पूर्व राष्ट्रपति, PM और CM से अब छीन जाएंगे सरकारी आवास!

सार्वजनिक पद से हटने के बाद भी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के सरकारी आवास में रहने का सपना जल्द टूट सकता है.

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प्रतिकात्मक तस्वीर प्रतिकात्मक तस्वीर

हरीश वी. नैयर

  • दिल्ली,
  • 05 जनवरी 2018,
  • अपडेटेड 4:53 PM IST

तो क्या राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पद से हटने के बाद अब उन्हें सरकारी आवास नहीं मिलेंगे. अगर एमीकस क्यूरी (न्याय मित्र) की इस रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट अपनी मुहर लगाता है तो ऐसे ढेरों पूर्व शीर्ष नेताओं को सरकारी बंगलों से हाथ धोना पड़ जाएगा.

एमीकस क्यूरी गोपाल सुब्रम्णयम ने कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें उन्होंने किसी भी आम इंसान के सरकारी संपति का इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई है. एक जनहित याचिका दाखिल होने पर इस संबंध में जांच करने के बाद बतौर एमीकस सुब्रह्मणयम ने अपनी रिपोर्ट तैयार की.

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अखिलेश राज में बदला गया कानून

सुप्रीम कोर्ट की ओर से किसी वरिष्ठ वकील को एमीकस क्यूरी (न्याय मित्र) के रूप में नियुक्त किया जाता है. पूरा मामला अखिलेश यादव के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास मिलने संबंधी कानून बनाए जाने को लेकर है. उन्होंने बृहस्पतिवार को इस संबंध में तैयार रिपोर्ट कोर्ट को सौंपी जिसमें उन्होंने कहा है कि न सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्री बल्कि पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्रियों को भी सरकारी आवास नहीं दिए जाने चाहिए.

सुब्रम्णयम ने कहा, "एक बार पद (राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री आदि) छोड़ने के बाद सरकारी ऑफिस की तरह इसे छोड़ देना चाहिए. पद छोड़ने के बाद वह आम भारतीय नागरिक की तरह हो जाता है, उन्हें अन्य आम नागरिकों से ज्यादा सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए."

हालांकि उन्होंने साफ किया कि पद से हटने के बाद के प्रोटोकॉल, पेंशन और रिटायरमेंट के बाद मिलनी वाली अन्य सुविधाएं यथावत रहे. उन्होंने कहा, "किसी आम आदमी को सरकारी संपति के इस्तेमाल की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए."

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संविधान का उल्लंघन है यह कानून

जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच को सौंपे अपने रिपोर्ट में कहा कि सार्वजनिक पदों से हटने के बाद लोगों को मिलने वाले सरकारी आवास की अनुमति देने वाले कानून वास्तव में संविधान की धारा 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने 23 अगस्त को सुब्रम्णयम की एमीकस क्यूरी के रूप में नियुक्ति यह सुझाव देने के लिए किया था कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास मिलने चाहिए या नहीं. इस संबंध में कोर्ट में एक जनहित याचिक दाखिल की गई थी.

एनजीओ लोक प्रहरी ने यूपी सरकार की ओर से पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी फ्लैट्स दिए जाने के फैसले के खिलाफ कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी. जनहित याचिका में यह भी कहा गया कि अगस्त 2016 में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए फैसले के खिलाफ यह निर्णय है.

सरकारी आवास न बने संग्रहालय

अगस्त, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले पर कहा था कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला दिया जाना कानून में गलत है. उन्हें ऐसे बंगले छोड़ देने चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूपी मिनिस्टर्स (सैलरीज, अलाउंस एंड मिसलेनियस प्रविजन्स) एक्ट में सुधार करते हुए पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास दिए जाने की नई व्यवस्था बना दी. यह जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बनाए गए इसी कानून के खिलाफ दाखिल की गई थी.

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सुब्रम्णयम ने सरकारी आवास को संग्रहालय बनाए जाने का भी विरोध किया है. उनके अनुसार, सरकारी संपति को किसी हस्ती के सम्मान में संग्रहालय के रूप में परिवर्तित नहीं किया जाना चाहिए.

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