त्रिभुवन हमारे समय के बड़े चिंतक और कवि हैं. उनकी भाषा, व्यंग्य और सच्चाई की धार से इतनी पैनी है कि पाठक उसके प्रभाव से बचा नहीं रह सकता. उनका पहला कविता संग्रह 'कुछ इस तरह आना' था. इस संकलन के बारे में कवि बद्रीनारायण ने कहा था, "त्रिभुवन की कविताएं ताजी हवा का झोंका है, जो अनुवादित या बोझिल एकसार तकनीकी कविताओं को पढ़कर बोर-व्यथित हो रहे पाठक के दिलो दिमाग पर प्रभावी दस्तक देती हैं." सच ही है, त्रिभुवन जहां भी रहें, वह अपनी भाषा शैली से चमत्कृत करते हैं.
सामाजिक विषयों पर सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थिति यह बताती है कि मानवीय उम्मीदें, संघर्ष, जिजीविषा, सपने अभी मरे नहीं हैं. उनका दूसरा काव्य संग्रह 'शूद्र' अंतिका प्रकाशन से आया है. त्रिभुवन अपने दोनों ही काव्य-संग्रहों में अपनी समाजशास्त्रीय दृष्टि, इतिहास, मिथक, शोषण, आदि के ज्ञान तथा दार्शनिक गहराई की सहज अभिव्यक्ति से हतप्रभ करते हैं.
'शूद्र' कविता संग्रह की कविताएं इतिहास, समाज और काल में शूद्रों के योगदान को सामने रखती हैं और उनके अवदान का लेखा जोखा मांगती हैं. एक तरह से देखें तो 'शूद्र' कोई कविता संग्रह नहीं बल्कि एक लंबी कविता का विस्तार भर है, मुक्तिबोध के 'अंधेरे में' की तरह. त्रिभुवन के मुताबिक इनके लेखन की शुरुआत बरसों पहले हुई...इस बारे में कुछ और भी कहने से बेहतर है, साहित्य आजतक के पाठकों के लिए त्रिभुवन के खंड-काव्य 'शूद्र' के कुछ काव्य-अंशः
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शूद्र के कंधे पर किले
दो बच्चे मां संग खड़े थे
रावण-हत्था सुनने को अड़े थे.
सूर्यनगरी का वह किला
गहरी घाटी की तरह था.
दु:ख गाथा लिखी किसी
सूखी पाटी की तरह था.
सुनाता जा रहा था बूढ़ा भोपा
रावणहत्थे पर दुख राग ओपा.
कलुषित कथा मेहरानगढ़ की
किले के लिए मानववध की.
पहली मई 1459 की घड़ी थी
नभ से फूटी रक्त की झड़ी थी.
जैसे कोई अश्रुपूर्ण गीत था वह
जैसे अमानुषिक अतीत था वह.
भोपा गाथा गाता जा रहा था
सभी को रुलाता जा रहा था
कहानी बस यों थी
शत्रुओं से भयभीत राव जोधा
एक सुरक्षित दुर्ग चाहता था
शत्रु की पहुंच से सुदूर
हवाओं की छुअन से परे
बादलों की ओट में
धूप के भाले की पहुंच से रक्षित
भयभीत वह क्षत्रिय भुभुक्षित.
वह ब्राह्मण था जिसने पहाड़ की चोटी पहचानी
वह क्षत्रिय था जिसने
शूद्र तपस्वी चिड़ियानाथ का अरण्य उजाड़ा
वह वैश्य था जिसने
धनदान से क्रूर काल को शांत स्थल उतारा.
ब्राह्मण ने मुहूर्त निकाला
अर्ध रात्रि सा लगा उजाला
पोथे-पाने बांचे और
वास्तुदोष का किया उपाला.
पंडित बोला : जोधा राव से
ऐंठ कर पांडित्य के भाव से
किले की नींव में
शौर्य की सींव में
एक नर जीवित गड़ेगा
नहीं तो राजन
शत्रु आप पर भारी पड़ेगा!
वहीं एक गर्वीला गवाल था
नाम उसका
राजाराम मेघवाल था.
ब्राह्मण की वह
आंख की किरकिरी था
क्षत्रिय पुत्र
उस सिंह के समक्ष चिरी था
वैश्य से न वह
मांगता था ऋण कभी
टूटता न था
उस विपन्न का प्रण कभी.
आत्मा उसकी
भेड़ बकरियों में रमती थी
आंख बस
बूढ़ी मां के सामने नमती थी
हंसी होठों से
तारों की तरह झरती थी
एक बेटी सदा उसकी बांहें भरती थी.
किले की नींव खुद रही थी
इनसानियत की लौ बुझ रही थी
राव जोधा की नजर अब
उस देह पर थी जो
नींव का पत्थर बनेगी
और उसके क्षात्र धर्म के लिए
सुरक्षा प्रहर बनकर तनेगी.
एक दिन राजाराम
पहाड़ की चोटी पर सुस्ता रहा था
और उधर, किले के शिलान्यास के यज्ञ को
वह ब्राह्मण घृत बहा रहा था
राजाराम भी एक समिधा था जैसे
सैन्य टोली राव जोधा की निकलती है
भांप उसके इरादे धरती भी पिघलती है
गाढ़ी नींद से उठाया उसे
और नींव में जमाया उसे
वह आधारशिला बन गया
औ उस पर दुर्ग चिन गया
कहने को तो वह देवी का कंठहार था
सच में अमानुषिकता का पारावार था.
शौर्य के नाम पर नरसंहार की नींव था
जोधा के पराक्रम की उधड़ती सींव था
भोपा गाए जा रहा था
आज भी सूर्य नगरी में प्रभात
रक्त होता है
आज भी सूर्य नगरी की देह में
हर ओर हर गेह में
पीड़ा के धब्बे नीले हैं
और शासकों के जीवन
दुर्भाग्य ने कलुषा से कीले हैं
क्योंकि ये जोधा के वंशज
एक शूद्र के हत्यारे हैं!
हत्यारे ही नहीं, हत्यारों के हरकारे हैं!
प्रश्न कहां थम रहे थे
आंखों में पीड़ाओं के कण रम रहे थे
मां, क्या सब किले हत्यारों ने बनाए?
क्या सब किलों में शूद्र दबाए?
क्या सब शासकों ने नरसंहार रचाए?
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बच्चे दोनों सुन रहे थे
मन उनके
असंख्य प्रश्न बुन रहे थे
जिज्ञासाओं की झड़ी थी
मां भी अड़ी थी
मां, शूद्र क्या होता है
मां, शूद्र कौन होता है
मां, शूद्र कहां होता है
मां, शूद्र कब होता है
मां, शूद्र कैसे होता है
मां, शूद्र क्यों होता है
वहीं भोपा फिर गा उठा
रावण-हत्थे का
रुदन राग
सप्तम स्वर पाठ उठा!
शू्द्र,,,,,,,,
शू्द्र शूद्र
शूद्र मैं
शूद्र न होता किला न होता
कायर राव जोधा को अभय मिला न होता
राजाराम न होता
रणबांकुरे का ललित ललाम न होता
अकबर बादशाह को सलाम न होता
राजाराम न गला
न पिघला
उसी के कंधों पर है
सिकंदर सा सिर ताने खड़ा
दुर्ग मेहरानगढ़ का
शौर्य उस शूद्र सुदृढ़ का.
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हमारे जीवन में जगमगाते अंधियारे
किसने कायम की नई सभ्यता?
किसने तोड़ा सृष्टि का सन्नाटा?
किसने बजाया इस धरती पर सृजन का डंका?
किसने अंधेरे चीर कर दीप जलाए?
किसके जीवन में अंधेरे जगमगाए?
किसने बाजार सजाए?
किसने दबी-छुपी सभ्यताओं का घूंघट सरकाया?
किसने की काम चोरी?
किसने सुप्त सभ्यताओं में
पुरुषार्थ का पिंड जलाया?
किसने किया समुद्र मंथन
और कौन अमृत घट छीन ले गया?
किसने उपवन सजाए?
किसने फूल खिलाए?
किसने अपने हिस्से कांटे पाए?
कौन पथरीले राह चला
किसने राजमार्ग बनाए?
किसने बंजर बनाई धरती?
किसने भूख प्यास मिटाई?
किसने तकदीरों से होड़ ली?
किसने दुनिया की तकदीर मोड़ दी?
किसका पसीना बहा? किसका लोहू खौला?
किसने नभ चुंबी शिखरों पर
किसने जीवन रूप रचाया?
किसने इंद्रासन की चूलें हिलाईं?
किसने उंगली पर पहाड़ उठाया?
किसने कुदरत को सांचे में ढाला?
किसने सीने पर खाया कोप का भाला?
किसने भूचालों को थामा?
किसने सूरज को मुरझाने से रोका?
किसने गेंद सी उछाली धरती
किसने चांद पर की मीनाकारी?
किसने झरनों को बनाया मीठा?
किसने सिखाई सागरों को गुलकारी?
किसने पानी में लौ जलाई?
किसने रूप महल बनाए?
किसने बुतखाने सजाए?
किसने कांटों पर बसर किया?
किसने चांद सितारों को छू लिया?
किसने धरती का सीना फाड़ा?
किसने हिमालय पर ध्वज गाड़ा?
किसने देखी हमारे इरादों की उठान?
किसने सुनी हमारे हथौड़ों की सरगम?
