भारत के विभाजन के साए में आजादी थोड़े गम और निराशा में लिपटी हुई थी लेकिन तब एक महात्मा गांधी को छोड़कर कमोबेश सभी बड़े नेताओं ने मान लिया था कि देश के बंटवारे का कोई विकल्प भी नहीं था. उस वक्त गांधी दिल्ली में नहीं थे बल्कि नोआखाली में थे. बंटवारे के जख्मों पर मरहम लगाते हुए और शायद उन दिनों को याद करते हुए जब तीन दशक में उन्होंने तीन बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया.