पुण्‍यतिथि विशेषः स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से...लिख सकने वाले नीरज

नीरज का गीतकार अभावों में पला है तभी उसके कंठ में इतनी मिठास है. हूक है. इन्हीं अभावों में नीरज ने जीना सीखा तथा दुनिया को जीना सिखाया भी.

कवि गोपालदास 'नीरज' [फाइल फोटो]
ओम निश्चल
  • नई दिल्ली,
  • 19 जुलाई 2020,
  • अपडेटेड 12:04 AM IST

एक वक्त गीतों का था. परिदृश्य में नीरज, रामावतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी, सोम ठाकुर, शंभुनाथ सिंह, भारत भूषण तथा किशन सरोज के गीतों को मंचों पर सदैव उच्च आसन मिला है. पर जो स्‍थान कवि मंचों पर नीरज का था, वह अन्‍य किसी का नहीं. जैसा दर्द नीरज के यहां है, कहीं-कहीं भारतभूषण के यहां है, कुछ-कुछ किशन सरोज के गीतों में है वह दर्द और कहीं नहीं है. दर्द दिया है, नीरज के गीतों के संग्रह का नाम ही है. नीरज का बचपन व कैशोर्य अभावों में बीता. कानपुर के नाम पाती उनका आत्मकथ्य हो जैसे. 'कानपुर आज जो देखे तू अपने बेटे को. अपने नीरज की जगह लाश उसकी पाएगा. सस्ता कुछ यहां मैं ने खुद को बेचा है. मुझको मुफलिस भी खरीदे तो सहम जाएगा.'

नीरज का गीतकार अभावों में पला है तभी उसके कंठ में इतनी मिठास है. हूक है. इन्हीं अभावों में नीरज ने जीना सीखा तथा दुनिया को जीना सिखाया भी. अपने प्यार के लिए बदनाम भी हुए पर प्यार की पैरवी करनी नहीं छोड़ी. वे चाहते थे कि व्यक्ति के जीवन से प्यार का मुहूरत न निकल जाए. इस बात को वे अपनी प्रेयसी को संबोधित करते हुए कहते हैं. देखती ही न दर्पण रहो प्राण तुम. प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा. उनकी दृष्टि में प्यार के रसायन के बिना कुछ भी चलने वाला नहीं. जीवन का सारा कारोबार जैसे प्यार पर आधारित हो. एक गीत में देखिए वे क्या कहते हैं:

बिना प्यार के चले न कोई, आँधी हो या पानी हो,नई उमर की चुनरी हो या कमरी फटी पुरानी हो,तपे प्रेम के लिए, धरित्री, जले प्रेम के लिए दिया,कौन हृदय है नहीं प्यार की जिसने की दरबानी हो,तट-तट रास रचाता चल,पनघट-पनघट गाता चल,प्यासी है हर गागर दृग का गंगाजल छलकाता चल.राही हैं सब एक डगर के सब पर प्यार लुटाता चल.हिय-हिलगे 'तुम' से नाता ..नीरज का तुम केवल तुम नहीं, अन्य नहीं, वह उनसे बहुत अभिन्न है. उनसे हिय-हिलगा है. इसलिए उनके इस तुम में सारी दुनिया समा जाती है. सर्वनाम की ऐसी बहुव्यापकता अन्य कवियों में कम दीख पड़ती है. वे तुम के साहचर्य को जीवन के लिए जरूरी और अपरिहार्य मानते हैं. देखिए कैसे गीत उनके तुम की अपरिहार्यता को प्रमाणित करते हैं. वे बार बार तुम के साहचर्य की गुहार लगाते हैं. केवल मैं मैं में उनका कथ्य पर्यवसित नहीं होता. वह इसमें तुम की भी बराबर की साझेदारी मानता है तभी तो कहता है बार बार : तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो,मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊंगा!***तुम्हारे बिना आरती का दीया यहन बुझ पा रहा है न जल पा रहा है.***आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,दुलार दो.रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो.***तुम झूम झूम गाओ, रोते नयन हंसाओ,मैं हर नगर डगर के कांटे बुहार दूंगा.***देखा जाय तो इस मैं और तुम के सिवा क्या बचता है इस दुनिया में. प्रकृति और पुरुष में भी दृश्य और द्रष्टा का भाव है. एक कवि ने लिखा है. मैं लिखूंगा गीत, तुम गाना, अमर हो जाएंगे हम. मैं का तुम से ऐसा ही सघन साहचर्य है. परस्परावलंबन. अन्योन्याश्रित. इसे ही गीतकार रामावतार त्यागी ने इन शब्दों में बांधने की चेष्टा की है: जो संबंध स्वयंबर का सिंदूर से. मेरा और तुम्हारा वह संबंध है. एक घरू नाता जिससे हो वह तुम कोई और नहीं जैसे अपने ही चित्त का दूसरा संस्करण लगता है. मैं की ही कोई रेप्लिका --प्रतिकृति. इस संबंध को नीरज ने जिस तरह अपनी कविताओं में जिया है वह विरल है. कवि तुम से कांधा से कांधा मिला कर चलने का संकल्प निभाता है. वह तुम को जीवन के इस महासमर में अकेला नहीं छोड़ना चाहता. यह तुम को जीने की ही चाहत है कि कविवर द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी को लिखना पड़ा: मेरी कविता का हर बोल तुम्हारा है. यह इदम् न मम् की साधना है. यह आत्मवत् सर्वभूतेषु का अभिलषित स्वीकार है. इसीलिए कवि कहता है तुम्हारे बिना जीवन का कोई कारोबार नहीं चलता. न आरती का दीया जलता है न बुझता है. अन्यत्र नीरज कहते हैं : एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के सांस मेरी सिसकती रही उम्र भर. सच कहें तो नीरज की कविता मैं से तुम तक की यात्रा है. देखत तुमहि तुमहिं होइ जाई का-सा भावबोध है.

