पत्रकार प्रशांत कनौजिया का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. इस पर सुनवाई मंगलवार को होगी, लेकिन इस मामले में कनौजिया के खिलाफ आरोप साबित करना आसान नहीं होगा.
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होने वाली हैं और अदालत यूपी सरकार और पुलिस से इस मामले पर अहम सवाल करेगी लेकिन इन सवालों के जबाव देने आसान नहीं होंगे क्योंकि पुलिस कई धाराओं के तहत आनन-फानन में एफआईआर दर्ज कर कथित रूप से बिना वारंट के प्रशांत को दिल्ली से यूपी की राजधानी लखनऊ ले गई. यही बात कई सवाल खड़े करती है.
धाराओं पर पत्नी ने उठाए सवाल
इसके अलावा कानून की जिन धाराओं के खिलाफ प्रशांत को गिरफ्तार किया गया है उन पर सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत की पत्नी जिगीषा अरोड़ा ने हेबियस कॉर्पस यानी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल कर कई सवाल उठाए हैं. इन सवालों में प्रमुख हैं आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता की धारा 500 और आईटी एक्ट की धारा 66 और 67.
जिगीषा का कहना है कि आईटी एक्ट की धारा 66 के प्रावधान इन पोस्ट के मामले में लागू नहीं होते क्योंकि किसी तरह की कोई अश्लीलता या भड़काने वाली सामग्री इसमें नहीं है. अगर सरकार इसे अदालत में साबित भी करती है तो इस धारा के तहत अधिकतम तीन साल की सजा है लिहाजा वो जमानत पर रिहा हो सकता है. इसके अलावा आईपीसी की धारा 500 और 505 के तहत प्रशांत ने किसी तरह की धार्मिक या जातीय भावनाएं भड़काकर लोगों को उकसाया नहीं और न ही कोई अफवाह फैलाई है.
बिना वारंट के गिरफ्तारी
वहीं, सादे लिबास में खुद को उत्तर प्रदेश पुलिस के अधिकारी बताकर प्रशांत को मंडावली स्थित घर से उठा ले जाने वालों ने कोई गिरफ्तारी वारंट या एफआईआर भी नहीं दिखाई. दिल्ली की किसी अदालत में पेश किए बिना और बगैर किसी ट्रांजिट रिमांड के दूसरे प्रदेश में पुलिस कैसे ले गई, ये भी एक बड़ा सवाल है.
ऐसे ही कई मामलों में सरकारों की हो चुकी किरकिरी
बात सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट सोशल मीडिया पर शेयर करने की है लेकिन ऐसे ही मामलों में अब से पहले पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के कार्टून शेयर करने वाली लड़की प्रियंका शर्मा पर भी ऐसी ही कार्रवाई हुई थी. ऐसे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उसी दिन सुनवाई कर उसे रिहा करने और माफीनामा लिखवाने की शर्त लगाकर मामला निपटा दिया था. इससे पहले मुंबई में भी दो लड़कियों ने ऐसे ही पोस्ट शेयर किए तो वहां की सरकारों ने कार्रवाई करते हुए आरोपियों को जेल में डाल दिया गया था. लेकिन अदालतों के दखल के बाद सरकारों ने सबको छोड़ा था.
ऐसे ही मामले में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी पर भी सरकार की किरकिरी हुई थी. आखिरकार सभी सरकारों ने उन आरोपियों को रिहा किया क्योंकि सत्ता के आरोप और गोल मोल दलीलें अदालत की चौखट पर तीखे और सीधे सवालों के आगे टिक नहीं पाईं. अब बड़ा सवाल ये ही सामने है कि क्या प्रशांत कनौजिया के मामले में भी यूपी शासन और पुलिस प्रशासन का यही हश्र होने वाला है?
संजय शर्मा