गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल, यही है असली हिंदुस्तान

मुकेश उर्फ जावेद कहते हैं कि उनके मस्जिद जाने से कौमी एकता का एक अच्छा संदेश जाता है. उन्हें ऐसा करके खुशी मिलती है. उनके दोस्तों को खुशी मिलती है.

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ईद पर गले लगते मुहम्मद इश्तियाक और मुकेश श्रीवास्तव ईद पर गले लगते मुहम्मद इश्तियाक और मुकेश श्रीवास्तव

अहमद अजीम

  • प्रतापगढ़,
  • 27 जून 2017,
  • अपडेटेड 1:44 PM IST

हिंदुस्तान की खूबसूरती है इसकी गंगा-जमुनी तहजीब. अनेकता में एकता और आपसी भाईचारा. हालांकि, आजकल इसी खूबसूरती को खत्म करने में भी कुछ लोग लगे हुए हैं. लेकिन ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जो उम्मीद जगाती हैं और जिन्हें देखकर ये लगता है कि जो ताना-बाना इस देश में आपसी भाईचारे का है वो इतनी आसानी से टूटने वाला नहीं है.

ईद के पाक मौके पर उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ शहर में 'आज तक' की टीम की मुलाकात मुकेश श्रीवास्तव उर्फ मुहम्मद जावेद नाम के शख्स से हुई. आप सोच रहे होंगे कि एक ही आदमी का हिन्दू-मुस्लिम दोनों नाम कैसे? दरअसल, 1992 से मुकेश लगातार ईद-बकरीद में अपने मुस्लिम साथियों के साथ ईदगाह पर नमाज पढ़ने जाते हैं. मुकेश के मुताबिक, "हिन्दू-मुस्लिम सब एक हैं, सब मजहब एक है. अगर मंदिर जा सकते हैं तो मस्जिद क्यों नहीं?"

किसी मुस्लिम दोस्त ने नहीं कहा
ये पूछने पर की आपके धर्म के लोग बुरा नहीं मानते... मुकेश कहते हैं कि कोई कुछ भी सोचे उन्हें जो काम करके सुकून मिलता है, वो करेंगे. मुकेश ये भी कहते हैं कि उनके किसी मुस्लिम दोस्त ने कभी उन्हें ऐसा करने के लिए नहीं कहा.

मुकेश उर्फ जावेद कहते हैं कि उनके मस्जिद जाने से कौमी एकता का एक अच्छा संदेश जाता है. उन्हें ऐसा करके खुशी मिलती है. उनके दोस्तों को खुशी मिलती है. मुकेश अपने बटुए में 'काबा शरीफ' की तस्वीर भी रखते हैं और अगर कहीं 786 नंबर का नोट मिल जाए तो उसे भी संभाल के रख लेते हैं, खर्चते नहीं हैं.

मिशाल है दोस्ती
वहीं दूसरी ओर मुकेश के बचपन के कई मुस्लिम दोस्त भी हैं जो उनके साथ अक्सर मंदिर जाते हैं. उनमें से एक दोस्त हैं मुहम्मद इश्तियाक उर्फ संजय. इश्तियाक, प्रतापगढ़ नगर पालिका में पार्षद भी हैं. शहर में बहुत से लोग उन्हें 'संजय' के ही नाम से जानते हैं. मुकेश और संजय की दोस्ती एक मिसाल है.

इंसानियत ही सबसे बड़ा मजहब
मुकेश और इश्तियाक के बचपन के दोस्त मुहम्मद अफजल और अकील भी हैं. जो अब शहर से बाहर हैं लेकिन ईद-बकरीद जरूर जमा होते हैं और साथ-साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं. इन लोगों का मानना है कि इंसानियत ही सबसे बड़ा मजहब है और कोई कुछ भी सोचे वो इसी पर कायम रहेंगे.
 

हिंदुस्तान की इसी मजबूती को कमजोर करने की कोशिश हो रही है. धार्मिक उन्माद और नफरत फैलाने की कोशिश की जा रही है. ऐसे में इस तरह की मिसालें आंखों को ठंडक देती हैं और उम्मीद जगाती हैं.

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