उमर खालिद-शरजील इमाम पर 'सुप्रीम' फैसले का दिन, क्या 5 साल बाद होगी रिहाई?

दिल्ली दंगों से जुड़े यूएपीए के मामले में पांच वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद आरोपियों ने ट्रायल में देरी को जमानत का आधार बनाया है, जबकि दिल्ली पुलिस आरोपों की गंभीरता और साजिश की गंभीर प्रकृति का हवाला देते हुए जमानत का विरोध किया है.

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सुप्रीम कोर्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर फैसला सुनाएगा. (File Photo: PTI) सुप्रीम कोर्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर फैसला सुनाएगा. (File Photo: PTI)

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 05 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:44 AM IST

पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम जेल से बाहर आएंगे या नहीं, इसका फैसला आज हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े 'बिग कॉन्सपिरेसी' मामले में खालिद और इमाम सहित पांच अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर अपना निर्णय सुनाएगा. जस्टिस रविंद कुमार और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ ने 10 दिसंबर को आरोपियों और दिल्ली पुलिस की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. 

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दिल्ली पुलिस ने आरोपियों की रिहाई का विरोध करते हुए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के प्रावधानों का हवाला दिया है. शरजील इमाम 28 जनवरी 2020, ज​बकि उमर खालिद 13 सितंबर 2020 से जेल में हैं. इमाम और खालिद ने सितंबर 2023 के दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है, जिसमें आरोपों की गंभीरता और कथित साजिश की गंभीर प्रकृति का हवाला देते हुए उन्हें जमानत से इनकार किया गया था.

उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद पर UAPA और तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं के तहत फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों का 'मास्टरमाइंड' होने का आरोप है. ये दंगे नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (CAA) और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध के बीच भड़के थे, जिसमें 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए. इसे देश की राजधानी में दशकों की सबसे भीषण सांप्रदायिक हिंसा में से एक माना जाता है.

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पुलिस का ‘रिजीम-चेंज ऑपरेशन’ का दावा

आरोपियों की जमानत का विरोध करते हुए दिल्ली पुलिस ने बार-बार कहा है कि दिल्ली में हुए दंगे एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थे. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में पुलिस ने दावा किया कि ये दंगे भारत को अस्थिर करने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के उद्देश्य से किए गए थे, जो एक योजनाबद्ध 'रिजीम-चेंज ऑपरेशन' (सत्ता परिवर्तन) था. दिल्ली पुलिस ने गवाहों के बयान, कॉल रिकॉर्ड, चैट मैसेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर यह तर्क दिया है कि आरोपी 'सांप्रदायिक आधार पर रची गई गहरी साजिश' का हिस्सा थे. पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी 'गैर-जरूरी आवेदनों' और 'जांच में सहयोग' न करके  जानबूझकर मुकदमे में देरी कर रहे हैं.

करीब 900 गवाहों के कारण ट्रायल में वर्षों लगने की दलील को पुलिस ने 'जमानत पाने के लिए गढ़ा गया भ्रम' बताया. पुलिस का कहना है कि केवल 100–150 गवाह ही प्रासंगिक हैं और यदि आरोपी सहयोग करें तो कार्यवाही तेजी से आगे बढ़ सकती है. दिल्ली पुलिस ने UAPA का हवाला देते हुए अपने हलफनामे में दोहराया है कि गंभीर आतंक-संबंधित मामलों में 'जमानत नहीं, जेल ही नियम है'.

उमर खालिद और इमाम पर क्या हैं आरोप

दिल्ली पुलिस के अनुसार, 'दंगों के लिए चक्का जाम करने' के पीछे उमर खालिद का दिमाग था और दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप के माध्यम से हिंसा की योजना बनाने में उनकी केंद्रीय भूमिका थी. आरोप है कि उन्होंने सीलमपुर सहित कई स्थानों पर गुप्त बैठकें बुलाईं, जहां प्रतिभागियों को स्थानीय महिलाओं को जुटाने और चाकू, पत्थर, एसिड की बोतलें जमा करने के निर्देश दिए गए. शरजील इमाम के बारे में पुलिस का दावा है कि वह 'उमर खालिद और अन्य साजिशकर्ताओं के संरक्षण में' काम कर रहे थे और दिसंबर 2019 से शुरुआती 2020 तक अशांति के पहले चरण के प्रमुख रणनीतिकार थे. 

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आरोप है कि उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया और आसनसोल में दिए गए अपने भाषणों के जरिए भीड़ को उकसाया और मुस्लिम बहुल शहरों में चक्का जाम करने की अपील की. पुलिस ने उन चैट और मैसेज का भी हवाला दिया है, जिनमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा का जिक्र था, और दावा किया है कि हिंसा का समय CAA मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाने के इरादे से तय किया गया था.

जमानत के लिए बचाव पक्ष ने क्या दलीलें दीं

बचाव पक्ष ने लगातार लंबी कैद और मुकदमे में देरी को जमानत का आधार बनाया और दलीलें दीं कि उमर खालिद और शरजील इमाम सितंबर 2020 से हिरासत में हैं, जबकि मामला अभी आरोप तय करने के चरण में ही है. अभियोजन का आरोपपत्र हजारों पन्नों का है और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के रूप में दसियों हज़ार पन्ने शामिल हैं. दिल्ली हाई कोर्ट ने यह स्वीकार किया था कि 'जमानत नियम है और जेल अपवाद', लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि लंबी कैद मात्र अपने-आप में जमानत का सार्वभौमिक आधार नहीं हो सकती, विशेषकर मामले के 'विशेष तथ्यों और परिस्थितियों' को देखते हुए. पिछले महीने दिल्ली के एक ट्रायल कोर्ट ने उमर खालिद को अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए दो सप्ताह की अंतरिम जमानत दी थी. अंतरिम राहत की अवधि समाप्त होने के बाद खालिद ने 29 दिसंबर को आत्मसमर्पण कर दिया था.

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