इतना निराला होता है कि ऐसे मौलिक उद्बोधन शायद किसी और के मुंह से सुनने को न मिलें.
प्रत्युत्पन्नमति यानी हाजिरजवाबी किसी भी लेखक या कवि की पहचान होती है. कठिन से कठिन क्षणों में प्रतिक्रियावादी होने से बचना और अपनी हाजिरजवाबी से मन मोह लेने की कला में कवि, संचालक आलोचक प्रोफेसर अशोक चक्रधर माहिर हैं. दुनिया के किसी भी कोने में चले जाइये किसी भी एयरपोर्ट पर कोई न कोई आपको वहां मिल जाएगा जो उन्हें पहचान लेगा और अदब से सलाम करेगा. वे उसका हालचाल पूछेंगे जैसे कौन बनेगा के सेट पर अमिताभ बच्चन हाट सीट पर मुखातिब व्यक्ति से पूछते . जरा सी देर में अपना बना लेने की कला में जैसे उन्होंने कोई डिग्री हासिल की हो.
उन्हें पढ़ते हुए, खास तौर पर, 1984 के आसपास कविता और विचारधारा पर पीएचडी करते हुए राजकमल प्रकाशन से आई उनकी पुस्तकें- मुक्तिबोध की कविताई और मुक्तिबोध की समीक्षाई पढ़ते हुए जाना कि कविता की समझ उनकी कितनी गहरी है पर मिजाज से वे इतना हँसमुख हैं कि नई कविता की तरह देर तक संजीदा बने हुए नहीं रह सकते. कविता पाठ में भी उनका आशुकवित्व इतना प्रखर मुखर होता है कि उधर से कोई पंक्ति सहसा उछली - बतर्ज एक बूंद सहसा उछली- कि अशोक जी लपक लेने वाले कुशल गेंदबाजों के से अंदाज में सक्रिय हो उठते हैं. शायद ही कोई संचालक हो जो उन्हें संचालन के मोर्चे पर मात दे सके. किसी भी वाचाल संचालक को पल भर में चित्त कर देने के लिए वे काफी हैं.
उनकी व्यंग्य कविताओं को सुनते हुए जाना कि एक व्यंग्य कविता वह होती है खास तौर हास्य व्यंग्य में जिसका लक्ष्य केवल हास्य होता है. जैसे हमारे पापुलर मेरठी- उनकी देहभाषा से ही हास्यरस चूता है. मंचों पर दूसरों की पूंजी से मालामाल होने वाले कवियों की संख्या ज्यादा है या नकली वीरोचित दहाड़ से पहाड़ को कंपकंपा देने वाले तथाकथित राष्ट्रवादी कवियों की फौज है, जो किन्हीं बाबाओं के मंचों से पोषित होती है या आस्थावादी चैनलों से. प्रो अशोक चक्रधर उन कवियों में हैं जो हालात से व्यंग्य और हास्य पैदा करते हैं. उनकी कविता जिस मोड़ पर खत्म होती है, वह हमें सोचने पर विवश करती है. सतही हास्य में स्खलित होने वाले व्यंग्यों से वे हमेशा बचते रहे हैं. ध्वनि को कविता का एक गुण माना है आचार्यों ने; वह ध्वनि उनकी वाणी में मुखर हो उठती है.
उन्हें पहली बार दक्षिण अफ्रीका में देखा, सुना, जाना तो अच्छा लगा. उन्होंने मुझे सुना तो कहने लगे ओम जी आपकी दारुण गुरुगंभीर समीक्षाओं, आलोचनाओं से ऐसा लगता था आपके काव्यशास्त्र से हास्यरस बिल्कुल ही गायब होगा. पर आप की बातों में तो रस है चुटीलापन है. मेरे साथ बिहार के तीन दिग्गज थे, सब इस प्रकृति-प्रदत तत्व से लगभग विमुख- इतने कि कभी कभी वाकई उन्हें देख कर बोध होता था जैसे हम किसी शोक सभा में मुखातिब हों. उनके इस हँसमुख अंदाज ने मुझे उनका मुरीद बना दिया. परदुखकातर इतने कि दोस्त के पांव में कोई कील कांटा चुभ जाए तो वे उसे निकालने के लिए उद्यत हो जाएं. अफ्रीका के एक मामूली से रेस्तरां में हम लोग चाय पीने बैठे तो वे चाय की ट्रे लेकर सबको चाय वाले के अंदाज में चाय ही देने लगे. महात्मा गांधी के प्रेस के पास अफ्रीकी मैले- कुचैले बच्चों की टोली में बैठे तो बच्चों से खेल करने लगे. प्रेम जनमेजय ने दस दस के नए नोट निकाले. शायद बच्चों को उपहारस्वरूप देने के लिए. नोट पर गांधी बाबा का चित्र दिखा कर अशोकजी बच्चों से पूछते कि बोलो ये कौन हैं. बच्चों के गांधी बोलते ही हम खुश हो उठते और जोर का ठहाका फूट पड़ता. वे रास्ते में विदेश यात्रा की सारी बारीकियों से इतने परिचित होते कि हममें से कोई बुड़बक भी होता तो उसका काम चल जाता. वे सदैव सहायतार्थ प्रस्तुत हो उठते.
