2. मेजर जनरल इआन कार्डोजो मेजर जनरल इआन कार्डोजो को 1971 के युद्ध में असीम बहादुरी के लिए जाना जाता है. उस समय वो मेजर 5 गोरखा राइफल्स के हिस्सा थे. उस युद्ध में लैंडमाइन पर पैर रखने के चलते मेजर जनरल इआन का एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया. स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि उनके पैर को काटने की नौबत आ गई. लेकिन क्योंकि डॉक्टर ये काम नहीं कर पाए, तो मेजर जनरल ने खुद एक खुरकी ली और अपना पैर काट लिया और आदेश दिया कि इसे कहीं जाकर दफना दो. इस वीर अफसर का सफर उस घटना के बाद समाप्त नहीं हुआ. बल्कि उन्होंने पैर कटने के बावजूद अपने कर्तव्य का पूरी निष्ठा के साथ निर्वहन किया. वे आर्मी के पहले अफसर बने जिन्होंने दिव्यांग होने के बावजूद एक पूरी इंफैन्ट्री बटालियन को लीड किया. उनके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि वे इतने फिट थे कि एक पैर होने के बावजूद, वे दो पैर वाले जवानों को फिटनेस टेस्ट में मात दे सकते थे.
3. सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव को कारगिल युद्ध में अपने अहम योगदान के लिए याद किया जाता है. 1999 के युद्ध में उन्हें टाइगर हिल पर तीन बंकरों पर कब्जा करने का मुश्किल काम सौंपा गया था. बता दें, टाइगर हिल 16500 फीट की ऊंचाई पर था जहां पर पहुंचना बहुत मुश्किल था. लेकिन वीर सूबेदार ने ये जिम्मेदारी ली और निकल पड़े उन बंकरों पर कब्जा करने के लिए. इस राह में सूबेदार को तीन गोलियां लग गईं, लेकिन वे अपने लक्ष्य से डिगे नहीं और आगे कूच करते रहे. अपनी रणनीति के अनुसार उन्होंने पहले बंकर पर कब्जा जमा लिया और ग्रेनेड के माध्यम से चार पाकिस्तानी सैनिको को मार गिराया. इसके बाद उन्होंने दूसरा बंकर भी तबाह कर दिया और चार और पाकिस्तानी सैनिकों को अपने हाथों से मार गिराया. उनकी इस बहादुरी के चलते भारतीय आर्मी ने टाइगर हिल पर सफलतापूर्वक कब्जा जमा लिया. सूबेदार योगेंद्र सिंह यादव को अपने इस महान योगदान के लिए मात्र 19 साल की उम्र में परमवीर चक्र से नवाजा गया. बता दें, वे इतिहास में सबसे कम आयु में परमवीर चक्र से सम्मानित होने वाले जवानों में शामिल हैं. (फोटो- फेसबुक)
4. सेकेंड लैफ्टिनेंट अरुन खेतपाल वीर सेकेंड लैफ्टिनेंट अरुन खेतपाल ने पाकिस्तान के खिलाफ 1971 की जंग में शहीद हो गए थे. मात्र 21 साल के खेतपाल 17 पूरना होर्स रेजिमेंट के हिस्सा थे. जब उन्हें पता चला कि पाकिस्तान ने जरपाल, शकरगड़ इलाके में हमला कर दिया है, उन्होंने अपना स्क्वाड्रन छोड़ उस इलाके की तरफ प्रस्थान किया. वहां उन्होंने बहादुरी दिखाते हुए पाकिस्तान के सभी हथियारों को अपने कब्जे में ले लिया और उनके टैंक पर हमला बोल दिया. उनकी बहादुरी के चलते दो पाकिस्तानी टैंक तबाह हो गए, लेकिन वे इस मिशन में बुरी तरह जख्मी हो गए और बाद में शहीद. लेकिन उनकी इस बहादुरी का भारत की विजय में अहम योगदान था. ( प्रतीकात्मक तस्वीर)
5. मेजर सोमनाथ शर्मा फोर्थ कुमाऊं रेजिमेंट के मेजर सोमनाथ शर्मा 24 साल की उम्र में शहीद हो गए थे. बता दें, ये घटना 30 अक्टूबर 1947 की है जब कुछ पाकिस्तानी घुसपैठिए कश्मीर वादी में घुस गए थे. उसके बाद 3 नवम्बर को जब वो बडगाम में पैट्रोलिंग कर रहे थे, तब 700 घुसपैठियों ने उन्हें घेर लिया और मोर्टार दागना शुरू कर दिया. इसके चलते हमारे कई जवान मारे गए, लेकिन मेजर सोमनाथ शर्मा ने सभी जवानों को हौसला दिया और अपना हमला जारी रखा. लेकिन इसी दौरान मेजर शहीद हो गए. ( प्रतीकात्मक तस्वीर)