#377 बिना एक साल: समलैंगिक संबंधों को आधे से ज्यादा देश अब भी नहीं देता मंज़ूरी

सुप्रीम कोर्ट ने ठीक एक साल पहले समलैंगिक संबंधों (होमोसेक्सुएलिटी) को अपराध के दायरे से बाहर किया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का गे राइट्स एक्टिविस्ट्स से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक ने स्वागत किया. लेकिन भारतीय समाज ने इसे कितना स्वीकार किया. ज्यादा नहीं. 

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प्रतीकात्मक तस्वीर- रॉयटर्स प्रतीकात्मक तस्वीर- रॉयटर्स

निखिल रामपाल

  • नई दिल्ली,
  • 06 सितंबर 2019,
  • अपडेटेड 6:52 PM IST

  • सर्वे के मुताबिक भारतीय समाज समान सेक्स रिश्तों को लेकर अब भी रूढ़िवादी
  • सर्वे में लोगों ने माना समान-सेक्स रिश्तों के लिए समाज में कोई जगह नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने ठीक एक साल पहले समलैंगिक संबंधों (होमोसेक्सुएलिटी) को अपराध के दायरे से बाहर किया था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ‘गे राइट्स एक्टिविस्ट्स’ से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक कई ने स्वागत किया. लेकिन भारतीय समाज ने इसे कितना स्वीकार किया. ज्यादा नहीं.

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एक सर्वे के मुताबिक 377 के बाद के दौर में भी हर दो भारतीयों में से एक समान सेक्स संबंधों को सहमति नहीं देता.

अजीम प्रेमजी फाउंडेशन और लोकनीति, CSDS की ओर से प्रकाशित रिपोर्ट- ‘पॉलिटिक्स एंड सोसाइटी बिटवीन इलेक्शन्स 2019 के मुताबिक भारतीय समाज समान सेक्स रिश्तों को लेकर अब भी रूढ़िवादी हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘सर्वे के नतीजे रूढ़िवादी समाज का संकेत देते हैं जिनमें हर दो में से एक प्रतिभागी का मज़बूती से ये मानना है कि समान-सेक्स रिश्तों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है.’

जहां समान-सेक्स रिश्तों को नामज़ूर करने वाले प्रतिभागियों की संख्या काफी रही वहीं इन्हें मंज़ूरी देने वालों की संख्या तुलना में बहुत कम रही. 10% से कम प्रतिभागियों ने ही समाज में समलैंगिक संबंधों को स्वीकार किया.

ऐसे प्रतिभागी जिन्होंने इस मुद्दे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देना बेहतर समझा, उनकी संख्या भी काफ़ी ऊंची रही.

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2018 में किए गए सर्वे में 12 राज्यों में 24,092 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ये पहला मौका था जब समलैंगिकता को लेकर सवाल किए गए.

राज्यवार तुलना

अगर राज्यवार आंकड़ों की बात की जाए तो राज्य- राज्य में भी समलैंगिंक संबंधों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने को लेकर राय में काफी अंतर दिखा.

LGBT+ रिश्तों को लेकर सबसे ज्यादा समर्थन उत्तर प्रदेश में दिखा. यहां करीब 36 फीसदी प्रतिभागियों का कहना था कि पुरुष-पुरुष या महिला-महिला सेक्स संबंधों को समाज की ओर से स्वीकार किया जाना चाहिए. उत्तर प्रदेश के बाद दिल्ली और तमिलनाडु का नंबर रहा. इन दोनों राज्यों में 30-30% प्रतिभागियों ने LGBT समुदाय को स्वीकार्यता प्रदान की.

मिजोरम, नगालैंड, जम्मू-कश्मीर और केरल ऐसे राज्य रहे जहां सबसे ज्यादा लोगों ने समान सेक्स संबंधों से असहमति जताई. मिजोरम में 87% प्रतिभागियों ने समाज में LGBT समुदाय को मान्यता देने के खिलाफ राय व्यक्त की. इसके बाद नगालैंड (63%), जम्मू-कश्मीर(63%) और केरल (58%) का नंबर रहा.

