इजराइल के जंग लड़ने की असल वजह आत्मरक्षा नहीं!

यूरोप को इजराइल-हमास के बीच जंग से किस बात का डर है, एक साल से क्यों रुकी हुई थी 70 जजों की नियुक्तियां और 5 चुनावी राज्यों की विधानसभा ने एक साल में कितने दिन काम किया? सुनिए 'आज का दिन' में.

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कुंदन कुमार

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  • 10 अक्टूबर 2023,
  • अपडेटेड 10:49 AM IST

इज़रायल-हमास के बीच जारी जंग का आज चौथा दिन है, हमास ने शुरुआती हमले से इज़रायल के साथ पूरी दुनिया को चौंका दिया था, लेकिन उसके बाद इज़रायल ने ताबड़तोड़ जवाब दिया. युद्ध की घोषणा के बाद से इजरायली विमानों ने गाजा पट्टी के 426 ठिकानों को निशाना बनाया, उसे नष्ट किया. इजरायली रक्षा मंत्री योव गैलेंट ने कल वीडियो मैसेज में गाजा पट्टी पर पूरी तरह से घेराबंदी करने का आदेश भी दिया. इसका मतलब बिजली, खाना, पानी सब बंद. 

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जर्मनी और ऑस्ट्रिया ने फिलिस्तीन को देने वाली आर्थिक सहायता भी रोक दी. इस युद्ध में अब तक इज़रायल की ओर से 800 से ज़्यादा लोगों के मरने की ख़बर है, वहीं 450 फिलिस्तीनी अपनी जान गवां चुके हैं, साथ ही साथ 30 से ज़्यादा विदेशी मुल्क के नागरिक भी इस युद्ध के शिकार हुए हैं, जिसमें 9 अमेरिकी, 10 नेपाली, थाइलैंड के 12 और 2 युक्रेन के नागरिक शामिल हैं. बिगड़ते हालात को देखते हुए रविवार को  संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई गई थी, लेकिन आज और दो अहम बैठकें होने वाली हैं. एक ओर यूरोपियन संघ के विदेश मंत्री होंगे तो दूसरी ओर इस्लामिक सहयोग संगठन के सभी राष्ट्र. यूरोप को किस बात का डर सता रहा है और इजराइल को युद्ध की घोषणा क्यों करनी पड़ी? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.

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कभी आपका पाला कोर्ट-कचहरी से न भी पड़ा हो तब भा आपको इतनी ख़बर होगी कि देश में जजों की भारी कमी है. इस हालात में भी केंद्र सरकार के पास एक साल से 70 जजों की नियुक्तियों के नाम रुके हुए थे. इस मामले में कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है और सरकार को डांट लगाई गई. इसके पहले की सुनवाई में जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच ने कहा था कि नवंबर 2022 से हाईकोर्ट कॉलेजियम से 70 नाम भेजे गए हैं, लेकिन वे हम तक नहीं पहुंचे हैं. बेंच ने कहा कि हम इस मुद्दे को उठा रहे हैं क्योंकि जजों की खाली पदें एक बड़ा मुद्दा है. कोर्ट की ओर से मणिपुर के चीफ़ जस्टीस की नियुक्ती में देरी पर केंद्र को फटकार लगाई गई. किस वजह से 70 जजों के नाम रुके हुए थे और देश के किन कोर्ट में जजों की कुर्सियां सबसे ज़्यादा संख्या में खाली हैं? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.

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कल चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी. इसके साथ ही इन राज्यों में आचार सहिंता लागू हो गई. आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में होने वाले राजनीतिक दंगल पर बात करने के कई मौके आएंगे लेकिन अभी कुछ स्टडी के पन्ने पलटते हैं. PRS Legislative Research नाम की एक संस्था ने इन राज्यों के विधान सभा के परफ़ॉर्मेंस पर डेटा आधारित एक रिपोर्ट तैयार की है. उसमें उन्होंने बताया है कि इन राज्यों में पिछले साल 30 दिनों से भी कम बैठक हुई है. राजस्थान में साल 2019 से 2023 के बीच औसतन बैठक 23 दिन हुई और जिसमें रोज़ाना 5 घंटे काम हुआ. इसी अवधी में मध्यप्रदेश में 16 दिन की बैठक और औसत काम के घंटे चार. मिज़ोरम की कहानी भी कुछ अलग नहीं है वहां पांच साल में विधानसभा में ऑन एन एवरेज 18 दिन बैठकें हुईं और इन 18 दिनों में रोज़ लगभग 5 घंटे काम हुआ. 

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वैसे ये आंकड़ें हमेशा से ऐसे नहीं थे, राजस्थान एसेंबली के शुरुआती 10 साल में औसतन 59 दिन की बैठक हुई और आखिर के 10 साल में केवल 29 दिन. मध्यप्रदेश की एसेंबली का भी यही हाल है, शुरुआती दस साल का औसत 48 दिन और आखिर के दस साल का 21 दिन. इन आंकड़ों से कोई अच्छी तस्वीर बनती तो नहीं दिख रही. विधानसभा की कम होती बैठकों और क्या नुकसान होते हैं और कम बिल का पास होना क्या दर्शाता है? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.

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