नीरज के यहां गहरा जीवन दर्शन है. लौकिक से अलौकिक प्रतीतियों को छूने की चेष्टाएं हैं. लघुता से विराटता की ओर प्रयाण. पर वे जहां मनुष्य जीवन की नियति और उसके प्रारब्ध पर बात करते हैं वहां वे यथार्थवादी कवि के रूप में समाज की विद्रूपताओं पर प्रहार भी करते हैं. कभी नवगीतकार उमाकांत मालवीय ने लिखा था: टाफी और खिलौनों वाली एक गदोरी गोरी. उसे थमा दी अल्मुनियम की पिचकी हुई कटोरी. भिखमंगन बन डोले शहजादों की परी सहेलियां. फैली हुई हथेलियां. नीरज लिखते हैं: जिनको जाना था यहाँ पढ़ने को स्कूल. जूतों पर पालिश करें वे भविष्य के फूल. चिंता एक- सी है. नीरज में पग पग पर सूक्तियां बिखरी हैं. उन्होंने अनेक काव्यरूपों का प्रयोग किया है . गीत भी गीतिका भी, गजल भी, रूबाई भी, दोहे भी सवैये व पारंपरिक छंद भी लिखे हैं उन्होंने. उनके कुछ दोहे देखें जो अपने आप में मोतियों की तरह मूल्यवान हैं:

