अक्टूबर का महीना था और साल था 2014. तब मैं एक पत्रिका के साथ जुड़ा था. दिल्ली में यमुना का किनारा छठ व्रत करने वालों से पटा पड़ा था. व्रत करने वाले परिवार सूरज को अर्घ्य दे रहे थे. हम जैसे फोटोग्राफर इस मौके को कैमरे में कैद करने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे. इस भागम-भाग के बीच मैंने एक बुजुर्ग को प्रोफेशनल कैमरे से फोटो लेते देखा. धीरे-धीरे चलते हुए वो सज्जन एक-एक पल को क्लिक कर रहे थे. काफी देर तक उनको देखता रहा. उनके साथ एक लड़का था जो कैमरे का बैग उठाए पीछे-पीछे चल रहा था. मैंने अपने साथ खड़े एक फोटो-पत्रकार से जानना चाह कि ये कौन हैं? साथी फोटो-पत्रकार ने हैरान होते हुए बताया, ‘अरे इन्हें नहीं जानते. ये पॉल साहब हैं. रघु राय के बड़े भाई और फोटोग्राफी के मास्टर.’
फोटोग्राफी का यह मास्टर अब इस दुनिया में नहीं है. पॉल साहब, का 88 वर्ष की आयु में कल 17 अगस्त को निधन हो गया.
एस. पॉल पिछले 65 साल से फोटोग्राफी कर रहे थे. फोटोग्राफी के लिए मिलने वाले कई पुरस्कार इनके नाम हैं. पॉल साहब के बारे में जितना जानता गया उतना ही उनसे मिलने के लिए मन बेचैन होने लगा था. थोड़ी सी कोशिश के बाद मैं उनतक पहुंच गया. हम उनके दो तल्ले वाले घर के ऊपर वाले कमरे में बैठे. मुलाकात के शुरुआती घंटे में उन्होंने मुझे फोटोग्राफी सिखाई थी.
तब मैंने उनसे जानना चाहा था कि आज भारतीय फोटोग्राफर जो काम कर रहे हैं उस बारे में वो क्या सोचते हैं. सवाल सुनते ही पॉल साहब हंसने लगे थे. इस बारे में उनके शब्द थे, ‘रहने दो इस सवाल को. बोलना तो बहुत चाहता हूं लेकिन लोग कहेंगे कि पॉल साहब ज्ञान दे रहे हैं. एक बात जान लो कि आज के समय में सबसे अच्छा काम बंगाली फोटोग्राफर्स कर रहे हैं. इनके काम को जब मैं देखता हूं तो खुशी होती है. अच्छी समझ है उन्हें.’
पॉल साहब की फोटोग्राफी 1953 से शुरू होती है. तब वो अपने परिवार के साथ शिमला में रहते थे. पॉल साहब और उनका परिवार भी 1947 में हुए बंटवारे का शिकार बना था. तब उनका परिवार पाकिस्तान के लाहौर से निकलकर हिंदुस्तान के शिमला में बस गया. अबके एस. पॉल तब शर्मपाल थे. वो हिमाचल सरकार में एक सरकारी मुलाजिम थे लेकिन फोटोग्राफी का भूत सवार था. एक शाम उन्होंने एक कैमरा, रोल, ट्राईपॉड और फोटोग्राफी सिखाने वाली एक किताब खरीदी.
मैंने उनसे पूछा था कि आप शर्मपाल से एस.पॉल कब बन गए? इसके जवाब में उन्होंने कहा था ‘शर्मपाल थोड़ा लंबा नाम लगता था, मुझे. पहले मैंने इसे एस.पाल बनाया. फिर बाद में थोड़ा और प्रयोग किया और अपने नाम को एस. पॉल कर दिया.’
फोटोग्राफर एस. पॉल को देश के जानेमाने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में 24 साल तक सेवाएं देने का मौका मिला. लेकिन सेवा से मुक्त होने के बाद भी वो लगातार फोटोग्राफी कर रहे थे. उनका कैमरा कभी नहीं रुका. इस बारे में उन्होंने कहा था, ‘फोटोग्राफर्स के लिए रियाज बहुत जरूरी है. बिना रियाज के तस्वीरें दिखना बंद हो जाती हैं. आज भी मुझे हर जगह तस्वीरें दिखती हैं और मैं उन्हें बिना कैमरे कैद किए हुए रह नहीं सकता. फोटोग्राफी मेरी जान है’
कल रात जब कैमरे के इस जादूगर के दुनिया छोड़ने की खबर मिली तो मुझे उनकी यही बात याद आई कि फोटोग्राफी मेरी जान है. मुझे लगता है कि बढ़ती उम्र की वजह से शरीर ने फोटोग्राफी करने से मना कर दिया होगा तो पॉल साहब ने उस शरीर को छोड़ देने का फैसला ले लिया होगा क्योंकि वो फोटोग्राफी नहीं छोड़ सकते थे.
विकास कुमार