भारतीय विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को नेपाल की ओर से राजनीतिक नक्शे में बदलाव पर कहा कि यह एकतरफा संशोधन कार्रवाई है, इसे हमारे द्वारा स्वीकार नहीं किया जाएगा. उम्मीद है कि नेपाली नेतृत्व भारत के साथ कूटनीतिक संवाद के लिए सकारात्मक माहौल बनाएगा.
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इससे पहले नेपाल के नक्शे में बदलाव को लेकर बुधवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने नेपाल को भारत की संप्रभुता का सम्मान करने की नसीहत दी थी. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने बुधवार को कहा था, 'हम नेपाल सरकार से अपील करते हैं कि वो ऐसे बनावटी कार्टोग्राफिक प्रकाशित करने से बचे. साथ ही वह भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करे.'
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भारत की ओर से यह भी कहा गया कि नेपाल सरकार अपने फैसले पर फिर से विचार करे. विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि नेपाल सरकार, इस मामले में भारत की स्थिति से पूरी तरह से वाकिफ है.
नेपाल सरकार ने पिछले दिनों अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी किया था, जिसमें भारत के कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने नक्शे पर शामिल कर लिया गया है.
नेपाल कैबिनेट की बैठक में भूमि संसाधन मंत्रालय ने सोमवार को नेपाल का यह संशोधित नक्शा जारी किया था. इसका बैठक में मौजूद कैबिनेट सदस्यों ने समर्थन किया था.
इससे पहले 8 मई को भारत ने उत्तराखंड के लिपुलेख से कैलाश मानसरोवर के लिए सड़क का उद्घाटन किया था. इसको लेकर नेपाल ने आपत्ति जताई थी. इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी करने का फैसला किया और इसमें भारत के कुछ क्षेत्रों को भी अपना बताकर दिखाया है.
क्या है नेपाल का दावा
इस मुद्दे पर नेपाल के प्रधानमंत्री केपी. शर्मा ओली ने यहां तक भी कहा था कि वो भारत को एक इंच जमीन नहीं देंगे. इस बीच नेपाल सरकार के एक मंत्री ने दावा किया कि सरकार भारत के अतिक्रमण को लंबे समय से बर्दाश्त कर रही थी, लेकिन फिर भारतीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख में नई सड़क का उद्घाटन कर दिया.
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नेपाल सरकार सुगौली संधि के आधार पर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा पर अपना दावा करता है. नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच 1816 में सुगौली की संधि हुई थी. इस संधि के तहत दोनों देशों के बीच महाकाली नदी को सीमारेखा माना गया था. माना जा रहा है कि भारत-नेपाल सीमा विवाद महाकाली नदी की उत्पत्ति को लेकर ही है.
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