अवमानना केस में प्रशांत भूषण को नहीं मिली राहत, SC में याचिका खारिज

अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार की तरफ से दायर अवमानना याचिका में प्रशांत भूषण पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा कि वेणुगोपाल ने सीबीआई के अंतरिम निदेशक के चयन के लिए हुई चयन समिति की बैठक के मिनट को मनगढ़ंत रूप दिया.

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प्रशांत भूषण (फाइल फोटो) प्रशांत भूषण (फाइल फोटो)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 07 मार्च 2019,
  • अपडेटेड 12:29 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को एक अवमानना याचिका के मामले में राहत देने से इनकार कर दिया है. प्रशांत भूषण ने अर्जी दायर कर जस्टिस अरुण मिश्रा को इस अवमानना मामले की सुनवाई से रोकने की मांग की थी, जिसे शीर्ष कोर्ट ने खारिज कर दिया.

अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने केंद्र सरकार की तरफ से दायर अवमानना याचिका में प्रशांत भूषण पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपने एक ट्वीट में कहा कि वेणुगोपाल ने सीबीआई के अंतरिम निदेशक के चयन के लिए हुई चयन समिति की बैठक के मिनट को 'मनगढ़ंत' रूप दिया. यह बैठक तत्कालीन कार्यवाहक सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव की नियुक्ति को लेकर हुई थी, जिसमें समिति ने राव की नियुक्ति को मंजूरी दी थी.

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जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस नवीन सिन्हा की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा था कि वे मुद्दे को प्राथमिकता दे रहे हैं, जो न्यायालय के समक्ष विचाराधीन मुद्दे से जुड़ा है और जो जनता की राय तथा वादियों के अधिकार पर असर डाल सकता है. इसी मामले में सात मार्च यानी आज सुनवाई हुई जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने अवमाना याचिका को खारिज करने की प्रशांत भूषण की मांग नहीं मानी.

बता दें कि यह स्पष्ट करते हुए कि एक वकील को सजा अंतिम उपाय होनी चाहिए जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा- अवमानना एक ब्रह्मास्त्र है, इसका आमतौर पर इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. उस दौरान वेणुगोपाल ने साफ किया था कि वह भूषण के लिए किसी सजा की मांग नहीं कर रहे हैं, लेकिन चाहते हैं कि एक रेखा खींची जाए और अदालत में विचारधीन मामलों पर मीडिया रिपोर्टिग और वकीलों द्वारा टिप्पणी करने की सीमा को लेकर एक कानून लाया जाए. हालांकि, केंद्र की तरफ से पेश सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने सार्वजनिक तौर पर फैसलों की आलोचना करने वाले और जजों पर आक्षेप लगाने वाले वकीलों को अनुशासित करने की मांग की थी. मेहता ने कहा कि इस तरह के लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने की अदालत की उदारता को उसकी कमजोरी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए.

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