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आत्मा के सौन्दर्य का, शब्द रूप है काव्यमानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य.दिल अपना दरवेश है, धर गीतों का भेषअलख जगाता फिर रहा, जा-जा देस विदेश.ना तो मैं भवभूति हूँ, ना मैं कालीदाससिर्फ प्रकाशित कर रहा, उनका काव्य प्रकाश.धन तो साधन मात्र है, नहीं मनुज का ध्येयध्येय बनेगा धन अगर, जीवन होगा हेय.तो कहना यह कि कविता की श्रेष्‍ठता के लिए वे 'मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य' ---कह कर वे कवियों का यशोवर्धन करते हैं. नीरज जहां अपनी कविताओं में उदासियों का एक कोना सजाते हैं वहीं उम्मीदों का दिया भी जलाते हैं. वे नाउम्मीदी के नहीं आशा और उजास के कवि हैं. खुद उनका बचपन व कैशोर्य कितनी विपन्न‍ताओं से होकर गुजरा. कानपुर की यादें इसकी गवाह हैं. पर वे दुश्वाचरियों से जूझते हुए पढ़ते लिखते और गाते रहे. उनके भीतर का कवि इन कठिनाइयों में मुरझाया नहीं, वह उत्तरोत्तर परवान चढता रहा. आह से उपजा होगा गान---की कसौटी पर उनके गीत दर्द की गहराइयों से पैदा होते रहे किन्तु उसी के बीच प्यार का बिरवा भी पनपता रहा. दर्द दिया है उनका गीत संग्रह दर्द से भीगा है. उनके भीतर एक शुद्ध कवि का अंत:करण था. वह दुनियावी मायावी संसार से पराजित होने वाला न था. यही वे दिन थे जब वे गा रहे थे. स्वप्न झरे फूल से. मीत चुभे शूल से. लुट गए सिंगार सभी बाग के बबूल से. और हम खड़े खड़े बहार देखते रहे. कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे. यही वे दिन थे जब वे महसूस कर रहे थे कि वे किस बड़े मकसद से प्रेरित होकर सरस्वती के आंगन में आए हैं और क्या क्या दिन देखने को मिल रहे हैं. आज भी वे पंक्तियां हारर की तरह हमारे कान में सुन पड़ती हैं जिस आह से नीरज ने कानपुर के नाम पाती लिखी. यही वे दिन थे जब उन्होंने लिखा: कांपती लौ ये सियाही ये धुआं ये काजल. उम्र सब अपनी इन्हें गीत बनाने में कटी. कौन समझे मेरी आंखों की नमी का मतलब. जिंदगी वेद थी पर जिल्द बंधाने में कटी. यह केवल उन्हीं की नहीं अक्सर जीवन जब अपने ध्येय की पटरी से उतर जाता है तो ऐसी ही अनुभूति होती है कि क्या करने आए थे और क्या कुछ करना पड़ रहा है. एक गीत गा रही है ज़िन्दगी...नीरज में निराशाएं अपार हैं. आंसू हैं, अर्थी है, दुखों के घात प्रत्याघात हैं, तो उजास की कनी भी. वे केवल निराशा की कुहेलिका में डूब कर रह जाने वाले कवि नहीं इंसान को उससे बाहर निकलने की प्रेरणा देने वाले कवि हैं. इसलिए वे पग पग पर उम्मीदों का दिया जलाते चलते हैं. दर्द को उकेरने में उनकी तुलना केवल गोपाल सिंह नेपाली से की जा सकती है जो उनके पूर्वज कवियों में थे या पंजाबी के कवि शिव बटालवी से. नेपाली को ऐसे ही कठिन अनुभवों से गुजरते हुए लिखना पड़ा था: बाहर हँसना, भीतर रोना. संगिनि, जान गया हूं मैं. बटालवी के गीत जैसे उनकी आत्मा की साज से होकर निकले हैं. भारत भूषण को कहना पड़ा: मेरे गीतों का घूँघट मत खोलो. प्रिय नयन तुम्हारे भर भर आएंगे. नीरज इसी दौर के कवि हैं. एक इंसान के रूप में नीरज को भी जीवन के झंझावातों से होकर गुजरना पड़ा. फिर भी उनके कवि की आत्मा ने हार नही मानी. क्योंकि कवि तो प्रजापति है. वही पराजय के बोध से भर जाए तो इस सृष्टि का क्या हो. लिहाजा पग पग पर उन्होंने प्रत्याशाएं भी बोईं. कहा, सपने देखना मत छोड़िए. यह एक स्वप्न‍दर्शी कवि ही कह सकता है. और यह भी कि जरा सी ठेस से सपने देखना बंद मत कीजिए. व्यर्थ आंसूओं के मोती मत लुटाओ क्यों कि 'कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नही मरा करता है.' उन्होंने लिखा. सुख सहचर ही नही, लुटेरा भी होता है, खुशियों में ग़म का बसेरा भी होता है. इसलिए अपनी किस्मत की सियाही को कोसने वालो सुनो, चांद के साथ अंधेरा भी हुआ करता है.