किसने बनाए मोइनजोदड़ा और हड़प्पा
किसने बनाए लाल किला, ताजमहल
अजंता एलोरा और कपिलवस्तु?
किसने हाथों से शोले सजाए
किसका खून रोम यूनान तक में
किसने मिस्र के अहराम बनाए
किसने सजाए कुस्तुनतुनिया के कंगूरे?
किसने काशी बनाई,
किसने अयोध्या बसाई?
किसके इरादों में ज्वालामुखी सांसें लेता है
सीनों में लाल अंगारों की बौछारें होती हैं
किसने नदियों का मुंह मोड़ा?
किसने रेगिस्तानों में उतारा चंद्रलोक?
किसने क्षितिज को धरा से जोड़ा?
कौन करता बंद कमरों में कर्मयोग?
कौन सृजन का सच्चा सुयोग?
कौन फेंकता बेलाग कमंद?
कौन महकाता मकरंद?
कौन जो नव प्रभात लाता है?
कौन वह जो तारीख बनाता है?
किसके कर्मयोग से सूरज चांद अंगड़ाई लेते?
किसके कहने से तारे जीवन के अंडे सेते?
किसके हाथों में हल, कुदाल, फावड़े, बसूले?
किसके भरोसे बीज, खाद, खेत खलिहान,
किसके हाथों से झरता घी, दूध, दही, नाज?
कौन बनाता धरती को अन्नपूर्णा?
पृथिवी पर वसंत हम लाए
कुसुम विभा हमसे छाए
हम से चंद्रमा निर्मेघ गगन में
दु:ख में जल-जलकर
हम लाए सुख की सुगंभीर वेला
हमसे मादकता मेला
हमसे जगती दमक रही है
यह धरा गमक रही है।
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हम बिछाते जाल रश्मियों के
हमसे इंदु की किरणें सजती हैं
हमसे अंधकार में धूम मचती है
हम लाते उतार धरा पर सुषमा अंबर की
हमसे है शाश्वत हंसी शंबर की
हमसे प्रभुता पीर-पैगंबर की
हमने जांचा परखा नभ का कूल किनारा
हमसे सुधा सलिल की धारा।
हम बिछाते जाल रश्मियों के
हम से सुरलोक अमर
हम से नश्वरता के वर
हमारे कारण विश्व मधु रस पीता
हमारे बिन हर देश का कटोरा रीता
हमसे गीता, हमसे सीता
हमसे सदा उर्वशी मदमाती
हमसे पृथिवी गतियां पाती।
सहकर त्रास अपरिमित
हम साधते सबके हित
हमारा पौरुष
हमारा भुजबल
धरा पर बहती हमारे ही
श्रम सीकर की कल कल।
विकल व्यग्र जन-जन
मुग्ध-मगन त्रिभुवन
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हम पीते वेदना
और भरते उमंग
हम अपना यौवत गलाते
सृजन के रस में
प्राणों के वेग पिघलाते।
इंद्र धनुष रचते
उन्मुक्त खेल करते।
हम चांद सूरज की अंगड़ाई
हमसे धरती लहलहाई!
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यह कहानी है तमस में सूर्य रचने की
जिंदगी अब न रोएगी
तकदीर अब न सोएगी
स्वर्ग बढक़र होगी ये धरती
बेमिसाल होगा अपना आसमान
नया प्रभात फूटेगा
तमस का दाग छूटेगा.
हम विद्रोह का संकल्प हैं
शत्रुओं की शिराओं में
शरारत है
हमारी भुजाओं में हरारत है
हम हर ताकत का विकल्प हैं.
हम शाश्वत संकल्प हैं.
आओ अब अदावत कर लें
आओ अब बगावत कर दें
कब तक मजबूर रहेंगे
कब तक मजदूर रहेंगे
आओ अब कयामत कर दें.
आओ अब टूट पड़ें
सोते न रहें
रोते न रहें
आओ अब
सूरज की सुनहली
किरण बन फूट पड़ें.
हम शूद्र हैं,
लेकिन आग की तरह लपलपाएंगे,
जलधि तरंगों की तरह उफनेंगे,
हम डूंगर और टेकरी की तरह
मस्तक ऊंचा रखेंगे
हम पर्वत, पठार,
हम शैल-शिखर
हम बेकाबू जलप्रपात.
हम ज्वालामुखी.
हम विस्फोट.
हम बाघ की दहाड़.
हम क्षितिज से फूटते सूर्य.
हम शूद्र, हम शूद्र
शूद्र हम.
इस अंधेरी रात का
जादू टूटेगा
सुनहरा सूर्योदय फूटेगा.
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पुस्तकः शूद्र
लेखकः त्रिभुवन
विधाः कविता
प्रकाशकः अंतिका प्रकाशन
पृष्ठ संख्याः 112
मूल्यः 235/- रुपए
aajtak.in