कांग्रेस के बाहर और भीतर एक बड़ा तबका है, जो अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराये जाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को जिम्मेदार मानता है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी एक बार कहा था कि उस समय अगर मेरे परिवार से कोई प्रधानमंत्री होता तो मस्जिद नहीं गिरती. मगर अभी तक कोई ऐसा सबूत सामने नहीं आया जिससे उन्हें इसका जिम्मेदार माना जाए.
नरसिम्हा राव जब जून 1991 में प्रधानमंत्री बने तो लगभग उसी समय कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चुने गए थे और भारत के पास सिर्फ दो सप्ताह के आयात के लायक विदेशी मुद्रा भंडार था. इन दोनों मामलों में नरसिम्हा राव को तीखी राजनीतिक आलोचना झेलनी पड़ी. अर्थव्यवस्था और बाबरी मस्जिद पर विपक्षी दलों और अपनी कांग्रेस पार्टी की विचारधारा दांव पर लगी थी, और इससे इन समस्याओं का हल तलाशने में राव की क्षमता सीमित हो गई. इन बड़ी राजनीतिक बाधाओं के बीच राव ने अर्थव्यवस्था के मामले में सही निर्णय लिए और 6 दिसंबर को एक गलत फैसला लिया.
हिंदू और मुस्लिम वोट का सवाल
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद उस समय को याद करते हैं. उनका कहना है कि राव साहब की त्रासदी यह थी कि आम सहमति बनाने की कोशिश ने ही उन्हें नुकसान पहुंचाया. आम सहमति बनाने के पीछे कारण यह था कि नरसिम्हा राव पूरी तरह से मस्जिद की रक्षा करने के बजाय हिंदू और मुस्लिम दोनों वोट बैंकों को तुष्ट करना चाहते थे. राव मस्जिद की हिफाजत के साथ-साथ हिंदू भावनाओं की रक्षा करना चाहते थे और खुद को भी बचाना चाहते थे. लेकिन ठीक इसका उलटा हुआ. मस्जिद ढहा दी गई. हिंदू कांग्रेस से दूर हुए और राव की अपनी प्रतिष्ठा की धज्जियां उड़ गईं.
मस्जिद की सुरक्षा और राम मंदिर आंदोलन को लेकर राव कई मोर्चों पर जूझ रहे थे. शुरू के दिनों में नागपुर में पढ़े लिखे और ब्राह्मण नेता होने के नाते उन्हें विश्वास था कि वह हिंदूवादी संगठनों और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) नेताओं से निपट लेंगे. नरसिम्हा राव की जीवनी 'हाफ लॉयन : हाउ पीवी नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्म्ड इंडिया', जिसे बाद में ऑक्सफोर्ड प्रेस ने हिंदी में 'आधा शेर' शीर्षक से प्रकाशित किया, लिखने वाले पत्रकार विनय सीतापति इस विषय पर विस्तार से चर्चा करते हैं. विनय सीतापति बताते हैं कि राव ने उस दौरान बीजेपी नेताओं और अन्य हिंदू नेताओं से कई गुप्त बैठकें कीं. इन बैठकों में उन्हें आश्वस्त किया गया कि अदालत के फैसले के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाएगा. इन नेताओं में बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी थे.
धड़कन तेज चल रही थी और रक्तचाप बढ़ा हुआ था
विनय सीतापति 28 जून 1921 को जन्मे नरसिम्हा राव के निजी डॉक्टर के हवाले से मार्मिक कहानी बताते हैं. छह दिसंबर 1992, रविवार होने के कारण नरसिम्हा राव अपने सामान्य समय के बाद यानी 7 बजे सोकर उठे. उन्होंने उस दिन के अखबार पढ़े. टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्ट थी कि विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) के 2.25 लाख से अधिक कार्यकर्ता बाबरी मस्जिद के पास पूजा अर्चना करने वाले थे. इस आलेख में वीएचपी के प्रवक्ता के वादे का उल्लेख था कि स्वयंसेवक अदालत के आदेशों का उल्लंघन नहीं करेंगे. फिर प्रधानमंत्री विशेष रूप से लगाए गए ट्रेडमिल पर तीस मिनट तक चलते रहे. थोड़ी देर बाद उनके निजी डॉक्टर के. श्रीनाथ रेड्डी वहां पहुंचे. तेलुगू और अंग्रेजी में बात करते हुए रेड्डी ने उनके रक्त और मूत्र के नमूने लिए.
रेड्डी एम्स में हृदय रोग के विशेषज्ञ थे और रविवार होने के कारण वह घर में ही थे. दोपहर को जब उन्होंने टेलीविजन चलाया तो चैनलों में अयोध्या में शांति का माहौल बताया जा रहा था, और बाबरी मस्जिद के तीनों गुम्बद दिख रहे थे. दोपहर 12.30 बजे रेड्डी ने टीवी पर हजारों हिंदू कार्यकर्ताओं द्वारा पहले गुम्बद पर हमले का सीधा प्रसारण देखा. उनके पिता केवी रघुनाथ रेड्डी पक्के समाजवादी थे और उनके बेटे पर इसका असर पड़ा था. रेड्डी याद करते हैं वह धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के लिए वह सबसे बुरा दिन था. उसके तुरंत बाद रेड्डी के मन के ख्याल आया कि प्रधानमंत्री दिल के मरीज हैं. उन्हें कैसा महसूस हो रहा होगा? 1990 में हुई एक बायपास सर्जरी की वजह से राव राजनीति से रिटायर होने की हालत में पहुंच गए थे.
रेड्डी तुरंत प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचे. वहां पहुंचने पर उन्होंने देखा कि राव खड़े थे और उनके चारों तरफ कई अधिकारी और नेता थे. वे सब टेलीविजन देख रहे थे. मस्जिद का तीसरा गुम्बद उसी समय गिरा था. राव ने गुस्से में उनसे पूछा आप अभी क्यों आए हैं. लेकिन डॉक्टर अपने मरीज की जांच करने की बात पर अड़े रहे. राव को एक छोटे कमरे में ले जाया गया. रेड्डी याद करते हैं उनका मन कहीं और था लेकिन राव डॉक्टर की बात मानने वाले मरीज थे.
श्रीनाथ रेड्डी ने उनके धड़कन और उनके रक्तचाप की जांच की. जैसा कि मुझे उम्मीद थी उनका दिल तेजी से धड़क रहा था. नब्ज काफी तेज हो गई थी. रक्तचाप बढ़ गया था. उनका चेहरा लाल हो गया था, वह उत्तेजित थे. डॉक्टर रेड्डी ने राव को बीटा बलॉकर की अतिरिक्त खुराक दी और उनके शांत हो जाने पर ही वहां से गए. इतने सालों बाद भी रेड्डी नरसिम्हा राव की शारीरिक स्थिति को याद करते हैं. डॉक्टर होने के नाते मुझे यकीन है कि मस्जिद गिरने पर उनका उद्देलित होना उनकी सच्ची प्रतिक्रिया थी. यह उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया नहीं हो सकती जिसने उसकी योजना बनाई हो या उसमें शामिल रहा है. ‘शरीर झूठ नहीं बोलता.’
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वरुण शैलेश