वे सूनी सूनी सी अरण्य-जिंदगियों में जीवन का संगीत घोलने की प्रेरणा देते रहे. जब सूना सूना लगे तुम्हें जीवन अपना. तुम मुझे बुलाना मैं गुंजन बन आऊँगा. लेकिन जिस दिन पथ पर सपनों की उड़े धूल. तुम मुझे बुलाना --मैं चंदन बन आऊँगा. यह है एक कवि का कौल . वह स्वप्नों में खोया हुआ भले रहता है पर उसे जीवन के संवलाए यथार्थ की खबर न हो ऐसा नही होता. तमाम छायावादी रुपकों, उत्प्रेक्षाओं, उपमानों के बावजूद नीरज ने यथार्थ के गीत भी लिखे हैं, अपने समय के प्रत्याघातों को ग़ज़लों गीतिकाओं में पिरोया है. जीवन को कुछ सुभाषित दिए हैं तो उसकी कड़वी सचाइयां भी शब्दों में उकेरी हैं. वे भूल नहीं करते कि भारतमाता राजप्रासादों में पलने वाली दुहिताओं में नहीं, किसी निर्धन की बेटी में बसती है. यानी भारत गरीबों का देश है. गरीबों और गुरबत को हिकारत की नजर से देखने वालों को भारतमां की छवि नहीं दिख सकती. वे राष्ट्रभक्त हो सकते हैं राष्ट्रप्रेमी नहीं. कवि इसी गुरबत का गायक होता है. वह सफरिंग को शब्द देता है. पीड़ा को कविता की अस्थिमज्जा में गूँथता है. तभी एक कवि यह कौल उठाता है कि: न गंगाजल न हलाहल न कोई और ही जल हो. किसी लाचार आंसू को हमारे भाल पर लिखना. नीरज आशा और उजास के गायक हैं. वे आंसुओं से गीली आंखों की कोरों को पहचानते हैं तभी शायद वे मनुष्य को इस आश्वस्ति से भरना भी चाहते हैं कि जहां दुख है वहीं कहीं सुख की पुलक भी है. चक्रवत्परिवर्तन्ते सुखानि च दुखानि च. उनका यह कथन जीवन-शाश्वत की एक पुनराभिव्यक्ति है:सूनी सूनी सांस की सितार परगीले गीले आंसुओं के तार परएक गीत सुन रही है जिन्दगीएक गीत गा रही है जिन्दगी. लोकप्रियता तो मिली पर कवि का यश नहीं...नीरज को विपुल काव्यसृजन के लिए लोकप्रियता तो अपार मिली, मान सम्मान, पुरस्कार सब मिले, पर वह यश नहीं मिला जो मुख्यधारा के कवियों को मिलता है. जो यश अज्ञेय के खाते में है, नागार्जुन, शमशेर, कुंवर नारायण, केदारनाथ सिंह के खाते में है उससे वे वंचित ही रहे. आलोचकों की दुनिया गीत और कविता में बँटवारा कर चलती रही और नीरज से सदैव विमुख रही. पर नीरज अपने प्रशंसकों के प्राणों में बसते रहे. कविता की दुनिया से जुड़ने वाला हर प्राणी जिसने नीरज के गीत रुबाइयां, गीतिकाएं, दोहे पढ़े हैं, जिसने उनके कुछ फिल्मी गीतों को सुना और सराहा है वह उनका मुरीद है.नीरज सत्ता के अनुगायक नहीं रहे. किसी राजनीतिक बोध के साथ उन्होंने काव्यरचना नहीं की. सत्ताएं उनकी प्रशंसक हों, यह और बात है. पर जिस अर्थ में हमने नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, महादेवी वर्मा और प्रसाद के काव्य को सराहा है, उस अर्थ में नीरज और बच्चन को क्यों नहीं मान्यता मिली. बच्चन को हालावादी कवि के रूप में समेट दिया गया तो नीरज को सूफियाना कवि के रूप में. पीछे जब एक गीतकार गायक को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया तब दुनिया की निगाह लिरिक्स की अहमियत पर गयी. क्या हमारे समय में यह संभव है कि मुख्य धारा के कवियों के बरक्स कंठ कंठ में बिराजने वाले नीरज, बच्च‍न जैसे कवियों को भी वह दर्जा मिले जिसके वे सर्वथा पात्र हैं. सच्चा कवि देश-काल से परे होता है. नीरज में भी शाश्वत की अनुगूंज है. उनकी आवाज़ वाचिक अदायगी वाले एक बड़े कवि की आवाज है जिसकी गूंज दिलों में बरकरार रहेगी. उनकी कविता इंसानियत की गवाही देती है और उनके इस कौल का प्रमाण भी है-जिसमें इंसान के दिल की न हो धड़कन ‘नीरज’शायरी तो है वो अखबार की कतरन की तरह. # लेखक डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक, कवि एवं भाषाविद हैं. इनकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, भाषा में बह आई फूल मालाऍं:युवा कविता के कुछ रूपाकार व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. युवा कवियों पर लगातार लिखने का श्रेय उन्हें जाता है. हिंदी अकादमी के युवा कविता पुरस्कार, आलोचना के लिए उत्तशर प्रदेश हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब के शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्या‍णमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, मोबाइल 9810042770, मेलः dromnishchal@gmail.com

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