उनके संचालन की बारीकियां एक बार फिर मैंने मारीशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान अचानक अटलबिहारी वाजपेयी जी की मृत्यु के अवसर पर आनन-फानन में पहले से निर्धारित कार्यक्रम के स्थान पर आयोजित किए जाने वाले श्रद्धांजलि कार्यक्रम में देखीं. जिस संजीदगी से वे दिवंगत के प्रति शोकाभिव्यक्ति कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे, उनके सामने चुनौती थी कि यह कार्यक्रम राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप हो. वे व्यंग्यविदग्ध कवि हैं तथापि शोकांजलि को भी उन्होंने अपनी प्रतिभा से दिवंगत वाजपेयी की विराट शख्सियत के साथ-साथ भाषा, संस्कृति, राजनय आदि क्षेत्रों में उनके व्यापक अवदान की चर्चा में बदल दिया. तमाम देशों के लेखक कवि भाषाविद आए और अटलजी के प्रति अपने अपने उदगार व्यक्त किए. लोग अटल जी की बातें सुन कर ओज और उत्साह से भर उठते.
एक बार राज्यसभा टीवी चैनल ने उन पर एक फिल्म बनाई जिसका संचालन समीना अली सिद्दीकी जी किया करती थीं. संयोग से एक दिन प्रस्तुति सहायक अभिषेक मिश्र का फोन आया कि आपसे अशोकजी के बारे में बाईट लेनी है. मैंने कहा, यह तो बहुत अच्छा है. गंभीर कविता पर लिखने पढ़ने वाला अशोकजी के विट व्यंग्य और हास्यबोध पर बोले. वे अगले ही दिन सुबह आए और आफिस के ही बोर्डरूम में कैमरा सेट कर मेरी बाईट शूट की. मैंने यही कहा कि अशोक जी से मिल कर जाना कि जीवन में विट हास्य व ह्यूमर का बोध क्या मायने रखता है. ऐसे नहीं कि हर वक्त आदमी कोपभवन में बैठा रहे या उदास रहे. मुझे अश्क जी का कहा याद आता है: ग़म के लिए पड़ी है अभी एक उम्र अश्क/ आओ ये चंद लम्हे तो हँस कर गुजार लें. मैंने कहा कि मेरा तो यही मानना है कि मुझे तो हर जन्म में एक अशोक चक्रधर चाहिए वरना वह जीवन अधूरा होगा. वे देख कर हँसने लगे. जटिल पेचीदगियों और चुनौती भरे इस उदास अवसन्न जीवन से निपटने के लिए हास्यबोध न हो तो जीवन अवसाद से भर जाए.
पर वे सदैव हँसोड़ आभा ही मुख मंडल पर सजाए रहें ऐसे भी नही हैं. वे केवल कवि नहीं, एक विजनरी फिल्म निर्देशक भी हैं. तमाम फिल्में, धारावाहिक व डाक्यूमेंट्ररीज़ उन्होंने बनाई हैं, निर्देशित की हैं, कइयों में खुद अभिनय भी किया है. कितनी फिल्मों में उनका वायसओवर काबिलेगौर है. प्रसारण के लिए उनका आवाज एक अनमोल खजाने की तरह है. गंभीरता में बजती हुई आवाज है वह. एक बार उनकी एक फिल्म देखी. उसमें एक कैरेक्टर आर्टिस्ट का रोल उन्होंने ऐसे निभाया कि रुला दिया. कोई कारुणिक सीन था वह और अपनी प्रकृति के विपरीत उन्होंने वह रोल किया. कहना न होगा कि अशोक के चेहरे पर वह शाश्वत हँसी जैसे विलुप्त भी और वे उस कहानी के अनुरूप संवाद अदायगी कर रहे थे. उनका चेहरा कारुणिकता में भीगा हुआ लगता था. लगभग आधे घंटे की वह क्लिपिंग उनके भीतर के सशक्त अभिनय की तसदीक करने वाली थी.
