जनसामान्य की अवधारणा है कि देश में फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के 'अच्छे दिन' चल रहे हैं. कुछ पैमानों पर देखें तो यह सच भी साबित होता है. बीजेपी ने अभी कुछ महीनों पहले ही लोकसभा चुनाव में जबरदस्त प्रदर्शन करते हुए भारी जीत हासिल की थी. बीजेपी ने लोकसभा की 543 सीटों में से 303 सीटें हासिल की थीं जो कि कुल सीटों का करीब 56 फीसदी है.
किसी राजनीतिक दल के बुनियादी ढांचे पर बात करें तो वह कुछ ऐसा होता है कि उसके शीर्ष पर एक चेहरा होता है जिसे ब्रांड भी कहा जा सकता है. जबकि सबसे निचले पायदान पर कार्यकर्ता होता है जिसे चुनावी शब्दावली में आप बूथ कार्यकर्ता भी कह सकते हैं.
ब्रांड पीएम मोदी ने पूरी दुनिया में दिलाई पहचान
आज की तारीख में बीजेपी के स्थापित ब्रांड प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हैं. उन्हीं के चेहरे को आगे कर बीजेपी लगातार तमाम चुनाव लड़ती रही है. इस तरह अगर हम बीजेपी को ब्रांड स्तर पर देखें तो पार्टी देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मजबूत नजर आती है. पूरी दुनया में बीजेपी की पहचान पीएम मोदी के चेहरे से ही हो रही है.
बीजेपी के इस कार्यक्रम ने मजबूत किया बूथ
अब बात अगर बूथ की बात करें तो पिछले कई सालों से बीजेपी संगठन का एक ही ध्येय वाक्य रहा है, 'मेरा बूथ-सबसे मजबूत'. इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक बूथ कार्यकर्ताओं को एक जिम्मेदारी दी गई थी कि हर बूथ का कार्यकर्ता 10 परिवारों के साथ कनिष्ठ संबंध बनाएगा और उन्हें सरकार के कामों की जानकारी पहुंचाएगा. इसके साथ ही वोटर्स को बूथ तक लेकर जाएगा. लोकसभा चुनावों के परिणामों ने यह साबित भी किया कि बीजेपी का बूथ सबसे ज्यादा मजबूत रहा.
राज्यों के चुनावों में पूरा नहीं हो पाया 'लक्ष्य'
लेकिन जब इसी बीजेपी का प्रदर्शन राज्यों के विधानसभा चुनावों में देखें तो उस स्तर पर सफलता नजर नहीं आती है. 2019 में 7 राज्यों (आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड) में विधानसभा चुनाव हुए हैं. इनमें से सिर्फ अरुणाचल प्रदेश ऐसा रहा जहां उसे सत्ता का जनादेश मिला. हरियाणा में भले ही खट्टर सरकार वापस आई लेकिन बहुमत के लिए उसे जेजेपी के साथ गठबंधन करना पड़ा. महाराष्ट्र और झारखंड बीजेपी के हाथ से फिसल चुके हैं.
राज्यों की हार के तमाम कारक
मिशन 2019 फतह करने के बाद बीजेपी की राज्य इकाइयों को लगा कि विधानसभा चुनावों में भी नैया मोदी चेहरे और केन्द्र के कामों के सहारे पार हो जाएगी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. बीजेपी की चुनावी नैया कहीं मझधार में फंसती नजर आई तो कहीं किनारे पर पहुंचने से पहले ही फंस गई. राज्यों में बीजेपी की असफलता के तमाम कारक हो सकते हैं क्योंकि हर राज्य के अपनी-अपनी बुनियादी समस्याएं और समीकरण होते हैं. लेकिन मोटे तौर पर बात करें तो राज्य में काम कर रहे नेताओं का अक्खड़ रवैया, आत्मविश्वास का अतिरेक और वादा नाफरमानी ही जनता की नाराजगी की वजह रहा.
कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह