भारत अब नहीं दिखाएगा दरियादिली, इस कदम से PAK बन जाएगा रेगिस्‍तान!

उरी हमले के बाद सरहद पर बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान जंग की तैयारी करता नजर आ रहा है. लेकिन पाकिस्तान को पटखनी देने के लिए भारत को किसी जंग की जरूरत ही नहीं, हिंदुस्तान कूटनीति के मोर्चे पर ही पाकिस्तान को चारों खाने चित कर सकता है. सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा इसी बात का संकेत है.

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सिंधु जल समझौता सिंधु जल समझौता

सबा नाज़

  • नई दिल्ली,
  • 23 सितंबर 2016,
  • अपडेटेड 9:30 AM IST

उरी हमले के बाद सरहद पर बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान जंग की तैयारी करता नजर आ रहा है. लेकिन पाकिस्तान को पटखनी देने के लिए भारत को किसी जंग की जरूरत ही नहीं, हिंदुस्तान कूटनीति के मोर्चे पर ही पाकिस्तान को चारों खाने चित कर सकता है. सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा इसी बात का संकेत है.

भारत पाकिस्तान के साथ 56 साल पुराने सिंधु नदी समझौते की समीक्षा कर रहा है. इस सिलसिले में जल संसाधन मंत्रालय कई दौर की मीटिंग भी कर चुका है.

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क्या है सिंधु नदी समझौता

सिंधु नदी समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर हुई संधि है. 19 सितंबर 1960 को तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच इस समझौते पर दस्तखत हुए थे.

इस समझौते के मुताबिक पूरब की तीन नदियों ब्यास, रावी और सतलज का नियंत्रण भारत को दिया गया जबकि पश्चिम की तीन नदियों सिंधु , चेनाब और झेलम का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया. वर्ल्ड बैंक इस समझौते में मध्यस्थ बना था.

भारत के लिए कई पाबंदियां

इस समझौते के तहत पानी के बंटवारे को लेकर जो प्रावधान बनाए गए थे, वो बेहद विवादित हैं. चूंकि पाकिस्तान की ये नदियां पहले भारत में बहती हैं, ऐसे में भारत को सिंचाई, परिवहन और बिजली पैदा करने की इजाजत है जबकि नदी के किनारे भारत को डैम या अन्य प्रोजेक्ट्स बनाने के लिए मनाही है.

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पाकिस्तान को इस बात का डर था कि जंग के वक्त अगर भारत ने पानी छोड़ना बंद कर दिया तो उसके मुल्क में सूखे और अकाल की स्थ‍िति आ जाएगी. क्योंकि सिंधु बेसिन की नदियों का स्रोत भारत में है. हालांकि, अभी तक ऐसी नौबत नहीं आई है. 2003 में जम्मू-कश्मीर सरकार ने सिंधु नदी समझौता रद्द किए जाने की मांग की थी.

पाकिस्तान को 80 फीसदी पानी

1960 में की गई सिंधु नदी संधि को आधुनिक विश्व के इतिहास का सबसे उदार जल बंटवारा माना जाता है. इसके तहत पाकिस्तान को 80.52 फीसदी पानी यानी 167.2 अरब घन मीटर पानी सालाना दिया जाता है. नदी की ऊपरी धारा के बंटवारे में उदारता की ऐसी मिसाल दुनिया में और‍ किसी जल समझौते में नहीं मिलती.

क्या पाकिस्तान को पानी रोकना मुश्क‍िल है?
यहां सवाल ये भी उठता है कि क्या सिंधु जल समझौते को खारिज कर देना आसान है. क्या पाकिस्तान की तरफ जाने वाले पानी को बंद करना आसान है. क्योंकि पूरी संभावना है कि इसके बाद पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंच पर रोना-पीटना मचाएगा. लेकिन किसी भी देश के संसाधन पर दूसरे देश का अधिकार तभी है, जब उस देश का व्यवहार दोस्ताना हो.

कोई भी अंतर्राष्ट्रीय समझौता आतंक फैलाने वाले देश को पानी देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है. नदियों के पानी पर नियंत्रण के सिद्धांत के मुताबिक पाकिस्तान जाने वाली नदियों के पानी पर भारत का हक है. भारत उन्हीं परिस्थितियों में पाकिस्तान को पानी दे सकता है जब वो शुभचिंतक देश की तरह व्यवहार करे.

 

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अंतर्राष्ट्रीय संधि पर फैसलों की बात करें तो अभी चीन ने भी दक्षिण चीन सागर में अपने खिलाफ फैसले को नहीं माना. हालांकि पानी को रोकने की एक व्यवहारिक दिक्कत ये है कि अगर पानी को रोका भी गया तो हमें श्रीनगर, जम्मू और पंजाब के शहरों में बाढ़ से बचने के लिए तैयार रहना होगा. लेकिन जानकार ये भी कहते हैं कि अगर भारत सिंधु, झेलम और चिनाब पर थोड़ी थोड़ी दूरी पर बांध बना दें और कुछ पानी सिंचाई के लिए इस्तेमाल करे तो पाकिस्तान घुटने टेक देगा.

 

...तो रेगिस्तान बन जाएगा पाकिस्तान

सिंधु नदी पाकिस्तान की लाइफ लाइन मानी जाती है. सिंधु के पानी से पाकिस्तान की 90 फीसदी खेती लायक जमीन की सिंचाई होती है और पाकिस्तान की 65 फीसदी उपजाऊ और रिहाइशी जमीन सिंधु के आसपास है. जबकि भारत 36 लाख एकड़ जमीन पर सिंधु का पानी जमा कर सकता है जो कि भारत ने अबतक नहीं किया है. जानकारों के मुताबिक अगर भारत पानी रोक दे तो पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो सकता है.

सिर्फ सिंधु नदी जल समझौता ही नहीं, कूटनीति के हर मोर्चे पर भारत ने पाकिस्तान को पानी पिलाने की रणनीति पर अमल शुरू कर दिया है. जंग से पहले अभी भारत के तरकश में कई तीर हैं जो चले तो पाकिस्तान छलनी-छलनी हो जाएगा.

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