वे कितने परदुखकातर हैं इसका एक प्रसंग तब का है जब रामदरश मिश्र के लड़के हेमंत मिश्र किसी दुर्घटना मे घायल होकर बीमार पड़े थे. जब जरा सम्हले तो देखा कि उन्हें संवाद ही न याद हों. ऐसे कठिन दौर में अपनी एक फिल्म 'गुलाबड़ी' जो यादवेंद्र शर्मा चंद्र की कहानी पर आधारित थी, में अशोक चक्रधर ने बीमार हेमंत के भीतर मुख्य भूमिका करने के लिए साहस व आत्मविश्वास पैदा किया तथा वह रोल उनसे ही करवाया. अपनी संस्मरणात्मक कृति 'सर्जना ही बड़ा सत्य है' में उन्होंने अशोकजी को सलीके से याद किया है. न केवल उन्होंने उनकी व्यंग्य कविता की यह कहते हुए तारीफ की कि उन्होंने व्यंग्य को एक नया आयाम व गांभीर्य दिया है बल्कि हेमंत प्रसंग में अशोकजी की पहल का भी कृतज्ञता से उल्लेख किया है. रामदरश जी लिखते हैं, ''उन दिनों हेमंत जो भी पढ़ते थे, वह उनकी स्मृति में उतरता नहीं था, फिसल जाता था. सामान्यत: किस डायरेक्टर या प्रोड्यूसर को पड़ी है कि वह किसी कलाकार की स्मृति के वापस होने तक उसका इंतजार करे. उसे तो जल्दी से अपने कार्य की संपन्नता चाहिए. लेकिन अशोक हेमंत के लिए डायरेक्टर ही नहीं थे, उनके बड़े भाई भी थे- शुभचिंतक और प्रशंसक. वे चाहते थे कि वह बड़ा कलाकार अपनी निराशा से उबरे, अपना खोया हुआ आत्मविश्वास प्राप्त करे- और सचमुच इस फिल्म के पूरा होने के बाद हेमंत का विश्वास वापस आ गया. (सर्जना ही बड़ा सत्य है, पृष्ठ 143)''
निराशा से घिरे व्यक्तियों के लिए अशोक च्रकधर उस चिकित्सक की तरह हैं जिनके जरा से संबोधन और बातचीत से निराशा की कुहेलिका छँट जाती है और चित्त उनकी वाक्प्टुता से चहक उठता है. उनकी जिजीविषा का एक छोटा सा उदाहरण और कि जब वे दक्षिण अफ्रीका के अपने होटल से नीचे उतरते और समुद्र की रेतीले विस्तार पर चहलकदमी व ब्रिस्क वाक करते नजर आते तो लगता कोई नौजवान उछल कूद रहा है. बातों ही बातों में उन्होंने अपना पाजामा उठा कर घायल घुटना दिखाया और कहा 'ओम जी इस कटोरी के चार पांच टुकडे आज से कोई सात आठ बरस पहले हो चुके हैं पर अपने हौसले को मैंने पस्त नहीं होने दिया और आज भी एक युवा सरीखी उछल कूद कर सकता हूँ.' लखनऊ के युवा कथाकार बालेन्दु द्विवेदी के व्यंग्य उपन्यास 'मदारीपुर जंक्शन' के लोकार्पण व चर्चा के अवसर पर साथ ही लखनऊ ले गए तो उनके साथ कार्टूनिस्ट इरफान भी थे. प्रकाशक अरुण महेश्वरी भी. रास्ते भर ऐसी बतकहियां कि क्या कहने! अभी पिछले साल आई उनकी काव्यकृति ''गई दुनिया नई दुनिया'' व्यंग्यमिश्रित लहजे में कोरोना ग्रस्त वातावरण में कैसे हँसते खेलते हुए सावधानियां बरतते हुए जियें ऐसे प्रसंगों और मार्मिक विषयों पर बेहतरीन कविताएं शामिल हैं. वे हमेशा गंभीरता की चादर ओढ़े रहने वाले इंसान नहीं हैं न मरते हुए संसार में थक हार कर बैठ जाने की सीख देने वाले. वे जैसे हर पल कहते हों- हम न मरब मरिहै संसारा. और वास्तव में लेखक कहां मरता है. वह तो शाश्वत जीता है अपने अक्षरों में अमर होकर. बकौल अज्ञेय- वह गाता है अनघ सनातनजयी.
उनका हाजिरजवाब कवि मन कैसे हर वक्त सक्रिय रहता है, ऐसा एक वाकिया हाल ही घटा. मैंने किसी बात पर चैट के दौरान स्माइली के रूप में संतरे का चित्र भेजा तो तुरंत उनका आशुकवि जाग गया. वे दो संतरों को देख कर कह उठे- प्रिय भंत रे. लगा ज्यों हों गीत के दो अंतरे. उसके बाद मेरी बारी थी. मेरा कवि मन भी कह उठा -
बन गया स्थायी. हो जाए यह नवगीत
यदि बन जाएं
दो दो अंतरे.
जुड़ें फिर फिर महफिलें संगीत की
गजल की रुबाइयों और गीत की
सुनें सारे जन महाजन
और सब श्रीमंत रे.
बारिशों के दिन कि बूंदें गिर रहीं
बदलियां आकाश में फिर घिर रहीं
है कोरोना मगर चारो ओ
हे अरे भो कंत रे.
प्रिय भंत रे.
तो कविता की जुगलबंदी में भी वे कितने माहिर हैं.
ऐसे चिरयुवा, चिरसखा, हास्य व्यंग्य के विदग्ध हस्ताक्षर, भाषा व इंटरनेटविद, सफल संचालक, अध्यापक, वक्ता, प्रवक्ता, सफल निर्देशक और अभिनयपटु को उनके जन्मदिन पर बहुत बहुत बधाई और कामना कि वे ऐसे ही चिरयुवा बने रहें . उनकी वाणी में ऐसा ही विलास कायम रहे और कविता में ऐसा ही उल्लास जो गंभीर से गंभीर वातावरण में भी मनुष्यता को हँसना चहकना सिखाता रहे.
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# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित व अन्वय एवं अन्विति सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मेलः dromnishchal@gmail.com
ओम निश्चल