ऋषियों के ज्ञान से लेकर आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरे भारतीय औषधि विज्ञान का शोकेस अब दुनिया के दवा निर्माताओं, व्यापारियों और चिकित्सकों तक पहुंचाने के लिए आयुष मंत्रालय ने पहला अंतरराष्ट्रीय मेला लगाया. मेले में 75 देशों के स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े उद्योगपति, कारोबारी और विशेषज्ञ जुटे हैं. मेले में देश भर के दो सौ से ज्यादा औषधि और स्वास्थ्य उपकरण निर्माताओं ने अपने स्टॉल लगाए हैं. सरकार का मानना है कि इस कदम से देश में 2020 तक दवा निर्माण के क्षेत्र में ही रोजगार के दस लाख नये अवसर पैदा होंगे. जाहिर है इससे देश से देसी दवा का निर्यात बढ़ेगा.
सात दिसंबर तक चलेगा अंतरराष्ट्रीय मेला
एमिल फार्मा के सीएमडी संचित शर्मा का मानना है कि इस कदम से ना केवल भारतीय देसी चिकित्सा पद्धतियों को वैश्विक मान्यता मिलेगी, बल्कि दवा उद्योग को नया विस्तृत बाजार भी मिलेगा. खपत बढ़ने के साथ उत्पादन बढ़ेगा और साथ ही रोजगार के अवसर भी. इस मेले में भारतीय चिकित्सा पद्धति के सदियों पुराने ज्ञान और आधुनिक अनुसंधान का तालमेल दिखता है. इसमें औषधियों को प्रयोगशाला में परखकर वैज्ञानिक आधार देते हुए दवा बनाने की तकनीक का दुनिया भर में प्रदर्शन भी शामिल है. जैसे डीआरडीओ की विकसित ल्यूकोस्किन, सीएसआईआर की विकसित बीजीआर 34 जैसी औषधियां. ये पहला अंतरराष्ट्रीय मेला सात दिसंबर तक विज्ञान भवन के पीछे यानी राजपथ के लॉन में चलेगा.
बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने इस मेले का उद्घाटन करते हुए कहा कि आयुष के इन कदमों से दवा निर्माण क्षेत्र में 2020 तक कम से कम दस लाख रोजगार के नए अवसर आएंगे. इतना ही नहीं, परोक्ष रूप से ढाई करोड़ रोजगार सृजित होंगे. आयुष चिकित्सा पद्धतियों की दवाओं को परीक्षण के बाद बाजार में उतारने से देश-विदेश में इनकी मांग बढ़ रही है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा कि जिस प्रकार से इस क्षेत्र में नए उद्यम बढ़ रहे हैं, उससे अगले दो साल में 10 लाख लोगों को सीधे रोजगार और ढाई करोड़ लोगों को परोक्ष रोजगार इसी क्षेत्र में मिलेगा.
निर्यात बढ़ाना है मुख्य लक्ष्य
इस पहले अंतरराष्ट्रीय मेले में आयुष यानी आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी कंपनियों ने अपने उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई है. चार दिनों तक चलने वाले इस सम्मेलन का लक्ष्य आयुष दवाओं के निर्यात को बढ़ावा देना है. आयुष दवा उद्योग अभी पांच सौ करोड़ का है, जिसमें दो सौ करोड़ रुपये का निर्यात होता है. सरकार का मकसद निर्यात बढ़ाना है.
डीआरडीओ और सीएसआईआर की पहल
चिकित्सा और वाणिज्य विशेषज्ञों ने समारोह में कहा कि अगर आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध आदि की दवाओं को आधुनिक दवाओं की तर्ज पर तैयार किया जाए तो नतीजे बेहतर हो सकते हैं और विश्व बाजार में उनकी मांग बढ़ सकती है. कई सरकारी प्रयोगशालाओं ने हाल में ऐसी दवाएं बनाई हैं. जैसे सीएसआईआर ने मधुमेह रोधी दवा बीजीआर-34 बनाई. डीआरडीओ ने सफेद दाग की दवा ल्यूकोस्किन विकसित की. इन दोनों दवाओं को एमिल फार्मास्युटिकल ने बनाया और बाजार में उतारा तो इनके नतीजे बेहतर रहे. एक तो बड़ी प्रयोगशालाओं के काम करने के कारण लोगों का विश्वास बढ़ा, दूसरे इन परंपरागत फार्मूलों में सुधार किए गए. एमिल फार्मास्युटिकल के चेयरमैन केके शर्मा ने कहा कि अगर दुनिया भर में भारत को आयुर्वेदिक दवाओं का परचम लहराना है तो इन्हें आधुनिक चिकित्सा पद्धति के अनुरूप विकसित करना होगा.
आरोग्य में प्रभु के अलावा आयुष मंत्री श्रीपाद नाईक, फिक्की के महासचिव संजय बारू समेत तमाम वक्ताओं ने आयुर्वेद, होम्योमैथी, यूनानी, सिद्ध आदि दवाओं की उच्च गुणवत्ता तथा उनके प्रमाणीकरण पर जोर दिया. वक्ताओं ने कहा कि एलोपैथी में कई बीमारियों का इलाज नहीं है. जबकि आयुर्वेद, यूनानी एवं अन्य देसी पद्धतियों में इनके बेहतर और किफायती विकल्प हैं. सरकार ने आयुष में सौ प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति दी है और क्षेत्र में व्यापक संभावना के उपयोग के लिये संबंधित पक्षों के संसाधनों को लेकर एक मंच पर आने की जरूरत को रेखांकित किया. इसका फायदा कंपनियां उठा सकती हैं.
देश में 6,600 आयुष इकाइयां
इन दवाओं का भारत दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है. देश में 6,600 आयुष इकाइयां कार्य कर रही हैं. भारत आयुष और हर्बल उत्पादों का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है. इसलिए हमारे पास आज आयुष के बुनियादी ढांचे को भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली से एकीकृत करने का एक अवसर है.
सुरभि गुप्ता / संजय शर्मा