पश्चिम बंगाल से अधिकतर प्रतिभागियों ने समान-सेक्स संबंधों पर कोई राय देने से परहेज़ किया. बंगाल में हर 10 प्रतिभागियों में से 6 (60%)ने समलैंगिक संबंधों पर कोई राय नहीं दी. इस मामले में बंगाल के बाद असम (40% से ज्यादा), पंजाब (39%), त्रिपुरा (37%) ने समान-सेक्स संबंधों पर राय व्यक्त करने से बचना पसंद किया.

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धर्म

सभी धर्मों में भारत में ईसाई समुदाय ने समान-सेक्स संबंधों को लेकर सख्ती से खिलाफ राय जताई. करीब 70%  ईसाई प्रतिभागियों ने इस बयान से नाइत्तेफ़ाकी जताई-“दो पुरुषों या दो महिलाओं में सेक्स संबंधों को समाज में स्वीकार किया जाना चाहिए.”

ईसाई समुदाय के बाद मुस्लिमों में 50% प्रतिभागियों ने समान-सेक्स संबंधों के खिलाफ राय व्यक्त की. वहीं हिन्दुओं और सिखों में ऐसा ही मत रखने वालों का आंकड़ा 40-40% रहा.

हिन्दुओं में सिर्फ़ 22% ने ही समलैंगिक संबंधों को मंज़ूरी दी. जबकि मुस्लिमों और ईसाइयों में ऐसा करने वाले प्रतिभागी 13-13% ही रहे.

शहरी-ग्रामीण

ऐसा लग सकता है कि शहरी भारत की तुलना में ग्रामीण भारत अधिक रूढ़िवादी हो, लेकिन समलैंगिक संबंधों को मान्यता देने की बात की जाए तो ये स्थिति अलग नजर आती है.

सर्वे के नतीजे बताते हैं कि समान-सेक्स संबंधों को स्वीकार्यता देने वालों में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बराबर बराबर 19-19% प्रतिभागी हैं.

हालांकि समलैंगिक संबंधों को खारिज करने वाले प्रतिभागी ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में अधिक है. शहरी क्षेत्र अधिक रूढ़िवादी हैं. ऐसी राय रखने वाले शहरी प्रतिभागियों की संख्या ग्रामीण प्रतिभागियों की तुलना में 5% अधिक रही.

क्या समलैंगिकता का कुलीन वर्ग से ही नाता?

LGBT मुहिम को लेकर आम राय यही है कि ये काफी हद तक कुलीनता से जुड़ा है. हालांकि आंकड़ों में मिश्रित नतीजे सामने आए.

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रिपोर्ट के मुताबिक किसी की आर्थिक पृष्ठभूमि और समलैंगिकता के बीच संबंध को लेकर स्थिति अस्पष्ट दिखी. आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभागियों में समलैंगिकता को स्वीकार्यता देने वालों की संख्या 13% रही. वहीं ऊपरी श्रेणियों में ये आंकड़ा 23% रहा.

लेकिन अगर समान-सेक्स संबंधों को अस्वीकार्यता देने वालों की बात की जाए तो ऊपरी वर्गों में आंकड़े सबसे प्रतिकूल दिखे. इस वर्गे से 53% प्रतिभागियों ने समलैंगिक संबंधों को नामज़ूरी दी. वहीं निचली श्रेणियों में ऐसी राय रखने वाले प्रतिभागी 47% ही रहे.

रिपोर्ट में कहा गया है- ‘नतीजे बताते हैं कि सेक्सुअल ओरिएंटेशन की तरफ सामाजिक रवैए को लेकर आर्थिक रूप से किसी की श्रेणी अहम निर्णायक वजह नहीं होती.’

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